आप ऐसा मत समझिएगा कि मैं वह बात कहने जा रहा हूं कि कोई शहर की ओर कब भागता है। यहां बात उस नेताजी की हो रही है, जिसे यहां मान-सम्मान मिलने की अब गुंजाइश नहीं बची है। परिस्थिति ही ऐसी बन गई कि नेताजी को बंगाल की ओर जाना पड़ा है। दरअसल, वे यहां रहकर पत्तल में छेद कर रहे थे। मामला तोड़फोड़ को लेकर शुरू हुआ था, लेकिन केस-मुकदमा के कारण उनकी फजीहत हो गई। जिस बात के लिए उन्होंने जुलूस-प्रदर्शन किया था, उसका फायदा तो कुछ नहीं हुआ, उनकी राजनीतिक जमीन ही रसातल में जाती हुई दिख रही है। यदि ऐसा नहीं होता, तो अगले जुलूस-प्रदर्शन की कमान उनके अनुज को संभालने की जरूरत नहीं होती। नेताजी अब सीन से ही गायब हो गए हैं। वैसे अनुज पहले भी जुलूस-प्रदर्शन से लेकर भीड़ जुटाने तक में सहयोग कर चुके हैं, इसलिए हैरानी नहीं हुई।

कौन बनेगा मेयर
एक बार फिर पूरे सूबे में निकाय चुनाव को लेकर हलचल मची है, लेकिन इसे लेकर जितना उत्साह मानगो में है, उतना शायद कहीं नहीं होगा। क्योंकि यहां निगम का बोर्ड लगे दस साल हो गए, लेकिन कभी चुनाव नहीं हुआ। चूंकि पहली बार मानगो में इतिहास रचने की संभावना है, इसलिए मेयर को लेकर एक बार फिर अखाड़े में उतरने वाले पहलवान बेताब हो गए हैं। कई तो विधायक के चुनाव में नेट प्रैक्टिस करने वाले भी उतरेंगे, तो कुछ अपनी विरासत को आगे बढ़ाने के लिए उतर रहे हैं। इसके लिए कागजी कील-कांटे दुरुस्त किए जा रहे हैं, ताकि ऐन वक्त पर सिलाई न फट जाए। पिछली बार ऐसा ही हुआ था, तो रसूखदार ने पूरे सूबे का चुनाव कैंसल करा दिया था। आरोप तो ऐसा ही लगता है, सच्चाई का पता नहीं। उधर, मानगो में चुनाव रोकने के लिए एक बड़ा धड़ा तैयार है।
मुखियापति का तमगा नहीं चाहिए
बिहार में जब पहली बार पंचायत चुनाव हुए, तो वहीं से मुखियापति नामक शब्द हवा में तैरने लगा। इसका भावार्थ यही निकलकर आया कि लिखा-पढ़ी में मुखिया के पद पर पत्नी रहेगी, लेकिन वास्तविक मुखिया उसका पति रहेगा। आज भी बिहार में मुखियापति का कांसेप्ट उसी तरह चल रहा है। यही, उदाहरण अन्य पदों के लिए भी दिया जाने लगा, जहां महिलाएं पुरुषों से मुकाबला करती दिख रही हैं। कुछ इसी तरह का मामला अपने यहां भी ऐसा मामला सामने आया, तो मिथक तोड़ने के लिए पति न केवल अलग पहचान बनाने में सक्रिय हो गए, बल्कि उससे हटकर विशिष्ट दिखने की कोशिश में भी जुट गए। इसके लिए समाजसेवा के आजमाए हुए नुस्खों का सहारा लिया जा रहा है, ताकि फेल न हों। वैसे वे काफी पहले से समाज के प्रति समर्पण दिखाते रहे हैं, लेकिन इस बार का आइडिया कुछ अलग दिखा था।
कीचड़ तो पड़ेंगे ही
कोई भी बड़ी चीज आसानी से नहीं मिलती है। काफी संघर्ष करने के बाद बेशकीमती चीज मिलती है, इसलिए उसकी वैल्यू भी अधिक होती है। बात कमल की हो तो जाहिर सी बात है कि उसे यदि आप तालाब में घुसकर निकालेंगे तो चेहरे या शरीर पर कीचड़ के छींटे पड़ेंगे ही। लेकिन, यहां बात कुछ ऐसे लोगों की हो रही है, जो कमल हासिल करने के बाद दोबारा उसे कीचड़ में समर्पित करने की मंशा रखते हैं। हाल के दिनों में करीब आधा दर्जन नाम ऐसे सामने आए, जो कमल के साथ तालाब के कीचड़ में स्नान करते दिखे। हालांकि, इनकी चर्चा कमल वालों में ही हो रही है, इसलिए बाहरी दुनिया को इन पर लगा कीचड़ नहीं दिखेगा। ये इसी बात से निश्चिंत हैं कि दल का मामला दलदल में ही सुलझा लेंगे। जैसे यहां तक आ गए थे, आगे भी पहुंच ही जाएंगे।

