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Jharkhand Bureaucracy : नौकरशाही : ‘महोदय का ‘स्टेटस’…

Jharkhand Bureaucracy : नौकरशाही वाले मोहल्ले में महत्वाकांक्षा सिर चढ़कर बोलती है। तलाश मौके की रहती है, जैसे ही मिले, लपक लो। ऐसी मान्यता भी है कि सत्ता के शीर्ष से जुड़ाव रखने पर ही आगे का मार्ग प्रशस्त होता है। फिर सोच चाहे अगली पंक्ति में शामिल होने की हो या फिर शासन व्यवस्था में पांव जमाने की। आखिर क्या चल रहा है अंदरखाने, जानें द फोटोन न्यूज के एक्जीक्यूटिव एडिटर की कलम से।

by Dr. Brajesh Mishra
Jharkhand Bureaucracy
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Jharkhand Bureaucracy : नौकरशाही वाले मोहल्ले में महत्वाकांक्षा सिर चढ़कर बोलती है। तलाश मौके की रहती है, जैसे ही मिले, लपक लो। ऐसी मान्यता भी है कि सत्ता के शीर्ष से जुड़ाव रखने पर ही आगे का मार्ग प्रशस्त होता है। फिर सोच चाहे अगली पंक्ति में शामिल होने की हो या फिर शासन व्यवस्था में पांव जमाने की। आखिर क्या चल रहा है अंदरखाने, जानें द फोटोन न्यूज के एक्जीक्यूटिव एडिटर की कलम से।

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मॉर्निंग वॉक पर निकला था। चक्कर पूरा कर गुरु के घर की राह पकड़ ली। दरवाजे पर सरकारी गाड़ी नजर आई। ड्राइवर सफाई में जुटा था। आमना-सामना हुआ, सो पूछ लिया- साहब, अभी निकले तो नहीं। ड्राइवर ने सिर हिला दिया।

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मन निश्चिंत हुआ कि गुरु फिर पकड़ में आ गए। अनुमान के अनुसार, गुरु अपने कमरे में नाश्ते की टेबल पर बैठे मिल गए। सामने पराठा, सब्जी और चाय रखी थी। गुरु इन व्यंजनों का आनंद ले रहे थे। आगंतुक को आते देख सीधे साथ बैठने का इशारा कर दिया। दो मिनट में घर के सेवादार ने आगे तिलकुट और पानी का गिलास रख दिया। गुरु बोले, मकर संक्रांति के दिन आए हो। शुरुआत तिलकुट से करो, फिर नाश्ता भी लग रहा है।

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गुरु का यही अपनापन बार-बार खींच लाता है। नाश्ते की टेबल पर सामान्य बातचीत शुरू हुई। धीरे-धीरे बातचीत गंभीर चर्चा में परिणत हो गई। गुरु बोले- गिरने की भी हद होती है। महोदय तो गिरावट की मिसाल बने जा रहे हैं।

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गुरु की व्यक्तिगत कुंठा जगजाहिर थी। बावजूद, वह जिस ओर इशारा कर रहे थे, उसे किसी लिहाज से दरकिनार नहीं किया जा सकता था। गुरु अगर शुरू हो जाएं तो फिर कहां रुकने वाले। बोले- इस एक आदमी ने नौकरशाही की नींव हिला रखी है।

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कहा- देश की संवैधानिक व्यवस्था के तीन अंग हैं- न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका। इन तीनों का आपसी समन्वय ही लोकतंत्र का आधार स्तंभ है। तीनों के बीच अगर जरूरत से ज्यादा नजदीकी बन जाए, तो संतुलन बिगड़ जाता है।

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वनांचल में मचे बवाल की असली वजह भी यही है। पहले भी कुछ लोग सत्ता के करीब होकर स्वयंभू होने का भ्रम पाल बैठे थे। आज उनकी कहानियों के चर्चे आम हैं। अखबारों के पन्ने गुलजार हैं। महोदय भी इसी राह पर हैं। सुना है, जयंती पर दिल खोलकर दादा को याद कर रहे थे। दिल यादों से इतना भर गया कि बात वाट्सएप के स्टेटस तक पहुंच गई। पुराने दिनों को याद कर गुलदस्ते के साथ वाली तस्वीर मोबाइल पर ‘टांग’ दी। यह कोई पहला वाकया नहीं है, जब मंजूषा से प्रेम का प्राकट्य हुआ हो। आखिर अपने लिए मौके की तलाश तो सभी को रहती है।

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महोदय सबसे चार कदम आगे हैं। महोदय की प्रतिभा किसी से छिपी नहीं है। पहले देश के ‘टॉप ब्रेन’ कही जानेवाली जमात में जगह बनाई। फिर देश की राजधानी से रेल पकड़कर वनांचल पहुंचे। बाबा की नगरी में माथा टेका। फिर बिना देर किए विपक्षी खेमे के धाकड़ सूरमा से भिड़ गए। फिलहाल वनांचल के केंद्र में रहकर मौके-बेमौके माहौल बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे। सत्ता को साधने में कई बार सेवादार तक बन गए, लेकिन मजाल है कि आंखों में कोई.. आई हो। अब तो लोग यहां तक कह रहे हैं कि महोदय, माननीय के हकदार हो गए हैं।

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गुरु ने नाश्ता खत्म कर लिया था। लिहाजा, दोनों ने बारी-बारी से हाथ धोए और फिर मिलने का वादा कर विदा हुए। बाहर एक ‘जंत्री’ भजन करता दिखा… रामचंद्र कांत का भजन करें…।

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