RANCHI: सरना धर्मकोड को लेकर एक बार फिर झारखंड की राजनीति गरमा गई है। प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता सोनाल शांति ने भाजपा और उसके नेता बाबूलाल मरांडी पर आदिवासी समाज की आस्था, परंपरा और पहचान को कमजोर करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की विशिष्ट धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान को सनातन से जोड़कर सरना धर्मकोड की दशकों पुरानी मांग को ठुकराने का प्रयास किया जा रहा है। जिसे आदिवासी समाज स्वीकार नहीं करेगा।
आदिवासी समाज की जड़ें मजबूत
उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की सामाजिक संरचना और जीवन पद्धति की जड़ें बेहद गहरी और मजबूत हैं, जिन्हें किसी भी राजनीतिक षड्यंत्र से नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता। आदिवासी समाज यह भली-भांति समझ चुका है कि झारखंड में उनकी आस्था, परंपरा और अस्तित्व की रक्षा महागठबंधन सरकार ही कर सकती है। यही संदेश भाजपा को लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मिल चुका है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा ने अपने शासनकाल में आदिवासी समाज को छलने और भड़काने का काम किया। बाबूलाल मरांडी का नाम आते ही आदिवासी समाज को झारखंड गठन के महज तीन माह बाद उनके शासनकाल में हुए तपकरा गोलीकांड की याद आ जाती है, जिसमें निहत्थे आदिवासी आंदोलनकारियों की जान गई थी। इसी तरह रघुवर दास के शासनकाल में पत्थलगढ़ी आंदोलन के दौरान लगभग 10 हजार आदिवासियों पर मुकदमे दर्ज किए गए।
महागठबंधन सरकार चला रही योजनाएं
सोनाल शांति ने कहा कि आदिवासी समुदाय के सशक्तिकरण के लिए महागठबंधन सरकार लगातार योजनाएं चला रही है, जिसका लाभ उन्हें मिल रहा है। अनुसूचित क्षेत्रों में पेसा कानून लागू कर सरकार ने ग्राम सभाओं को अधिकार दिए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि 15 वर्षों से अधिक समय तक सत्ता में रहने के बावजूद भाजपा ने पेसा कानून लागू नहीं किया और आज उसे इसकी चिंता सता रही है। उन्होंने कहा कि भाजपा बार-बार धर्मांतरण और मतांतरण का मुद्दा उठाकर आदिवासी समाज में भ्रम फैलाने की कोशिश करती है, लेकिन इस तरह के आरोपों को आदिवासी समाज पूरी तरह नकार चुका है।

