बेंगलुरु: कर्नाटक में मुस्लिम समुदाय को दिए गए 4% आरक्षण को लेकर एक नया मोड़ सामने आया है। राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने इस विवादित विधेयक को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के पास विचार के लिए भेज दिया है। यह कदम राज्य की राजनीति और आरक्षण नीति में अहम भूमिका निभा सकता है।
विधेयक पर राज्यपाल की पहल
राज्यपाल ने विधेयक की संवैधानिक वैधता और सामाजिक प्रभाव को ध्यान में रखते हुए इसे राष्ट्रपति के पास भेजने का फैसला किया। उन्होंने यह निर्णय संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 के तहत लिया, जो राज्यपाल को विधेयकों पर निर्णय लेने या उन्हें राष्ट्रपति के पास भेजने का अधिकार देता है।
4% आरक्षण की पृष्ठभूमि
कर्नाटक में मुस्लिम समुदाय को पहले OBC वर्ग के तहत 2बी श्रेणी में 4% आरक्षण प्राप्त था। यह आरक्षण सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर दिया गया था। पिछली सरकार ने इसे लागू किया था, लेकिन नई सरकार ने इसमें बदलाव की योजना बनाई।
नई सरकार की नीति में बदलाव
वर्तमान सत्तारूढ़ भाजपा सरकार ने मुस्लिम आरक्षण को समाप्त करते हुए लिंगायत और वोक्कालिगा समुदायों के लिए नए आरक्षण प्रावधान प्रस्तावित किए। इसके तहत लिंगायत समुदाय को 2सी और वोक्कालिगा समुदाय को 2डी श्रेणी में आरक्षण देने की घोषणा की गई थी।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप
इस मुद्दे पर विपक्ष ने सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि यह मुस्लिम समुदाय के अधिकारों का हनन है। वहीं, सरकार का कहना है कि उनका प्रयास सामाजिक न्याय को संतुलित और समावेशी बनाना है।
संवैधानिक प्रक्रिया और संभावित परिणाम
राष्ट्रपति द्वारा विधेयक की समीक्षा के बाद ही यह तय होगा कि मुस्लिम आरक्षण की वर्तमान स्थिति में कोई बदलाव होगा या नहीं। अगर राष्ट्रपति विधेयक को मंजूरी देते हैं, तो यह कानूनी रूप से लागू हो सकता है। वहीं, अगर विवाद गहराया, तो मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी जा सकता है।
आरक्षण का राष्ट्रीय प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि कर्नाटक में मुस्लिम आरक्षण से जुड़ा यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर आरक्षण नीति को प्रभावित कर सकता है। अन्य राज्यों में भी इसका सामाजिक और राजनीतिक असर देखने को मिल सकता है।

