जमशेदपुर : एक जनवरी 1948 को हुए खरसावां गोलीकांड के शहीदों को चिन्हित करने के लिए एक कमेटी बनाई जाएगी। इसका मसौदा तैयार हो गया है। इस बात का एलान सीएम हेमंत सोरेन ने गुरुवार को खरसावां शहीद स्थल से किया। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन गुरुवार एक जनवरी 2026 को खरसावां पहुंचे। यहां वह सीधे शहीद स्थल गए और खरसावां गोली कांड के शहीदों को श्रद्धांजलि दी। सीएम के साथ झारखंड के मंत्री दीपक बिरुवा, सिंहभूम की सांसद जोबा मांझी, चक्रधरपुर के विधायक सुरखराम उरांव,खरसावां के विधायक दशरथ गागराई और ईचागढ़ की विधायक सविता महतो भी हैं। सभी ने शहीदों को श्रद्धांजलि दी। इसके बाद सीएम सभा स्थल पर पहुंचे जहां उनका जोरदार स्वागत किया गया। शहीद स्मारक समिति की तरफ से मुख्यमंत्री का स्वागत किया गया। बाद में पत्रकारों से बात करते हुए सीएम ने कहा कि खरसावां शहीद पार्क को भव्य बना कर जल्द ही आम जनता के लिए खोल दिया जाएगा। इस पर काम चल रहा है। एक पत्रकार ने सवाल किया था कि शहीद पार्क साल भर बंद रहता है। इस वजह से यहां झाड़ियां उग आती हैं। यह पार्क एक जनवरी को ही खोला जाता है।

इस मौके पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि खरसावां के गोलीकांड के शहीदों को खोज खोज कर सम्मान दिया जाएगा। इसका मसौदा तैयार कर लिया गया है। सीएम ने कहा कि यह मसौदा हमारे पास आ गया है। हम इसे समझ रहे हैं। देख रहे हैं कि इसमें प्रशासनिक अधिकारियों को क्या रोल होगा। कैसे शहीदों को चिन्हित किया जाएगा। हम पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद ही इस मसौदे पर मुहर लगाएंगे। शहीदों की खोज के लिए कमेटी बनाई जाएगी। रिटायर जज इसमें रखे जाएंगे। अगले साल के शहीद दिवस से पहले ही इस गोलीकांड के शहीदों को खोज कर उन्हें सम्मान दिया जाएगा।
आज शहीद दिवस और साल की पहली तारीख भी है। पूरी दुनिया के लिए नया साल हैपी न्यू इयर का दिन है। मगर, झारखंड के आदिवासी, मूलवासी, किसान और मजदूरों के लिए यह शहीद दिवस है। लोग आज पिकनिक मना रहे हैं। मगर, हम सब यहां शहीदों को याद करने के लिए जुटे हैं। झारखंड प्रदेश का इतिहास गौरवपूर्ण इतिहास है। कोल्हान हो या संथाल का इलाका हो। चाहे उत्तरी दक्षिणी छोटा नागपुर हो या पलामू प्रमंडल। इन इलाकों का इतिहास शहीदों से भरा है। इतने शहीद शायद ही किसी राज्य में हों, जितने झारखंड में हैं। यहां की जल-जंगल, जमीन और यहां के मूलवासियों और यहां की खनिज संपदा को लूटने के लिए आमादा हैं। यह काम आज से नहीं सौ साल पहले से चल रहा था। इसी को बचाने के लिए यहां के वीर सपूतों ने अपनी जान की कुर्बानी दी है। हम अंग्रेजों से लड़े। कभी पुलिस की गोली खाई। हेमंत सोरेन ने कहा कि हम लोग लड़े हैं तभी बचे हैं। इसकी सबसे बड़ी मिसाल खरसावां शहीद दिवस है। हम ऐसे वीर सपूतों के वंशज हैं जिन्होंने कभी हार नहीं मानी। चाहे वह अंग्रेजों का शासन हो या पुलिस का बर्बर अत्याचार। इसी जज्बे को कायम रखने के लिए हम वीर शहीदों को याद रखते हैं और उनके समाधि स्थल पर आकर शीष झुकाते हैं।
किसान और मजदूरों को आजकल कोई कुछ देने वाला नहीं है। बल्कि, उनके अधिकार को छीनने वाले लोग हैं। कोई पूंजीपति कभी हमारे आंख के आंसू नहीं पोंछेगा। सीएम ने कहा कि जब भी उन्हें मौका मिला शहीदों को नमन कर अपना संघर्ष किया। इसका परिणाम भी हमें मिल रहा है। इसीलिए हम शहीदों को सम्मान दे रहे हैं। सीएम संताल परगना के वीर सिद्धू कान्हों का नाम लिया।
