Dumka : दुमका का गांधी मैदान झामुमो के 47 वें झारखंड दिवस के लिए सज-धज कर पूरी तरह से तैयार है। सोमवार को ढोल-टमाक की आवाज भी गूंजेगी। एसपी कालेज परिसर से पारंपरिक तरीके से रैली भी निकलेगी। तीर-कमान व परंपरागत वेशभूषा में संताल परगना ही नहीं राज्य के कोने-कोने से झामुमो समर्थकों का जुटान भी होगा। परंपरा के मुताबिक देर रात तक जनसभा भी होगी। लेकिन इस बार गांधी मैदान के मंच पर 47 साल पूर्व झारखंड दिवस की बुनियाद रखने वाले झामुमो सुप्रीमो दिशोम गुरु स्व.शिबू सोरेन को हर एक निगाह तलाशती नजर आएगी। उनकी कमी सब महसूस करेंगे।
दरअसल चार अगस्त 2025 को शिबू सोरेन के निधन के बाद पहली बार दुमका के गांधी मैदान में दो फरवरी को झारखंड दिवस का आयोजन होगा।
गांधी मैदान से गूंजता था कैसे लेंगे झारखंड.., लड़ के लेंगे झारखंड…
झामुमो के पुराने नेता बताते हैं कि वर्ष 1970 से 1980 के बीच का समय स्व.शिबू सोरेन के जीवन का सबसे अहम व संघर्षमय काल था। कई उतार-चढ़ाव के बीच शिबू सोरेन अपने लक्ष्य की ओर मजबूती से बढ़ रहे थे। धान कटनी आंदोलन की बयार झारखंड के विभिन्न हिस्सों में पहुंच चुकी थी। संताल परगना का इलाका भी इसमें शामिल हो चुका था। शिबू सोरेन की पहचान हक व अधिकार के आंदोलन के साथ सामाजिक, आर्थिक व न्यायिक जननेता के तौर पर स्थापित हो चुका था और अब बारी थी राजनीति के गलियारे में इंट्री की।
शिबू सोरेन के जीवन में बड़ा बदलाव तब आया जब कामरेड एके राय और विनोद बिहारी महतो से उनकी मुलाकात हुई थी। इसी मुलाकात के बाद झारखंड अलग राज्य आंदोलन का भी बीजारोपण हो गया था। वर्ष 1969 में शिबू सोरेन संताल समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने और संतालों को उनका हक दिलाने के लिए संताल सोनोत समाज नामक संगठन चलाते थे। उधर कुड़मी समाज के उत्थान के लिए विनोद बिहारी महतो ने 1967 में शिवाजी समाज नामक संगठन बनाया था। इसी बैनर के तले कुड़मी समुदाय को एकजुट करते थे। यह वही समय था जब झारखंड में आदिवासी-मूलवासी के बीच मजबूत गठजोड़ की बुनियाद पड़ी थी।
शिबू सोरेन का आंदोलन बोकारो से आगे निकलता हुआ धनबाद की ओर पहुंच रहा था। उस दौर में विनोद बाबू प्रसिद्ध अधिवक्ता होने के साथ विस्थापितों की लड़ाई लड़ रहे थे। बोकारो के विस्थापितों में महतो और आदिवासी दोनों की संख्या सर्वाधिक थी। इन लोगों को उचित मुआवजा नहीं मिल रहा था। विस्थापितों के पास पैसा भी नहीं था कि वह अधिवक्ता की सहायता लेकर कानूनी लड़ाई लड़ें। विनोद बाबू बगैर एक पैसा लिए इनके हक की लड़ाई लड़ते थे और जब उन लोगों को मुआवजा मिल जाता था तो उसमें से कुछ तय राशि फीस के तौर पर रख लेते थे।

