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Jamshedpur Muharram : जमशेदपुर के मुहर्रम में दिख रही एकता की झलक, जानें क्या है मुहर्रम की घटना

मजलिसों में शिरकत कर रहे हर धर्म व फिरके के लोग, चारों तरफ पहुंच रहा इंसानियत का पैगाम

by Mujtaba Haider Rizvi
Jamshedpur Muharram साकची में हुसैनी मिशन का आयोजन
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Jamshedpur Muharram : जमशेदपुर में मुहर्रम का पर्व पूरे अकीदत और एहतेराम के साथ मनाया जा रहा है। साकची और मानगो में मजलिसों का सिलसिला जारी है। मानगो में जाकिर नगर के हुसैनी मोहल्ला में इमामबारगाह में सुबह 10 बजे तो साकची में हुसैनी मिशन के इमामबाड़े में रात आठ बजे मजिलस का आयोजन हो रहा है। साकची के हुसैनी मिशन के इमामबाड़े में मनाया जा रहा मुहर्रम सामाजिक एकता का प्रतीक बन रहा है। यहां शिया समुदाय के अलावा अहले सुन्नत समुदाय के अकीदतमंद भी मजलिस में शिरकत कर रहे हैं। यहां होने वाली मजलिस में अहले सुन्नत के बुद्धिजीवियों ने शिरकत की और मजलिस सुनी। अहले सुन्नत बुद्धिजीवी महताब आलम इलाहाबादी ने कहा कि कर्बला ने इंसानियत को हमेशा के लिए जिंदा कर दिया। एक अन्य अहले सुन्नत दानिश्वर प्रोफेसर असलम मलिक ने कहा कि कर्बला हमें सिखाती है कि अत्याचारी के खिलाफ कैसे डट कर खड़े होना है। हुसैनी मिशन की तरफ से मौलाना सैयद सादिक अली, रईस रिजवी, मोहम्मद राशिद, मुनीर हसन आदि ने कहा कि कर्बला एकता का पैगाम देती है और बताती है कि हमें हमेशा मजलूम की मदद करनी चाहिए चाहे वह किसी भी धर्म या फिरके का हो।

Jamshedpur Muharram : क्यों मनाया जाता है मुहर्रम

मुहर्रम इस्लामिक कैलेंडर का एक महीना है। मगर, इसी महीने में बनी उमैया के एक शासक यजीद ने रसूल-ए-अकरम हजरत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के नवासे और अल्लाह की तरफ से तैनात किए गए इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम, उनके खानदान के लोगों और साथियों को शहीद कर दिया था। यह घटना 10 मुहर्रम सन 61 हिजरी को इराक के एक शहर कर्बला में फरात नदी के किनारे अंजाम दी गई थी। यजीद ने अपने सिपहसालार अमर इब्ने साद और गवर्नर बैदुल्लाह इब्ने जियाद को इस काम पर लगाया था। यजीद जब शासक बना तो उसने इमाम हुसैन से बैयत करने को कहा। बैयत करने का मतलब कि यजीद इस्लाम के बारे में जो भी आदेश दे उसका इमाम हुसैन समर्थन करें। इमाम हुसैन ने बैयत करने से इंकार कर दिया। इमाम हुसैन ने कहा कि अल्लाह के जितने भी प्रतिनिधि इस दुनिया में आए किसी ने राक्षसों की बैयत नहीं की। हजरत मूसा ने फिरऔन की बैयत नहीं की। हजरत इब्राहिम ने नमरूद की बैयत नहीं की। इमाम हुसैन ने कहा कि मुझ जैसा तुझ जैसे की बैयत नहीं करता। यह जुमला पिछली दुनिया से लेकर आगे की दुनिया तक लागू होता है। इसका मतलब है कि अल्लाह का नुमाइंदा कभी शैतान के नुमाइंदे की बैयत नहीं कर सकता।