सीएम ने कहा कि हम मइयां सम्मान योजना के तहत महिलाओं को 2500 रुपये प्रति माह दे रहे हैं। जबकि, पड़ोसी राज्यों में विरोधी सिर्फ एलान कर सरकार बना रहे हैं, योजना को धरातल पर नहीं उतार रहे हैं। सीएम ने कहा कि झारखंड को अग्रणी राज्य की पंक्ति में खड़ा करना है। सीएम ने दिशोम गुरु शिबू सोरेन को भी याद किया। उन्होंने कहा कि दिशोम गुरु की वजह से ही झारखंड अलग राज्य मिला है।
शहीदों के चिन्हीकरण का काम दोबारा शुरू करने की दशरथ गागराई ने उठाई मांग
इसके पहले खरसावां के विधायक दशरथ गागराई ने माइक संभाला था। उन्होंने कहा कि आजााद भारत के इतिहास में यह बड़ा गोलीकांड है। यह गोलीकांड तब हुआ जब देश की आजादी के साढ़े चार महीने के बाद ही जब पूरा देश नए साल का जश्न मना रहा था तभी ओडिशा सरकार ने यहां की आदिवासी समाज के लोगों पर गोली चला दी गई। तब से एक जनवरी को आदिवासी समाज नए साल का जश्न नहीं मनाता। तब से आदिवासी समाज एक जनवरी को शोक दिवस के रूप में मनाते हैं।
झारखंड ही नहीं ओडिशा, बंगाल और छत्तीसगढ़ से आदिवासी समाज के लोग खरसावां आ कर शोक दिवस में शामिल होते हैं। उन्होंने कहा कि अब तक सरकार की तरफ से उन लोगों को चिन्हित नहीं किया जा सका था कि इस गोलीकांड में कौन-कौन शहीद हुआ। दशरथ गागराई ने कहा कि जब वह साल 2014 में पहली बार विधायक बने तो उन्होंने विधानसभा में मांग उठाई कि एक न्यायिक जांच आयोग गठित कर शहीदों को चिन्हित किया जाए।
इसके बाद तत्कालीन सीएम रघुवर दास ने एक जांच आयोग गठित किया। इसके बाद दो शहीदों खरसावां के महादेव बूटा और कुचाई के बाईडीह के सिंगराय बोदरा को चिन्हित कर उनके परिजनों को एक-एक लाख रुपये दिए गए। मगर बाद में साल 2017 में जब तत्कालीन सीएम रघुवर दास खरसावां शहीद स्थल शहीदों को श्रद्धांजलि देने आए तो सीएनटी-एसपीटी के मुद्दे पर उनका विरोध कर रहे लोगों ने दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से उनका विरोध किया था। उन पर चप्पलें फेंकी गई थी।
इसके बाद शहीदों के चिन्हीकरण का काम रोक दिया गया था। उन्होंने मांग की है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन दोबारा इस काम को शुरू करें। झारखंड के बाहर के लोग भी यहां शहीद हुए थे। उनको भी चिन्हित करने की विधायक ने मांग उठाई। दशरथ गागराई ने कहा कि शहीद स्थल के पास झामुमो का झंडा लगा था। इस झंडे को किसी ने हटा दिया है और वहां दूसरी पार्टी का झंडा लगा दिया है। इस मुद्दे पर विधायक ने कहा कि जिसने यह काम किया है वह अपनी ओछी मानसिकता को त्याग कर अब इस बात पर दिमाग लगाए कि शहीदों को श्रद्धांजलि देने आने वालों को किस तरह से सहूलियत प्रदान की जा सके। झारखंड के मंत्री दीपक बिरुवा और सिंहभूम की सांसद जोबा मांझी ने भी जनता को संबोधित किया।
गौरतलब है कि आजादी के बाद खरसावां को ओडिशा से जोड़ने का एलान किया गया था। इस फैसले के विरोध में आदिवासियों ने आंदोलन शुरू किया। इसी आंदोलन को लेकर आदिवासियों की एक भीड़ खरसावां हाट बाजार में एक जनवरी साल 1948 को जुटी थी। तभी, इस भीड़ पर तत्कालीन पुलिस ने गोली चलाई थी। इस गोलीकांड में कई लोग मारे गए थे। इसी घटना की याद में हर साल एक जनवरी को यहां शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है। इस घटना को दूसरा जलियावाला बाग हत्याकांड कहा जाता है।

