स्टेट डेस्क,पटना : बिहार में राजनीतिक परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। एक तरफ मॉनसून सत्र के तमाम हंगामें के बाद भी नीतीश कुमार ने चुप्पी साध रखी है। वहीं दूसरी तरफ उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने मोर्चा संभाल रखा है। नीतीश कुमार की चुप्पी राजनीतिक भूचाल के संकेद दे रही है। क्योंकि राजनीतिक पंडितों का कहना है कि जब-जब नीतीश कुमार ने चुप्पी साधी है कुछ न कुछ चौकाने वाला किया है।
वहीं एनडीए की बात करे तो वहां भी सब ठीक नहीं है। लोकसभा चुनाव की एक-एक सीटों पर गंभीरता पूर्वक विचार कर रणनीति बनाने में माहिर भाजपा बिहार में अपने कुनबे को बढ़ाने का प्रयास कर रही है। ताकि विभिन्न जातीय समीकरणों को साध कर बिहार में पुराने रिकॉर्ड को बरकरार रखा जा सके।
यही वजह है कि भाजपा ने हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम ) को एनडीए में शामिल करवा लिया। वहीं, अब तक एनडीए से दूर रह रहे चिराग पासवान को भी एनडीए में शामिल होने के लिए न्योता भेजा गया है। इसकी घोषणा कभी भी हो सकती है। इसके साथ ही उनके चाचा पशुपतिनाथ पारस पूर्व से एनडीए का हिस्सा हैं ही, लेकिन इन सबके बीच चौंकाने वाले दो नाम हैं, जिन्हें भाजपा ने 18 जुलाई को होने वाली एनडीए की बैठक के लिए न्योता नहीं भेजा है।
जबकि दोनों के साथ भाजपा नेताओं की समय-समय पर मुलाकात होती रही है। इसे लेकर बिहार के साथ ही देश की राजनीति में चर्चा का बाजार गर्म है। आईये जानते हैं कि अलग-अलग पार्टियों के लिए आखिर क्या है भाजपा का गेम प्लान
हिदुस्तानी आवाम मोर्चा : पटना में 23 जून को हुई महागठबंधन की बैठक से ठीक दो दिन पहले हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के चार विधायक एनडीए में शामिल हो गये। उनके शामिल होने से पूर्व केंद्रीय गृहराज्य मंत्री नित्यानंद राय ने मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान आगामी चुनाव में सीटों के बंटवारे में सम्मानजनक भागीदारी देने की बात कही गयी। हालांकि मीडिया में जीतनराम मांझी ने कहा कि सिर्फ एनडीए में शामिल होने का फैसला हुआ है।
समय आने पर वह भी हो जायेगा। सूत्रों के अनुसार भाजपा ने जीतनराम मांझी के बेटे सतोष कुमार सुमन को एक सीट देने का वायदा किया है। जबकि जीतन राम मांझी को किसी राज्य का राज्यपाल बना कर एडजस्ट करने का भरोसा दिलाया है। हालांकि, यह होगा 2025 के बाद। क्योंकि जीतनराम मांझी को एनडीए में शामिल करने का गेम प्लान ही यह है कि चुनाव प्रचार के दौरान बिहार में कुछेक इलाके में प्रभारी जीतनराम मांझी का इस्तेमाल मांझी समुदाय के वोटरों को अपने पाले में करने के लिए किया जाए।
राज्यपाल बना दिये जाने के बाद ऐसा नहीं हो सकता है। यही कारण है कि उन्हें फिलहाल दो साल तक इंतजार करने को कहा गया है। इससे पूर्व लोकसभा चुनाव में उनके बेटे को एक सीट जबकि विधानसभा चुनाव में करीब एक दर्जन सीटें देने पर सहमति बनी है।
चिराग पासवान अपनी शर्तो पर अड़े, बार्गेनिंग का दौड़ जारी : लोक जनशक्ति पार्टी ( रामबिलास ) के प्रमुख चिराग पासवान को भी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने 18 जुलाई को दिल्ली के होटल अशोका में होने वाली एनडीए की मीटिंग में शामिल होने के लिए पत्र भेजा है। इस पत्र को स्वीकार करने के साथ ही यह भी तय हो गया है कि चिराग पासवान उक्त बैठक में शामिल होंगे।
