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“Ratan Tata : A Life” से खुलासा : नोएल टाटा के पास उत्तराधिकारी बनने के लिए अधिक अनुभव होना चाहिए था

रतन टाटा के निधन के बाद नोएल टाटा को टाटा ट्रस्ट का चेयरमैन नियुक्त किया गया है, जो अप्रत्यक्ष रूप से 165 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य वाले टाटा समूह का नियंत्रण करता है।

by Anand Mishra
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नई दिल्ली : टाटा समूह के पूर्व प्रमुख और दिवंगत उद्योगपति रतन टाटा को अपने सौतेले भाई नोएल टाटा की क्षमता पर पूरा भरोसा था, लेकिन उन्हें लगा था कि टाटा समूह की बागडोर संभालने के लिए नोएल को और अधिक अनुभव की आवश्यकता थी। यह खुलासा हाल ही में जारी किताब ‘रतन टाटा : ए लाइफ’ में हुआ है, जिसे थॉमस मैथ्यू ने लिखा और हार्पर कॉलिन्स पब्लिशर्स ने प्रकाशित किया है।

रतन टाटा के निधन के बाद नोएल टाटा को टाटा ट्रस्ट का चेयरमैन नियुक्त किया गया है, जो अप्रत्यक्ष रूप से 165 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य वाले टाटा समूह का नियंत्रण करता है। वर्ष 2011 में रतन टाटा के उत्तराधिकारी की तलाश के दौरान, कई उम्मीदवारों का साक्षात्कार लिया गया था, जिनमें नोएल टाटा भी शामिल थे। इस चयन प्रक्रिया से रतन टाटा स्वयं को दूर रखना चाहते थे ताकि अन्य उम्मीदवारों में निष्पक्षता का विश्वास बनाए रखा जा सके।

किताब के अनुसार, रतन टाटा का यह निर्णय बाद में उनके लिए अफसोस का कारण बना। वह चाहते थे कि चयन प्रक्रिया पूरी तरह से निष्पक्ष हो और समूह के भीतर से कोई उम्मीदवार सामने आए, जिस पर सर्वसम्मति बने। रतन टाटा ने चयन समिति से दूरी बनाए रखने के दो मुख्य कारण बताए। पहला कारण यह था कि वह चाहते थे कि समिति एक स्वतंत्र और सामूहिक निर्णय के आधार पर किसी एक उम्मीदवार की सिफारिश करे। दूसरा, व्यक्तिगत कारण यह था कि आम धारणा के अनुसार, नोएल टाटा उनके उत्तराधिकारी बनने के लिए स्वाभाविक उम्मीदवार माने जा रहे थे।

रतन टाटा परंपरागत दबावों से हटकर केवल व्यक्ति की प्रतिभा और मूल्यों को महत्व देते थे। पारसियों और समुदाय के परंपरावादियों का दबाव था कि नोएल टाटा को समूह का नेतृत्व सौंपा जाए। लेकिन रतन टाटा ने निर्णय समिति से खुद को इसलिए अलग रखा कि अगर नोएल को चयनित नहीं किया जाता, तो यह उनकी असहमति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

किताब में रतन टाटा के विचार को उद्धृत किया गया है, जिसमें उन्होंने कहा, “शीर्ष पद के लिए सफलतापूर्वक प्रतिस्पर्धा करने के लिए नोएल के पास और अधिक अनुभव होना चाहिए था।” रतन टाटा ने यह भी कहा था कि यदि उनका कोई पुत्र होता, तो वह भी अपने आप उनका उत्तराधिकारी नहीं बनता, बल्कि उसे अपने कार्य और अनुभव से खुद को इस भूमिका के योग्य साबित करना पड़ता। इस किताब से यह स्पष्ट होता है कि रतन टाटा ने उत्तराधिकार का निर्णय सामूहिक, निष्पक्ष और स्वतंत्रता की भावना से लिया, और वह केवल व्यक्ति की योग्यता को सर्वोपरि मानते थे।

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