रांची : झारखंड राज्य आजीविका प्रोत्साहन सोसाइटी (जेएसएलपीएस) ने अपने पलाश ब्रांड उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग दिलाने की दिशा में कोशिश तेज कर दी है। इस संबंध में उद्योग विभाग, झारखंड सरकार द्वारा सूचीबद्ध संस्था नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिर्वसिटी बेंगलुरु के विशेषज्ञों से संपर्क स्थापित कर वित्तीय एवं तकनीकी प्रस्ताव प्राप्त किया गया है। संस्था द्वारा इस कार्य के लिए कुल 33.55 लाख रुपये का प्रस्ताव दिया गया है।

उक्त विश्वविद्यालय को भौगोलिक संकेतक पंजीकरण से जुड़े कार्यों का पर्याप्त अनुभव है। इससे पूर्व झारखंड की पारंपरिक सोहराय कला को भौगोलिक संकेतक दर्जा दिलाने के लिए आवश्यक शोध प्रक्रिया संपादित करने, विभागीय समन्वय स्थापित करने तथा देश-विदेश के अभिलेखागार से ऐतिहासिक प्रामाणिक साक्ष्य उपलब्ध कराने में इस संस्था की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
जेएसएलपीएस द्वारा विश्वविद्यालय के साथ विमर्श के उपरांत पपीता, लाह, चिरौंजी, जीरा फूल चावल, मड्डुचा आटा, तसर रेशम तथा डोकरा शिल्प का प्रारंभिक चयन किया गया है। संस्था के अनुसार किसी भी स्थानीय उत्पाद को भौगोलिक संकेतक दर्जा दिलाने के लिए यह अनिवार्य है कि उसके स्थानीय एवं पारंपरिक स्वरूप के संबंध में राष्ट्रीय अथवा अंतरराष्ट्रीय अभिलेखागार में गहन शोध कर ऐतिहासिक प्रामाणिक साक्ष्य एकत्र किए जाएं। इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर उत्पादों का अंतिम चयन किया जाना उपयुक्त होगा।
प्रस्तावित बजट तथा प्रक्रिया की जटिलता को ध्यान में रखते हुए जेएसएलपीएस ने बिहार राज्य की समकक्ष संस्था बिहार ग्रामीण आजीविका संवर्धन समिति (जीविका) से भी संपर्क किया। जीविका द्वारा स्थानीय उत्पाद मखाना के भौगोलिक संकेतक पंजीकरण की प्रक्रिया उद्योग विभाग, बिहार सरकार के माध्यम से पूर्ण कराए जाने की जानकारी साझा की गई।
बिहार के उद्योग विभाग के अधिकारियों के साथ होगी बैठक
इसी क्रम में जेएसएलपीएस ने उद्योग विभाग, बिहार सरकार के साथ समन्वय स्थापित कर उपयुक्त पलाश ब्रांड उत्पादों के भौगोलिक संकेतक पंजीकरण की औपचारिक प्रक्रिया प्रारंभ करने का निर्णय लिया है। इस संबंध में जेएसएलपीएस जल्द बिहार सरकार के उद्योग विभाग के अधिकारियों के साथ बैठक करेगा।
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