भाजपा चिराग पासवान को अपने साथ लाकर बिहार के पासवान समाज के वोटरों के साथ ही युवाओं को अपने साथ लाना चाहती है। उनके साथ पहले से ही चिराग के चाचा पशुपति पारस हैं ही, लेकिन बिहार में चिराग पासवान के बढ़ते एक्सेप्टेंस को देखते हुए भाजपा ने उन्हें एनडीए में शामिल कराया है। हालांकि, सूत्रों के अनुसार चिराग भले उक्त बैठक में शामिल हो रहे हैं लेकिन उनकी डील अभी फाइनल नहीं हुई है।
चिराग की जो शर्तें हैं उससे भाजपा के माथे पर बल पड़ सकता है। कारण है कि चिराग किसी भी हाल में लोकसभा में छह सीटों से कम सीट लेने को तैयार नहीं है। साथ ही उन्होंने एक राज्यसभा की सीट व अपने पिता की परंपरागत सीट हाजीपुर सीट पर दावा ठोंका है। जबकि यह सीट फिलहाल पशुपति पारस के पास है। पारस किसी भी हाल में हाजीपुर सीट छोड़ने को तैयार नहीं है। चिराग यह भी चाहते हैं कि उनकी पार्टी उन्हें मूल रूप से वापस मिल जाए।
हालांकि, मीडिया में चिराग यह कह रहे हैं कि शर्तों पर कोई बातचीत नहीं हुई है, कहा गया है कि आगे मिल बैठ कर सारा कुछ क्लियर कर लिया जायेगा। हालांकि, बिहार में इन दिनों यह भ चर्चा तेज है कि भाजपा तब तक ही पूछती है जब तक उसका हित नहीं सध जाता है। हित सधने के बाद राजनीतिक पार्टियों को ना सिर्फ तोड़ देती है बल्कि बंगला भी खाली करवा देती है। इस बात को इससे भी जोड़ कर कहा जा रहा है कि पिछले विधानसभा चुनाव में जेडीयू को हराने के लिए या फिर कमजोर करने के लिए चिराग ने भाजपा के लिए बैकडोर से काम किया था।
काफी हद तक वे इसमें सफल भी रहे। लेकिन जब बिहार में भाजपा व जेडीयू ने गठबंधन कर सरकार बना लिया तो दिल्ली में रामबिलास पासवान का बंगला भी खाली करवा लिया गया। राजनीतिक के धुरंधर यह भी कह रहे हैं कि चिराग पासवान भले 18 की बैठक में शामिल हो रहे हैं, लेकिन डील फाइनल नहीं होने पर वे एनडीए का हिस्सा नहीं बनने की भी घोषणा कर सकते हैं। चिराग व तेजस्वी के बीच अच्छे रिश्ते हैं। दोनों के बीच अच्छी बातचीत होती है।
चिराग को जेडीयू व नीतिश कुमार से समस्या है, लेकिन आरजेडी से नहीं। बिहार में चिराग पासवान को तेजस्वी यादव के समर्थकों द्वारा उन दिनों की याद भी दिलायी जा रही है जब रामबिलास पासवान लोकसभा का चुनाव हार गये थे, और दिल्ली में उन्हें बंगला खाली करने को कहा गया था। उस वक्त आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने आरजेडी के विधायकों की वोट से रामबिलास पासवान को राज्यसभा भेज दिया था।
इसके बाद बंगला खाली होने से बच गया था। जानकारों के अनुसार चिराग पासवान की मांगें अगर एनडीए में नहीं मानी जाती है तो वे संभव है कि वे तेजस्वी के साथ नजदीकी बढ़ा सकते हैं।
अब बात करते हैं पशुपति पारस की : पशुपति पारस को फिलहाल केंद्र में मंत्री बनाया गया है. वे एनडीए के साथ पूर्व से ही हैं। भाजपा उन्हें व चिराग पासवान को साथ बिठा कर सुलह करवाने का प्रयास करेगी। हालांकि, पशुपति कुमार पारस ने कहा कि राजनीति में पार्टियां टूटती है, फिर मिल जाती हैं। लेकिन यहां तो पार्टी नहीं बल्कि दिल और परिवार टूटा है। आने वाले दिनों में संबव है कि पशुपति कुमार पारस अपनी, अपने बेटे की सीटें पक्की करने के बाद दो अन्य सीटों पर मान जायेंगे। इससे भाजपा मजबूत होगी।
