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Jharkhand Politics: क्या है सरायकेला का सियासी समीकरण? चंपई और झामुमो के सामने गढ़ बचाने की चुनौती

सरायकेला : भाजपा के चंपई सोरेन और झामुमो के गणेश महली के बीच कड़ा मुकाबला, जहां बदलते गठजोड़ और आदिवासी वोटों की रणनीति तय करेगी जीत का फैसला।

by Shyam Kishor Choubey
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सरायकेला, नवंबर 22, 2024: झारखंड का सरायकेला विधानसभा क्षेत्र इस बार के चुनावों में खास चर्चा का विषय बना हुआ है। यहां के राजनीतिक समीकरणों में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। भाजपा के चंपई सोरेन और झामुमो के गणेश महली के बीच सीधा मुकाबला है। यह मुकाबला न सिर्फ दो उम्मीदवारों के बीच है, बल्कि दो पार्टियों की प्रतिष्ठा का सवाल भी बन चुका है।

चंपई बनाम गणेश: पुरानी प्रतिद्वंद्विता का नया अध्याय

सरायकेला में चंपई सोरेन और गणेश महली के बीच यह प्रतिद्वंद्विता कोई नई नहीं है। इससे पहले भी दोनों नेता दो बार चुनावी मैदान में आमने-सामने आ चुके हैं। दोनों ही बार चंपई सोरेन की जीत हुई थी, जबकि गणेश महली दूसरे स्थान पर रहे थे।

परिस्थितियों में बड़ा बदलाव

हालांकि, इस बार के चुनावों में परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं।

  • चंपई सोरेन, जिन्हें ‘कोल्हान टाइगर’ के नाम से जाना जाता है, जेएमएम छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए हैं।
  • दूसरी ओर, भाजपा की टिकट पर दो बार चुनाव लड़ चुके गणेश महली ने बगावत कर झामुमो का दामन थाम लिया है।

यह स्थिति सरायकेला की राजनीति में नया मोड़ लेकर आई है।

चंपई सोरेन: आदिवासी समाज में मजबूत पकड़

चंपई सोरेन कोल्हान क्षेत्र के प्रमुख आदिवासी नेताओं में से एक हैं।

  • वे सरायकेला से छह बार विधायक चुने जा चुके हैं।
  • आदिवासी समाज में उनकी गहरी पकड़ है और उनकी गिनती शिबू सोरेन के करीबी साथियों में होती है।

चंपई का भाजपा में शामिल होना, पार्टी के आदिवासी वोट बैंक को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

गणेश महली: हार को जीत में बदलने का मौका

गणेश महली का राजनीतिक सफर भी सरायकेला में लंबा रहा है।

  • 2014 में उन्होंने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन केवल 1,000 वोटों से हार गए।
  • 2019 में यह अंतर 16,000 तक बढ़ गया।

हालांकि, इस बार झामुमो के टिकट पर लड़ रहे गणेश महली के पास अपनी पिछली हार को जीत में बदलने का मौका है।

जातीय गणित और वोट बैंक का खेल

सरायकेला विधानसभा सीट अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित है।

  • यहां आदिवासी वोटरों की संख्या करीब 34% है।
  • ओबीसी वोटरों का भी बड़ा हिस्सा है, जो परंपरागत रूप से भाजपा का समर्थन करता है।

झामुमो की अब तक की सफलता आदिवासी वोटों पर निर्भर रही है, जबकि भाजपा को अपने ओबीसी और अन्य वोट बैंक पर भरोसा है।

लोकसभा चुनाव के आंकड़े: विधानसभा की दिशा तय करेंगे?

सरायकेला, सिंहभूम लोकसभा सीट का हिस्सा है।

  • 2024 के लोकसभा चुनाव में जेएमएम की जोबा मांझी 168402 मतों के अंतर से जीत दर्ज की थी।

हालांकि, लोकसभा और विधानसभा चुनावों के मुद्दे और समीकरण अलग होते हैं।

क्या बदलेगा जातीय समीकरण?

चंपई सोरेन के भाजपा में आने से पार्टी को उम्मीद है कि कुछ आदिवासी वोटर भी उनके साथ आएंगे।

  • भाजपा को अपने पारंपरिक वोट बैंक को एकजुट रखना होगा।
  • अगर ऐसा हुआ तो भाजपा लगभग 20 वर्षों के बाद सरायकेला में जीत दर्ज कर सकती है।

वहीं, झामुमो के सामने चुनौती है कि चंपई के जाने से उनके वोट बैंक में कमी न आए।

ईवीएम के फैसले का इंतजार

23 नवंबर को जब ईवीएम खुलेगी, तब तय होगा कि सरायकेला का राजनीतिक गढ़ किसके पास रहेगा।

  • क्या चंपई सोरेन भाजपा के लिए सफलता दिला पाएंगे?
  • या झामुमो का गढ़ बरकरार रहेगा?

सरायकेला के इस सियासी मुकाबले पर पूरे राज्य की नजरें टिकी हैं।

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