
रांची : झारखंड में सबसे ज्यादा कोल ब्लॉक होने के बाद भी राज्य का व्यावसायिक खनन में निराशाजनक प्रदर्शन है। यहां कुल 37 कमर्शियल कोल ब्लॉक मिले हैं, लेकिन उत्पादन में हिस्सेदारी महज 1.3 प्रतिशत है। इसके पीछे की हकीकत जानना जरूरी है।
देश में व्यावसायिक कोयला खनन (कमर्शियल कोल माइनिंग) की शुरुआत हुए छह साल बीत चुके हैं, लेकिन झारखंड इस दौड़ में काफी पीछे छूटता दिख रहा है। देश में सबसे ज्यादा कोयला खदानें (ब्लॉक) झारखंड के हिस्से में आईं, फिर भी उत्पादन के मामले में राज्य की भागीदारी न के बराबर बनी हुई है।
हाल ही में चतरा से सांसद कालीचरण सिंह द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में कोयला एवं खान राज्य मंत्री सतीश चंद्र दुबे ने संसद में यह आंकड़े साझा किए।
कागजों पर आगे, जमीन पर पीछे
देश भर में बांटे गए कुल 132 कमर्शियल कोल ब्लॉक में से अकेले झारखंड को 37 ब्लॉक हैं। इतनी ज्यादा खदानें मिलने के बावजूद, साल 2025-26 में राज्य से केवल 3.5 लाख टन अर्थात 0.35 मिलियन टन कोयले का ही खनन हो सका। यह देश के कुल कमर्शियल कोयला उत्पादन का महज 1.3 प्रतिशत ही है।
देश में रफ्तार, झारखंड में सुस्ती
एक तरफ जहां पूरे देश में कमर्शियल माइनिंग का दायरा तेजी से फैला है और उत्पादन 2021-22 के 1.15 मिलियन टन से उछलकर 2025-26 में 26.12 मिलियन टन तक पहुंच गया, वहीं झारखंड की रफ्तार सुस्त ही बनी रही।
कोयला मंत्रालय के मुताबिक कमर्शियल माइनिंग शुरू करने का मुख्य मकसद देश में कोयले की किल्लत दूर करना और बाहर से कोयला मंगाने की मजबूरी को खत्म करना था। मगर झारखंड में ज्यादातर परियोजनाएं शुरुआती अड़चनों से ही बाहर नहीं निकल पा रही हैं।
आखिर कहां फंसा है मामला
देश की 132 खदानों में से अब तक सिर्फ 23 को ही खनन शुरू करने की हरी झंडी मिली है और 15 में उत्पादन चालू हुआ है। बाकी 117 ब्लॉक अभी भी कई वजहों से अटके पड़े हैं। इनमें जमीन अधिग्रहण में देरी, पर्यावरण और सरकारी मंजूरियों की लंबी प्रक्रिया, बुनियादी सुविधाओं रास्ते, बिजली आदि का अभाव, चतरा और आसपास के इलाकों में सबसे ज्यादा मंदी आदि प्रमुख कारण हैं।
सबसे चिंताजनक स्थिति चतरा, हजारीबाग और लातेहार जिले की है। इस इलाके के 8 कमर्शियल कोल ब्लॉक जैसे चकला, ब्रिंदा, सरेगढ़ा, साई, नॉर्थ धाडू और चितरपुर में से एक भी ब्लॉक में अब तक काम शुरू नहीं हो पाया है। ये सभी खदानें कागजी फाइलों और मंजूरियों के इंतजार में अटकी हुई हैं।
जानकारों का कहना है कि झारखंड के पास कोयले का बड़ा आधार मौजूद है। अगर सरकारी मंजूरियों की प्रक्रिया में तेजी लाई जाए और खदानों तक पहुंच व बुनियादी ढांचे को वक्त पर मजबूत कर लिया जाए, तो झारखंड देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में सबसे आगे खड़ा हो सकता है।