Jamshedpur Muharram : इन हालात में कर्बला पहुंचे थे इमाम हुसैन

इमाम हुसैन मदीने से अपने नाना के रौजे से विदा लेकर धर्म को बचाने के लिए इराक की तरफ रवाना हो गए । जीद ने एक चाल चली थी और अपने जासूसों व चेलों को लगा कर इमाम को खत लिखवाया की कूफे आ जाएं। हम सब आपकी बैयत करेंगे। इस पर इमाम हुसैन ने अपने चचेरे भाई हजरत मुस्लिम को कूफा भेजा। वहां इब्ने ज्याद पहले से ही पहुंच चुका था। वहां हजरत मुस्लिम को यजीदियों ने घेर कर शहीद कर दिया। इसके बाद इमाम हुसैन कूफा न जाकर कर्बला पहुंचे। कर्बला में कम से कम 30 हजार यजीदी फौजें थीं। जबकि, इमाम हुसैन के साथ कुल 72 लोग थे। इमाम के साथ महिलाएं और बच्चे भी थे। इससे साफ है कि वह जंग के इरादे से नहीं निकले थे।

नौ मुहर्रम की रात को ही हो गया था यजीदी हमला

नौ मुहर्रम की रात में ही यजीदियों ने इमाम हुसैन के खेमों पर हमला कर दिया। इसके बाद इमाम के भाई हजरत अब्बास ने यजीदियों से कहा कि एक रात की मोहलत दो ताकि हम सब अल्लाह की इबादत कर लें। रात इमाम ने अपने साथियों की साथ अल्लाह की इबादत में गुजारी। 10 मुहर्रम को सुबह जंग का मैदान सज गया। तय हुआ था कि एक पर एक की जंग होगी। इधर से इमाम हुसैन का एक साथी जंग के मैदान में जाता और जब उससे यजीदी जीत नहीं पाते थे तो युद्ध के कानून का उल्लंघन कर कई लोग घेर कर इमाम के साथी को शहीद कर देते थे। यजीदियों ने सात मुहर्रम से ही इमाम के खैमों में पानी ले जाने पर पाबंदी लगा दी थी। बच्चे प्यासे हुए तो इमाम ने अपने भाई हजरत अब्बास को जंग की अनुमति नहीं देते हुए सिर्फ पानी लाने के लिए भेजा जिन्हें यजीदियों ने शहीद कर दिया। जब सबकी शहादत हो गई तो इमाम हुसैन अपने छह महीने के बच्चे अली असगर को मैदान में लाए और कहा कि इस मासूम बच्चे को तो पानी दे दो। इस पर यजीदियों की तरफ से एक कुख्यात तीरंदाज हुरमुला ने तीन फल वाले वजनी तीर से छह महीने के मासूम असगर को कत्ल कर डाला। हजरत अली असगर की याद में ही मजलिसों में झूला या गहवारा निकाला जाता है।

Jamshedpur Muharram : शिम्र ने किया था इमाम हुसैन को शहीद

आखिर में इमाम हुसैन अपनी चार साल की बेटी सकीना से विदा होने लगे। सकीना ने कहा बाबा हमें पता है कि जो भी मैदान में जाता है जिंदा वापस नहीं आता। बाबा, हमें आपके सीने पर ही नींद आती है। हम रात को कैसे सोएंगे। इमाम हुसैन ने कहा बेटी आज से सिलसिला बदलता है। तुम मां के पास सोना और तुम्हारा भाई अली असगर हमारे पास सोएगा। सकीना ने कहा बाबा अच्छा हमारी आखिरी ख्वाहिश पूरी कर दो। यहीं लेट जाओ थोड़ी देर तक आखिरी बार आपके सीने पर लेट लूं। इमाम ने अपने सीने पर सकीना को लिटाया और इसके बाद मकतल में आए और अपनी शहादत पेश की। यजीदी फौज के शिम्र ने इमाम हुसैन को शहीद किया था।

अमर इब्ने साद और शिम्र ने इमाम हुसैन और उनके साथियों को शहीद कर हजरत मोहम्मद मुस्तफा के घर की महिलाओं को कैद कर लिया था। इन कैदियों को पहले कूफा इब्ने ज्याद के सामने ले जाया गया और इसके बाद सीरिया के दमिश्क भेजा गया। दमिश्क की जेल में तकरीबन एक साल तक रसूल-ए-अकरम की इन महिलाओं को जेल में रखा गया था। इसी घटना की याद में मुसलमान मुहर्रम मनाते हैं।

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