Home » Jharkhand Bureaucracy :  नौकरशाही : निवासन का निर्वासन!

Jharkhand Bureaucracy :  नौकरशाही : निवासन का निर्वासन!

Jharkhand Bureaucracy : लोकतंत्र के तीन स्तंभों के बीच समन्वय और संतुलन बहुत जरूरी है। दुर्भाग्यवश यह स्थिति हमेशा नहीं रहती। अलग-अलग वजहों से विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका आमने-सामने आ जाती हैं। कई बार अहं का टकराव इसकी बड़ी वजह होती है। चर्चा है कि झारखंड सरकार के एक महकमे में पिछले कुछ महीनों से ऐसी ही स्थिति बन गई थी। समस्या का निराकरण 'निवासन' के 'निर्वासन' से हुआ। आखिर क्या चल रहा है अंदरखाने, जानें द फोटोन न्यूज के एक्जीक्यूटिव एडिटर की कलम से।

by Dr. Brajesh Mishra
Jharkhand Bureaucracy
WhatsApp Group Join Now
Instagram Follow Now

Jharkhand Bureaucracy : गुरु स्नानघर से निकल रहे थे। ड्राइंगरूम में बैठा देखकर आश्चर्य में पड़ गए। पूछा- अरे ‘नारद मुनि’ आप कब पधारे? उत्तर दिया- बस गुरु अभी-अभी आकर बैठा हूं। गुरु बोले- चाय-पानी कीजिए, पूजा कर लौटता हूं, फिर बात होगी। गुरु के लौटने तक चाय-पानी गंभीर नाश्ते में तब्दील हो चुका था। गुरु में एक बड़ी खासियत है कि वह ‘अतिथि सत्कार’ में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। सामने की टेबल पर बैठते ही गुरु ने सेवादार को ताकीद की। दो मिनट में दो ब्लैक कॉफी रख दी गई। गुरु ने पहली चुस्की के साथ दूसरा सवाल दागा- और बताइए, क्या चल रहा है ‘मुहल्ले’ में? गुरु के प्रश्न का उत्तर थोड़ा घुमाकर दिया, ‘चल तो बहुत कुछ रहा है गुरु, समझ कुछ नहीं आ रहा’।

Read Also: Jharkhand Bureaucracy : नौकरशाही : ‘वो पीपल वाला पत्ता’…

गुरु हंसते हुए बोले- आखिर हम किस मर्ज की दवा हैं? आप बस कृत्य बताइए। कर्ता, कर्म और कारक हम समझा देंगे। गुरु के दावे आत्मविश्वास से भरे होते हैं। नौकरशाही वाले मुहल्ले में ऐसा कुछ नहीं था, जो उनकी नजर से ओझल रहे। यही वजह थी कि गुरु नौकरशाह कम, पत्रकार अधिक लगते थे। गुरु ने रास्ता साफ कर दिया था, सो पहला सवाल पूछा- हालिया बदलाव में ‘निवासन’ का निर्वासन क्यों हो गया? गुरु ने एक वाक्य में उत्तर दिया- ‘निवासन’ ‘श्रीहीन’ हो गए थे। गुरु की जवाबी गेंद सिर के ऊपर से निकल गई।

Read Also- Jharkhand Bureaucracy : नौकरशाही : ‘महोदय का ‘स्टेटस’…

बात समझने के लिए ‘साष्टांग दंडवत’ एकमात्र विकल्प था। सो साफ कहा- समझे नहीं! गुरु बोले- जिस ग्राम विकास की अवधारणा पर ‘माननीय’ चलना चाहती थीं, सुना है ‘निवासन’ से क्रियान्वयन में बाधा आ रही थी। परम पांडित्य के बावजूद ‘दीपिका’ रोशन नहीं हो पा रही थी। अंधकार घना हो रहा था। कहने वाले तो यहां तक बताते हैं कि सामान्य दिनचर्या तक कठिन हो गई थी। लिहाजा, ‘माननीय’ ने अंधकार दूर करने के लिए महाशक्ति का आह्वान किया। बताने वाले दावा करते हैं कि करुण पुकार दरबार में स्वीकर हो गई।

Read Also: Jharkhand Bureaucracy : नौकरशाही : आशियाने का ‘अनुराग’

गठबंधन में गांठ न पड़े, इस बात को ध्यान में रखा गया। विघ्न-बाधा दूर की गई। सब कुछ इस तरह कि सांप भी मर जाए और लाठी भी नहीं टूटे। गुरु ने पहला अध्याय पूरा किया। कहा, सुनो, बदलाव की कहानी के पंद्रह अध्याय और हैं। अगर समय और सब्र हो तो सब बता दूं। फिलहाल कहीं और निकलना है। सो, बाकी बात फिर कभी। अभी बस इतना समझ लो कि जरूरी नहीं कि एक तीर से एक ही शिकार हो। मौजूदा वक्त में ‘माननीय’ के मान और नौकरशाह के सम्मान दोनों की रक्षा हो गई है। गुरु तैयार होने दूसरे कक्ष में प्रवेश कर गए‌। यह निकलने का सही समय था। सो, घर के मंदिर में हाथ जोड़कर विदा लिया।

Read Also- Jharkhand Bureaucracy : नौकरशाही : प्रोटोकॉल वाले ‘साहेब’

Related Articles

Leave a Comment