नई दिल्ली : केंद्र सरकार द्वारा आयातित खाद्य तेलों के आयात शुल्क मूल्य में वृद्धि करने के बावजूद बीते सप्ताह अधिकांश तेल-तिलहन के दाम में गिरावट दर्ज की गई। यह गिरावट शिकागो एक्सचेंज में भारी गिरावट के कारण आई और कारोबारी दबाव बढ़ने के कारण तेल-तिलहन बाजार में गिरावट आई। वहीं, बिनौला तेल एकमात्र ऐसा तेल था, जिसने सुधार के साथ बंद होकर 50 रुपये की वृद्धि के साथ 13,450 रुपये प्रति क्विंटल पर कारोबार किया। इस वृद्धि के पीछे मुख्य कारण बिनौला तेल की बढ़ती मांग और उपलब्धता में कमी है, जिससे इसका मूल्य बढ़ा।
बाजार सूत्रों के अनुसार, बीते सप्ताह पाम, सूरजमुखी और सोयाबीन तेल के दाम विदेशों में घटे, जिसका प्रभाव भारत में भी देखा गया। इस गिरावट के बावजूद, भारत में सोयाबीन तेल की कीमतों में उतना प्रभाव नहीं पड़ा, क्योंकि फरवरी में आयात कम हुआ था और स्टॉक की कमी बनी हुई है।
सरकार द्वारा तेल-तिलहन के बाजार की स्थिति पर लगातार ध्यान रखने की आवश्यकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी नीति या फैसले के कारण बाजार में नकारात्मक धारणा बनती है तो उसका असर दीर्घकालिक रूप से बाजार पर पड़ सकता है। यह इस बात का संकेत है कि सरकार को हर कदम समग्र दृष्टिकोण से उठाना होगा, ताकि देश में तेल-तिलहन के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त की जा सके।
अर्थशास्त्रियों और खाद्य तेल संगठनों को भी यह जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी कि उनके द्वारा दिए गए सुझावों से क्या देश आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ पाया है या फिर निरंतर आयात पर ही निर्भर बना है। इस मुद्दे को हल करना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि भारत तेल-तिलहन के मामले में अपनी आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रयासरत है।
विशेषज्ञों ने यह भी सवाल उठाया है कि एक समय दक्षिण भारत में मूंगफली का उत्पादन पर्याप्त था, लेकिन अब आंध्र प्रदेश में मूंगफली की खेती लगभग लुप्त हो चुकी है। इसके साथ ही सूरजमुखी के उत्पादन में भी 90 के दशक के मुकाबले आत्मनिर्भरता का स्तर गिर गया है और अब हम पूरी तरह से आयात पर निर्भर हैं। इस गिरावट के पीछे की वजह और सुधार के उपायों पर चर्चा की आवश्यकता है।
सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी फैसले के बाद यदि तेल-तिलहन बाजार पर नकारात्मक असर पड़े, तो उसे तत्काल बदला जाए। बीते सप्ताह सोयाबीन, मूंगफली और सरसों के दामों में गिरावट ने किसानों को नुक्सान पहुंचाया है, और इससे यह संभावना जताई जा रही है कि अगले सीजन में किसानों की इन फसलों में रुचि कम हो सकती है।
बीते सप्ताह के दौरान विभिन्न तेलों के दाम में आई गिरावट निम्नलिखित रही…
सरसों दाने का थोक भाव 50 रुपये की गिरावट के साथ 6,250-6,350 रुपये प्रति क्विंटल।
सरसों दादरी तेल का थोक भाव 200 रुपये की गिरावट के साथ 13,600 रुपये प्रति क्विंटल।
सोयाबीन दाने का थोक भाव 80-130 रुपये की गिरावट के साथ 4,200-4,250 रुपये प्रति क्विंटल।
मूंगफली तिलहन का भाव 50 रुपये की गिरावट के साथ 5,600-5,925 रुपये प्रति क्विंटल।
कच्चे पाम तेल का दाम 250 रुपये की गिरावट के साथ 3,150 रुपये प्रति क्विंटल रहा। पामोलीन दिल्ली और एक्स कांडला तेल के दाम क्रमश: 250 रुपये और 200 रुपये की गिरावट के साथ 14,700 रुपये और 13,650 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुए।
कुल मिलाकर, आयात शुल्क में वृद्धि के बावजूद, बाजार में अधिकतर तेल-तिलहनों के दाम में गिरावट देखी गई, जिससे भारतीय तेल-तिलहन बाजार को दबाव का सामना करना पड़ा। सरकार को इस स्थिति को सुधारने के लिए जल्द कदम उठाने की आवश्यकता है।

