जमशेदपुर : पथ- पीपुल्स एसोसिएशन फॉर थियेटर, जमशेदपुर द्वारा शुक्रवार को बिष्टुपुर स्थित तुलसी भवन में आयोजित नाट्य संध्या के अंतर्गत वरिष्ठ नाटककार विजय तेंदुलकर की चर्चित कृति ‘कन्यादान’ का मंचन किया गया। डेट व सहयोग और तुलसी भवन के संयुक्त प्रयास से हुए मंचन में शहर के सुप्रसिद्ध रंगकर्म प्रेमी दिनेश रंजन, हरि मित्तल, संजय मिश्र, पूरबी घोष, कृष्णा सिन्हा सहित कई गणमान्य दर्शक उपस्थित थे। दर्शक दीर्घा में उपस्थित सभी कलाकारों और रंग-रचनाकारों ने इस मंचन की संवेदनशीलता एवं प्रासंगिकता की सराहना की।
नाटक की विषयवस्तु और सामाजिक संवाद
रंगमंच पर प्रस्तुत ‘कन्यादान’ ने आधुनिक भारतीय समाज में जाति, वर्ग और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच चल रहे संघर्षों को तीखे और यथार्थपूर्ण ढंग से सामने रखा। विजय तेंदुलकर की यह रचना, जिसका अनुवाद बसंत देव ने किया है, दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या सामाजिक परिवर्तन केवल विचारों और भाषणों से संभव है, या फिर व्यक्तिगत जीवन की जमीनी सच्चाइयाँ उन आदर्शों की परीक्षा लेती हैं।
नाटक की कथा एक प्रगतिशील विधान परिषद सदस्य नाथ देवलालीकर और उनकी बेटी ज्योति के साहसिक निर्णय के इर्द-गिर्द घूमती है। चरम क्षण तब आता है जब ज्योति अपने पिता के आदर्शवादी भाषण की वास्तविकता पर प्रश्न उठाती है और यह स्वीकार करती है कि उसका पति अरुण अपनी कमियों और हिंसक प्रवृत्तियों के बावजूद वही व्यक्ति है जिसे वह पूर्ण रूप से स्वीकार करना चाहती है। यह प्रसंग दर्शकों के सामने वह कठिन प्रश्न खड़ा करता है कि क्या कल का शोषित आज का शोषक बन सकता है, और क्या मध्यवर्गीय आदर्शों की कीमत संवेदनशील जीवनों को चुकानी पड़ती है।
इन पात्रों का दमदार रहा अभिनय
सबा शेख – (ज्योति), सुमन नायक – (अरुण आठवले), आशुतोष कुमार – (जय प्रकाश), रहमत – (हामीर राव), छवि दास – (सेवा) व मोहम्मद निज़ाम – (नाथ देवलालीकर)
सभी कलाकारों ने अपने किरदारों की जटिलताओं को उत्कृष्टता से निभाया और दर्शकों को नाटक के भावनात्मक, वैचारिक और सामाजिक पहलुओं से गहराई से जोड़ने में सफल रहे।
निर्देशक मो. निजाम ने नाटक की संवेदना, राजनीतिक संदर्भ, और चरित्रों के भीतर के संघर्षों को प्रभावशाली तरीके से रूपायित करते हुए विचारोत्तेजक संवाद स्थापित किया। मंच सज्जा में रुपेश प्रसाद, पार्श्व संगीत नीतीश राय और मंच आलोक की जिम्मेदारी खुर्शीद आलम ने भूमिका निभाई।
पथ, जमशेदपुर द्वारा आयोजित यह नाट्य संध्या न केवल एक उच्च कोटि की कलात्मक प्रस्तुति थी, बल्कि सामाजिक प्रश्नों, विचारों और परिवर्तन की जटिल अवधारणाओं पर एक सशक्त विमर्श भी। ‘कन्यादान’ का यह मंचन दर्शकों के मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ गया और समाज के प्रति थिएटर की जिम्मेदारी और प्रासंगिकता को पुनः स्थापित किया।
— पथ (पीपुल्स एसोसिएशन फॉर थियेटर), जमशेदपुर
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