मुकेश सहनी की नैया खा रही हिचकोले : वीआइपी पार्टी के प्रमुख मुकेश सहनी की किस्मत अक्सर बेवफा होती आयी है। महागठबंधन से अलग होने के बाद उन्हें उम्मीद थी कि एनडीए में शामिल होने का बुलावा आयेगा, लेकिन उन्हें बुलावा नहीं आया। आखिर बुलावा क्यों नहीं आया, उसे लेकर बिहार की राजनीति में तरह-तरह की चर्चाओं का बाजार गर्म है। सूत्रों के अनुसार मुकेश सहनी इन दिनों दिल्ली में ही हैं। उन्होंने भाजपा के बड़े नेताओं से बातचीत भी की है। उन्होंने शर्त रखी कि किसी भी कीमत पर उनकी सीटें चिराग पासवान से कम नहीं होनी चाहिए।
निषाद क्रांति के माध्यम से बिहार में एक ताकतवर नेता के रूप में स्थापित मुकेश सहनी भाजपा के साथ ही महागठबंधन से भी पूर्व में धोखा खा चुके हैं। उन्हें अपना मंत्री पद छोड़ना पड़ा था। कारण था कि भाजपा ने उनके एमएलसी का टर्म रिन्युअल नहीं किया। उनके विधायकों को भाजपा ने अपनी पार्टी में शामिल करा लिया। यही कारण है कि मुकेश सहनी इस बार किसी भी बड़े कुनबे में शामिल होने से पूर्व अपनी शर्तों को पूरा करवाना चाहते हैं।
मुकेश सहनी पिछली बार की तरह इस बार कोई गलती नहीं करना चाहते हैं, यही कारण है कि उन्होंने यह शर्त रखी है कि लोकसभा चुनाव में जो भी उम्मीजवार होंगे, वे उनके होंगे। ऐसी बात नहीं होगी कि भले सीट उन्हें दे दिया गया हो लेकिन भाजपा उस सीट पर अपने उम्मीदवार उतार दे। बाद में किसी प्रकार की खटपट होने पर वे पार्टी तोड़ दें। मुकेश सहनी पूरी ताकत से चुनाव की तैयारी में जुट गये हैं।
पार्टी में स्वच्छ छवि के लोगों को शामिल करवाया जा रहा है। पिछले दिनों सीमा कुशवाहा को शामिल किया गया, रिटायर्ड आइपीएस बीके सिंह को भी शामिल किया गया। जानकारों से अनुसार बीके सिंह को वीआइपी आरा लोकसभा सीट से चुनाव लड़वाना चाहती है, जबकि अभी उस सीट से भाजपा के आरके सिंह सांसद हैं। उनका टिकट काट कर वीआइपी को देना भाजपा के लिए फिलहाल संभव नहीं है। भाजपा कुछ दिनों तक मुकेश सहनी से दूरी बना कर रखेगी, ताकि वे अपनी शर्तों में थोड़ा लचीलापन लाए।
उपेंद्र कुशवाहा जनाधार बढ़ाने में जुटे : राष्ट्रीय लोक समता पार्टी प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के साथ भी बिहार में खेला हो गया है। जिस एनडीए में शामिल होकर चुनावी राजनीति में अपनी ताकत बढ़ाने के लिए उन्होंने नीतिश कुमार से बगावत कर ली थी, उसी एनडीए ने उन्हें 18 जुलाई को होने वाली बैठक में शामिल होने के लिए बुलावा भी नहीं भेजा है।
राजनीतिक पंडित कहते हैं कि उपेंद्र कुशवाहा से भाजपा नेता जो डील कर रहे थे, वह फाइनल नहीं हो सका। वे आगामी लोकसभा चुनाव में काराकाट समेत कुल तीन सीटें मांग रहे थे। इसके साथ ही सरकार बनने में केंद्र में मंत्री पद के साथ ही एक राज्यसभा की सीटें भी उपेंद्र कुशवाहा से मांग रहे थे। लेकिन यह भाजपा को नागवार गुजरी। उसके बाद उन्होंने नीलमणी के साथ भी बातचीत शुरू की।
नीलमणी लगातार उपेंद्र कुशवाहा पर हमलावर हैं। फिलहाल भाजपा प्रेशर पॉलिटिक्स में उपेंद्र कुशवाहा से दूरी बना कर रख रही है ताकि शर्तों कुछ हद तक कम हों. इस बीच कुशवाहा राज्य भर में घुम-घुम कर पार्टी को संगठित करने में जुटे हुए हैं।

