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Hindi Poetry : हिंदी कविता : ‘कैसे’

by Vivek Kumar Shukla
Hindi Poetry
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कैसे लिखूँ कि तुम्हारी याद आती है
मुझे डर है कि
मेरे शब्द नाकाफ़ी हैं
कि कोई पढ़ न ले मेरे शब्द
जो इतने पवित्र हैं
कि किसी और छूने भर से
मुरझा जाएँगे
मुझे ईज़ाद करनी है
एक जादुई भाषा
जो सिर्फ़ तुम कहो
मैं समझूँ
और तुम कहो भी ना
तो मैं समझ लूँ
जैसे कि
मैं कहूँ कि
मेरे आँगन के सेब के पेड़ों में लग गए हैं फूल
और तुम समझ लो
कि मैं प्यार के बारें में लिख रहा हूँ
मैं कहूँ कि
वो हर हिलती हवा के साथ खिलखिलाते हैं
तो तुम समझ लो कि
तुम्हारी हँसी की याद आती है
जैसे तुम कहो
कि पक गए हैं
तुम्हारे माथे के बाल
और मैं समझूँ
कि
तुम्हें नींद नहीं आती मेरे बिन
जैसे मैं कहूँ
कि गिर रहे हैं मेरे बाल
और तुम समझो
कि
जैसे गिरते बाल बेमानी है
अंतहीन यात्रा में
वैसे है हर दिन
तुम बिन रहना
सुनो जब कुछ कह न पाओ
तुम बस कह देना कि
आम में आ गए हैं बौर
मैं समझ जाऊँगा
कि तुमने मुझे याद किया है

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