जमशेदपुर : वीर भूमि भोगनाडीह में हर वर्ष 22 दिसंबर को धूमधाम से मनाया जाने वाला संथाल परगना स्थापना दिवस कार्यक्रम इस बार स्थगित कर दिया गया है। शहीद वीर सिदो-कान्हू हूल फाउंडेशन के आयोजकों ने जिला प्रशासन द्वारा लगाई गईं अनेक कड़ी शर्तों को कारण बताते हुए यह निर्णय लिया। पूर्व मुख्यमंत्री एवं भाजपा नेता चंपाई सोरेन ने इस फैसले पर राज्य सरकार और जिला प्रशासन पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने इसे आदिवासी समाज के लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला करार दिया।
चंपाई सोरेन ने कहा कि प्रशासन की तानाशाहीपूर्ण शर्तों के चलते फाउंडेशन को कार्यक्रम स्थगित करना पड़ा। उन्होंने चुनौती देते हुए घोषणा की कि आगामी 30 जून 2026 को हूल दिवस पर झारखंड, पश्चिम बंगाल, बिहार और ओडिशा से लाखों आदिवासी रथ यात्रा के साथ भोगनाडीह पहुंचेंगे। “अगर सरकार में हिम्मत है तो हमें रोककर दिखाए।”
प्रशासन की मंशा थी विवाद पैदा करना : मंडल मुर्मू
शहीद सिदो-कान्हू के वंशज एवं फाउंडेशन के प्रमुख मंडल मुर्मू ने बताया कि प्रशासन द्वारा लगाई गईं शर्तें देखकर लगा कि जानबूझकर आयोजकों को किसी विवाद या रंजिश में फंसाने की कोशिश की जा रही है। विचार-विमर्श के बाद कार्यक्रम स्थगित करने का कठिन निर्णय लिया गया। मुर्मू ने कहा कि यह आयोजन आदिवासी इतिहास और संस्कृति का प्रतीक है, लेकिन प्रशासनिक अड़चनों ने इसे बाधित किया।
दमनात्मक कार्रवाई की थी साजिश : चंपाई
चंपाई सोरेन ने आरोप लगाया कि कार्यक्रम की अनुमति के लिए दो सप्ताह तक आवेदन लटकाए रखने के बाद 20 दिसंबर को अचानक दर्जन भर मजिस्ट्रेट नियुक्त कर कई असंगत शर्तें थोप दी गईं। उन्होंने इसे साजिश बताया और कहा कि प्रशासन की मंशा शर्तों की आड़ में दमनात्मक कार्रवाई करने की थी। सोरेन ने पूछा कि इतनी बड़ी संख्या में मजिस्ट्रेट तैनात करने की क्या आवश्यकता थी, जबकि उस दिन कोई अन्य सरकारी कार्यक्रम नहीं था।
प्रशासन की शर्तों पर उठी उंगली
प्रशासन की शर्तों में 30 वॉलेंटियर की आधार कार्ड सहित लिस्ट थाने में जमा करने, स्टेडियम के बाहर गेट लगाने पर रोक, ट्रैफिक प्रबंधन और नशा मुक्ति की जिम्मेदारी आयोजकों पर थोपना शामिल था। चंपाई सोरेन ने व्यंग्य करते हुए कहा कि जब सड़क पर चलने की इजाजत ही नहीं, तो लाखों की भीड़ आसमान से उतरेगी क्या? ट्रैफिक और नशा मुक्ति आयोजकों की जिम्मेदारी है तो पुलिस क्या करेगी- सिर्फ आदिवासियों पर लाठीचार्ज?
साहिबगंज में अघोषित प्रतिबंध? चंपाई ने उठाए सवाल
सोरेन ने कहा कि वे जनप्रतिनिधि के रूप में राज्य के विभिन्न जिलों में कार्यक्रम करते रहे हैं, लेकिन साहिबगंज में ही समस्या क्यों? उन्होंने नगड़ी आंदोलन का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि सरकार दमन की भाषा समझती है तो आगे भी यही रास्ता अपनाया जाएगा। “देखते हैं कितनी एफआईआर दर्ज होती हैं और जेलों में जगह कितनी है।”यह घटना आदिवासी समाज में व्यापक असंतोष पैदा कर रही है। आयोजकों ने उम्मीद जताई कि भविष्य में ऐसे आयोजनों को बिना अड़चन के अनुमति मिलेगी।
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