Home » Shaharnama : शहरनामा : डिब्बे में जिन्न

Shaharnama : शहरनामा : डिब्बे में जिन्न

by Birendra Ojha
saharnama
WhatsApp Group Join Now
Instagram Follow Now

आज लोकतंत्र के तीसरे स्तर का महापर्व मनाया जाएगा। यह चुनाव ईवीएम से नहीं, उसी डिब्बे से होने जा रहा है, जो पहले जिन्न के नाम से मशहूर था। जो जीत जाता था, उसके लिए और जो हारता था, उसके लिए भी जिन्न पर ही ठीकरा फूटता था। यानी, यह मानकर चला जाता था कि लोहे के खाली बक्से में जिन्न मौजूद हो जाता है। अब तो तीसरी आंख की निगहबानी रहती है, लेकिन जिन्न तो हवा में ही मौजूद रहता है, उसे भला कोई कैसे देख पाएगा। जब वोटों की गिनती होगी, तभी पता चलेगा कि जिन्न ने किससे दोस्ती निभाई और किससे दुश्मनी। शायद यही वजह है कि अंतिम समय तक कमल-दल वाले इसके खिलाफ बोलते रहे। खैर, अब क्या हो सकता है, इसका निर्णय तो उन्होंने लिया था, जो पेटी पर भरोसा करते हैं। उनका कहना है कि इसमें सेटिंग-गेटिंग नहीं हो सकती है।

Read Also: Jharkhand shaharnama : शहरनामा : बोरी का बढ़ गया था वजन्र

दलबदल का रिकॉर्ड

अपने शहर के एक नेताजी काफी गरियाने-धकियाने के बाद ऐसे दल में घुस गए, जहां से निकलने का रास्ता आसान नहीं होता। वहां मनमर्जी भी नहीं चलती है। हालांकि ऐसी बात नहीं है कि उन्हें यह सब पता नहीं था। सब पता था, उन्हें तो दलबदल का रिकॉर्ड बनाने का जुनून सवार है। जीते-जी वह इस कीर्तिमान को छू लेना चाहते हैं, जो आज तक इस शहर का कोई नेता नहीं कर सका। दो-तीन दल बदलने वाले तो बहुतेरे मिल जाएंगे, आधा दर्जन का रिकॉर्ड अब तक इनके अलावा किसी के पास नहीं है। सोच रहे हैं कि चार साल बाद ही सही, कहीं गठबंधन नहीं हुआ तो पुरानी सीट से उम्मीदवार बनकर जीतने का चांस रहेगा। खुद को टिकट नहीं मिला, तो बेटे को खड़ा कर देंगे। यदि ऐसा हुआ तो दूरदर्शी का खिताब भी मिल जाएगा। इससे पहले कई झंडे थाम कर देख चुके हैं।

Read Also- Jharkhand shaharnama : शहरनामा : बोरी का बढ़ गया था वजन्र

एक्शन-कट का खेल

फिल्मों की शूटिंग में हम अक्सर देखते हैं कि जैसे ही डायरेक्टर एक्शन बोलता है, कैमरा ऑन हो जाता है। कुछ ही पल में जरा सी भी हरकत इधर-उधर हुई कि डायरेक्टर कट… कट… बोलने में देर नहीं लगाता। यह तो हुई फिल्मों की बात, वास्तविक दुनिया में ऐसा ही एक्शन और कट का खेल पिछले दिनों सरकारी महकमे में देखने को मिला। यहां कैमरा की जगह छेनी-हथौड़ी लिए मजदूर एक बिल्डिंग की छत पर चढ़े थे। एक्शन बोलते ही छत पर छेनी की छन…छन.. और हथौड़े की धड़-धड़… वाली आवाज गूंजने लगी। जिसकी छत टूट रही थी, उसका कलेजा फट रहा था। स्क्रिप्ट के मुताबिक, सरकारी महकमे के डायरेक्टर मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। छत वाला समझ गया, उसने भी आंखों ही आंखों में इशारा किया। बस क्या था, कुछ टूटने- फूटने से पहले ही कट-कट… की आवाज गूंजी, सन्नाटा छा गया। दर्शक क्लाइमेक्स नहीं देख सके।

Read ALso- Jharkhand Shaharnama : शहरनामा : घाट-घाट पर फोकस

पर उपदेश कुशल बहुतेरे

एक कहावत है, पर उपदेश कुशल बहुतेरे। इसका अर्थ तो आप जानते ही होंगे। इसका सीधा मतलब है कि दूसरों को उपदेश देना आसान है, खुद अमल में लाना कठिन। लोकतंत्र में भी ऐसा ही खेल चल रहा है। एक दल, जो लोकतंत्र की रक्षा करने की दुहाई देते हुए नहीं थकता है, उसके अंदर ही दीमक लग चुकी है। वहां चुनाव तो होता है, लेकिन पर्चा वही भरता है, जिसकी जीत तय रहती है।

Read Also- Shaharnama : शहरनामा : नेताजी बंगाल की ओर

हारने वाला उम्मीदवार मन मसोसकर जीतने वाले को लड्डू खिलाते हुए फोटो खिंचाता है। लेकिन इसके लिए भी उसे जीत की औपचारिक घोषणा होने का इंतजार करना पड़ता है। इस दल में नीचे से ऊपर तक सर्वसम्मति बन जाती है। दूसरे दलों में तो चुनाव के नाम पर ही जूतमपैजार शुरू हो जाती है। घोषणा के दिन तो धक्का-मुक्की तक होती है। चुनाव पर्यवेक्षक सही सलामत निकल जाए, वही बहुत है।

Read Also- Shaharnama : शहरनामा : नेताजी बंगाल की ओर

Related Articles

Leave a Comment