इस बात की जानकारी शिबू सोरेन को थी लेकिन उनसे मुलाकात नहीं हुई थी। एक दिन एक कोर्ट में विनोद बाबू ने देखा कि कैसे शिबू सोरेन एक अधिकारी को कड़ा जवाब दे रहे थे। उसी दिन विनोद बाबू को शिबू सोरेन की ताकत का अंदाजा लगा था। विनोद बाबू को चुनाव भी लड़ना था और उन्हें आदिवासियों का समर्थन भी चाहिए था। उन्हें पता था कि शिबू सोरेन की बात को संताल समुदाय के लोग मानते हैं। इसलिए विनोद बाबू जैना मोड़ गए और शिबू सोरेन से मुलाकात कर धनबाद आने का न्यौता दिया। शिबू सोरेन धनबाद में विनोद बाबू के घर गए थे और तब साथ काम करने पर सहमति बनी थी।
इसके बाद शिबू सोरेन का धनबाद में विनोद बाबू का घर ही ठिकाना बन गया था। वहीं से मोटरसाइकिल से निकलते और फिर टुंडी के आसपास के गांवों में संतालों को एकजुट करते थे। धीरे-धीरे शिबू सोरेन की तूती पूरे इलाके में बोलने लगी थी। 1972 में विनोद बिहारी महतो जब चुनाव लड़े तो उस समय शिबू सोरेन ने आदिवासियों का वोट दिलाने में विनोद बिहारी महतो की काफी मदद की थी। हालांकि विनोद बाबू चुनाव हार गए थे लेकिन जिस तरीके से शिबू सोरेन ने उनका साथ दिया था उससे दोनों के संबंध और मजबूत हो गए। इसके बाद धान कटनी आंदोलन और तेज होता चला गया। संताल परगना में भी इसकी डुगडुगी बज रही थी। इस दौरान महाजनों या उनके समर्थकों की हत्याएं भी हुई।
पुलिस शिबू सोरेन को पकड़ने के लिए जाल बिछा रही थी। इसी दौरान विनोद बाबू के साथ मिल कर अलग झारखंड राज्य आंदोलन को भी धार देने की सहमति बन गई। फिर एके राय भी इन लोगों के साथ जुड़ गए और तीनों ने मिल कर चार फरवरी वर्ष 1973 में झारखंड मुक्ति मोर्चा नामक राजनीतिक दल का गठन किया था। तब पार्टी के पहले अध्यक्ष विनोद बिहारी महतो को बनाया गया था। महासचिव शिबू सोरेन बने थे। उस समय पार्टी के प्रमुख नेताओं में कामरेड एके राय थे जो औद्योगिक और कोयला मजदूर समाज के सचिव हुआ करते थे। निर्मल महतो प्रमुख ट्रेड यूनियन आंदोलन के नेता थे। टेकलाल महतो भी पार्टी के अहम नेता थे।
झामुमो के गठन के बाद चार फरवरी को धनबाद में झामुमो स्थापना दिवस और दो फरवरी को दुमका के गांधी मैदान में झारखंड दिवस मनाने की परंपरा शुरु हुई जिसके माध्यम से शिबू सोरेन गांव के आदिवासी, मूलवासी व दबे-कुचलों से सीधा संवाद कर उनके हक व अधिकार की लड़ाई लड़ने व इनके समग्र विकास के लिए अबुआ झारखंड राज्य दिलाने के आंदोलन को हवा देने लगे। इसकी वजह से झामुमो की जमीनी ताकत बढ़ती चली गई। दुमका के गांधी मैदान से दो फरवरी को आयोजित होने वाला झारखंड दिवस पर कैसे लेंगे झारखंड.., लड़ के लेंगे झारखंड की गूंज दिल्ली सरकार तक पहुंचने लगी और अंत में वर्ष 15 नवंबर 2000 को अलग झारखंड राज्य का सपना पूरा हुआ।
झामुमो नेताओं का मानना है कि अब गुरुजी के पुत्र व पार्टी अध्यक्ष हेमंत सोरेन व युवा मोर्चा के केंद्रीय अध्यक्ष बसंत सोरेन उनकी नीतियों को आगे बढ़ाने व उनकी राह पर चलकर झामुमो की बुनियाद को पुख्ता करेंगे और उनके सपनों को साकार करेंगे।
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