RANCHI: राजधानी में प्राइवेट गाड़ियों का धड़ल्ले से कॉमर्शियल इस्तेमाल किया जा रहा है। वह भी तब जब डीटीओ शहर में लगातार अभियान चला रहे है। इस दौरान लोगों के वाहनों की जांच तो की जाती है। लेकिन प्राइवेट नंबर वाले कॉमर्शियल वाहनों पर कार्रवाई नहीं होती। चूंकि इन वाहनों में या तो मरीज ढोए जा रहे है या फिर अधिकारियों की नेम प्लेट देखकर इन गाड़ियों को रोका ही नहीं जाता। इस वजह से पूरे शहर में प्राइवेट रजिस्ट्रेशन वाली कॉमर्शियल गाड़ियां धड़ल्ले से चल रही है।
विभाग को लगा रहे राजस्व का चूना
रांची में बिना कॉमर्शियल रजिस्ट्रेशन कराए किराये पर वाहन चलाया जा रहा है। एजेंसियां बड़ी संख्या में सरकारी हॉस्पिटल से लेकर विभागों में गाड़ियां टेंडर के माध्यम से उपलब्ध करा रही है। लेकिन वाहनों का कॉमर्शियल रजिस्ट्रेशन ही नहीं कराया है। इसकी वजह यह है कि डीटीओ केवल बड़े वाहनों पर ही कार्रवाई कर रहे है। इस तरफ विभाग के अधिकारियों का ध्यान ही नहीं है। इससे भले ही गाड़ियां आसानी से उपलब्ध हो जा रही है। लेकिन कहीं न कहीं इससे परिवहन विभाग को राजस्व का बड़ा नुकसान हो रहा है।

कॉमर्शियल का रजिस्ट्रेशन महंगा
नियम के अनुसार प्राइवेट और कॉमर्शियल वाहनों के रजिस्ट्रेशन अलग-अलग कैटेगरी में होते है। कॉमर्शियल गाड़ियों को लेकर काफी सख्त नियम हैं। इसके लिए परिवहन विभाग जिले में परमिट जारी करता है। इसके बाद परमिट का रिन्युअल भी कराना होता है। वहीं इसका टैक्स भी ज्यादा होता है। इन सबसे बचने के लिए वाहन मालिक प्राइवेट रजिस्ट्रेशन कराता है जो 15 सालों के लिए वैलिड होता है। यहीं वजह है कि गाड़ियां देने वाली एजेंसियां प्राइवेट रजिस्ट्रेशन वाली गाड़ियां अधिकारियों को उपलब्ध करा देती है। इसके बाद बार-बार टैक्स और परमिट की झंझट से छुटकारा मिल जाता है।
एजेंसियों के जरिए कर रहे कारोबार
ज्यादातर प्राइवेट वाहनों के मालिक ट्रेवल एजेंसियों के साथ जुड़कर अपनी गाड़ियां उन्हें दे देते है। उनकी गाड़ियां एजेंसियों के जरिए किराये पर चल रही हैं। इसके लिए वह प्राइवेट एजेंसियों को कमीशन भी दे रहे हैं। एक-एक गाड़ियों से हर महीने 2-3 हजार रुपए लिए जाते है। वहीं वाहन मालिक को भी एक चीज से राहत है कि उन्हें गाड़ी चलाने के लिए बुकिंग ढूंढने की जरूरत नहीं होती। चूंकि खुद से गाड़ी किराए पर चलाने में हर दिन बुकिंग नहीं मिलती। ऐसे में वे भी एजेंसियों को गाड़ी देकर निश्चिंत हो जाते है।
एजेंसी के जरिए गाड़ियां किराये पर लगाने में लोगों को खुद मेहनत भी नहीं करनी पड़ती। किसी सरकारी विभाग या निजी संस्थान को ट्रेवल एजेंसियां ही बड़ी संख्या में किराये पर गाड़ियां उपलब्ध कराती हैं।
इस मामले में रांची के डीटीओ अखिलेश कुमार सिंह से संपर्क करने की कोशिश की गई। लेकिन उन्होंने कोई रिप्लाई नहीं दिया।
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