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Saranda IED Blast : घर से निकले तो सड़क पर आईईडी का डर, घर में रहे तो भूखे मौत, पढ़िए सारंडा का हकीकत…

Saranda IED Blast : नक्सली पुलिस को नुकसान पहुंचाने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं। इस स्थिति में ग्रामीणों की जिंदगी बद से बदतर हो गयी है।

by Rajeshwar Pandey
Fear of IED blasts in Saranda as locals struggle between stepping out on dangerous roads and facing hunger at home
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Chaibasa (Jharkhand) : अपने घर की चौखट पर फूट-फूट कर रो रही यह मां अपनी बेटी की मौत पर आंसू बहा रही है। वह बेटी जो घर का खर्च चलाने में आर्थिक मदद करती थी। वह बेटी जो अपने पिता के दाहिने हाथ की तरह काम करती थी, जो जंगल से पत्ते चुनकर बाज़ार में बेचती थी और चंद पैसे जुटाकर घर का खर्च चलाती थी। उस बेटी के लिए आज एक मां के आंसू नहीं रुक रहे हैं। वहीं, वनोत्पाद जुटा कर जीवन-यापन करनेवाले ग्रामीण घर से बाहर निकलने की स्थिति में नहीं हैं। इसके विपरीत यदि घर से निकलते हैं, तो कब और कहां काल के गाल में समा जाएं, इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।

पिछले शुक्रवार को भी बेटी पत्ते चुनने के लिए जंगल में गयी थी। अचानक एक आईईडी (IED) ब्लास्ट हुआ और परिवार की गाड़ी खींचने में सहायक उस बेटी के चीथड़े उड़ गए। जंगल से उसकी क्षत विक्षत लाश घर आई। इस बेटी का नाम फूलो धनवार था। वह नक्सलियों की आईईडी का शिकार हो गयी। अब उसके घर में मातम का माहौल है। परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है।

अब सरकार से सहायता की उम्मीद

कोलबोंगा के बगारी टोला में शुक्रवार की दोपहर आईईडी ब्लास्ट में फूलो धनवार की मौत से पूरा परिवार टूट गया है। घर में मां झालो धनवार और छोटा भाई शोक में डूबे हैं, जबकि पिता सामू धनवार और बड़ा भाई पोस्टमार्टम कराने गए हैं। आर्थिक तंगी के कारण फूलो पढ़ाई छोड़कर पिता के साथ जंगल से पत्ते लाकर घर का खर्च चलाने में मदद करती थी। घर की सबसे बड़ी संतान होने के कारण वह परिवार का मुख्य सहारा थी। उसकी शोकाकुल मां बार-बार रोते हुए कहती हैं कि “घर का सबसे बड़ा हाथ छिन गया।” गांव में शोक है और परिवार अब सरकार से सहायता की उम्मीद में है।

बद से बदतर स्थिति में ग्रामीण

सारंडा में इन दिनों नक्सली और सुरक्षा बलों के बीच बड़ा संघर्ष चल रहा है। एक तरफ जहां सुरक्षा बलों के जवान सारंडा में लगातार नक्सल विरोधी अभियान चलाकर जंगल को नक्सल मुक्त बनाने की कवायद में जुटे हैं। वहीँ, सारंडा में मौजूद नक्सली अपना वजूद बचाने के लिए लगातार हिंसक घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। नक्सली पुलिस को नुकसान पहुंचाने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं। इस स्थिति में ग्रामीणों की जिंदगी बद से बदतर हो गयी है।

वन उत्पाद पर ही निर्भर हैं ग्रामीण

सारंडा में पग-पग पर बारूद बिछा है। ऐसे में यहां रहने वाले ग्रामीणों के लिए चंद पैसे कमाना भी मुश्किल हो गया है। यहां के ग्रामीण सारंडा के वन उत्पाद पर ही निर्भर हैं। जंगल की सखी लकड़ियां और पत्ते बेचकर इनका घर चलता है। लेकिन, जंगल में बिछाए गए आईईडी मौत बनकर इनके जीवन पर फूट रहे हैं। एक तरफ मौत का खौफ, तो दूसरी तरफ पेट की आग है। सारंडा में नक्सलियों के अस्तित्व बचाने की कवायद के बीच, यहां के ग्रामीण जीवन और मौत के बीच जीने को विवश हैं।

खाना-पानी के लिए पूछने वाला कोई नहीं

इसके लिए कोई भी उनकी मदद करता नजर नहीं आ रहा है। नक्सली आते हैं तो घर के बाहर जंगल नहीं जाने की चेतावनी दे जाते हैं। पुलिस आती है वह भी ग्रामीणों को जंगल जाने से मना करती है। लेकिन, कोई भी इन्हें राशन-पानी के लिए नहीं पूछता। जिंदगी जीने के लिए बारूद के बीच जीवन का संघर्ष कैसा होता है, यह जानना है, तो सारंडा जाइए, जहां हर आंख में खौफ और जीवन का संघर्ष साफ नजर आएगा। आखिर कब तक फूलो धनवार जैसे मासूम निर्दोष ग्रामीण इस हिंसा की आग में अपना बलिदान देते रहेंगे।

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