पहाड़ों से मेरा रिश्ता हमेशा किसी अधूरे वाक्य जैसा रहा है। हर बार लगता है कि कुछ कहा गया, बहुत कुछ छूट गया। इसी अधूरेपन के साथ जब मैं अरावली की गोद में बसे कुंभलगढ़ की ओर निकला तो मन में सिर्फ़ एक ख्वाहिश थी, इतिहास और जंगल को एक ही साँस में महसूस करना। यह यात्रा किसी स्थान को देखने मात्र की नहीं, बल्कि उसमें ठहरने की थी। पत्थरों की स्मृति में, पेड़ों की छाया में और उन पगडंडियों पर, जहां इंसान आज भी प्रकृति का मेहमान है।
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मेरा पहला दिन किले की परछाईं में प्रवेश का दिन कहा जा सकता है। उदयपुर से निकलते ही सड़क धीरे-धीरे संकरी होने लगती है। शहर की चहल-पहल पीछे छूटती है और हवा में मिट्टी की सोंधी गंध घुलने लगती है। दूर से कुंभलगढ़ की दीवारें दिखाई देती हैं। मानो अरावली ने अपने सीने पर इतिहास की एक लंबी रेखा खींच दी हो। कहते हैं कि यह दीवार दुनिया की सबसे लंबी किलाबंद दीवारों में गिनी जाती है, पर दीवार की लंबाई से ज़्यादा प्रभाव उसकी चुप्पी का है।
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किले के प्रवेशद्वार तक पहुंचते-पहुंचते सूरज ढलने लगता है। पत्थरों पर पड़ती सुनहरी रोशनी हर शिला को अलग कहानी देती है। भीतर कदम रखते ही ऐसा लगता है, जैसे समय ने रफ्तार कम कर दी हो। मंदिरों की घंटियां, वीरान प्रांगण और पहरे पर खड़ी तोपें, सब कुछ एक-दूसरे से धीमी आवाज़ में बातें करती हैं। मैं देर तक बादल महल के पास बैठा रहा। नीचे फैली घाटियां धीरे-धीरे नीले से स्याह रंग में बदल रही थीं। इसी क्षण समझ आया कि यह किला सिर्फ़ युद्धों का साक्षी नहीं, बल्कि अनगिनत संध्याओं का भी साथी रहा है। रात किले से बाहर एक छोटे से जंगल-लॉज में बिताई, जहां खिड़की से झींगुरों की आवाज़ आती थी और अंधेरा किसी पुराने गीत की तरह चारों ओर फैलता था।
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रात को दूसरे दिन की कल्पना में जंगल के रास्ते और वाइल्डलाइफ ट्रेल्स थे। यही वजह थी कि सुबह बहुत जल्दी शुरू हुई। जीप में बैठते ही जंगल ने अपनी बाहें खोल दीं। कुंभलगढ़ वाइल्डलाइफ सैंक्चुरी का यह इलाक़ा अरावली की रीढ़ पर फैला है। कहीं घने सागौन के जंगल, कहीं खुले घास के मैदान और कहीं अचानक उभर आती पथरीली ढलानें।
जंगल का रास्ता कोई सड़क नहीं होता, वह एक सतत निर्णय होता है। कहां धीमे चलना है, कहां रुकना है और कहां सिर्फ़ सुनना है। हर मोड़ पर उम्मीद रहती है कि शायद आज बाघ दिख जाए। हालांकि टाइगर स्पॉटिंग यहां दुर्लभ मानी जाती है, पर उसकी अनुपस्थिति भी उसकी उपस्थिति जितनी ही प्रभावशाली है। कुछ लोग बताते हैं कि बाघ अक्सर रात में अपने निशान छोड़ जाते हैं। खुरों के निशान, खरोंचें और कभी-कभी शिकार की गंध।
हमने नीलगायों का झुंड देखा, दूर पहाड़ी पर खड़ा एक सांभर और पेड़ों पर उछलती लंगूरों की टोली। पक्षियों की आवाज़ें किसी अदृश्य संगीत की तरह थीं। एक जगह जीप रोक दी गई। सामने रेत पर ताज़े पंजों के निशान थे, बड़े, गोल और गहरे। गाइड की आवाज़ धीमी हो गई, जैसे जंगल की मर्यादा का ध्यान रख रहा हो। उस पल बाघ दिखा नहीं, पर उसकी संभावना ने पूरे दृश्य को जीवित कर दिया।
दोपहर तक जंगल की धूप तीखी हो गई। लौटते समय रास्ते में एक छोटी पहाड़ी से किले की दीवारें फिर दिखीं, जंगल और किले का यह दृश्य अद्भुत था, जैसे प्रकृति और इतिहास ने एक-दूसरे को थाम रखा हो।
मेरा तीसरा और आखिरी दिन किला देखने, पूर्व की स्मृतियों को सहेजने और विदाई का था। अंतिम दिन मैंने फिर किले की ओर रुख किया, इस बार बिना जल्दबाज़ी के। किले के भीतर फैले मंदिर- नीलकंठ महादेव, वेदी मंदिर- आस्था और स्थापत्य का सुंदर मेल हैं। यहां पत्थर भी प्रार्थना करते हुए प्रतीत होते हैं। मैं दीवार पर चलते हुए दूर तक फैली अरावली को देखता रहा। हवा तेज़ थी और नीचे जंगल हरा-भरा। यही वह क्षण था, जब समझ आया कि कुंभलगढ़ का सौंदर्य उसके किसी एक तत्व में नहीं, बल्कि उनके सह-अस्तित्व में है। किला जंगल के बिना अधूरा है और जंगल किले की परछाईं में और भी गहरा।
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वापसी से पहले एक आख़िरी बार मैंने घाटियों को देखा। मन में यह स्पष्ट था कि यह यात्रा सिर्फ़ तीन दिनों की नहीं रही। यह एक धीमा संवाद था पत्थरों से, पेड़ों से और उन अनदेखे जीवों से, जो रात में इन रास्तों पर चलते हैं।
यात्रा के बाद कुंभलगढ़ से लौटते समय मेरे भीतर कोई अधूरापन नहीं था। शायद इसलिए कि यहां इतिहास ने प्रकृति को दबाया नहीं और प्रकृति ने इतिहास को मिटाया नहीं। दोनों साथ-साथ चलते हैं। जैसे जंगल का रास्ता और किले की दीवार। अगर आप इस जगह आएं, तो जल्दी में न रहें। यहां देखने से ज़्यादा सुनने को मिलता है। बाघ दिखे या न दिखे, उसकी संभावना आपको विनम्र बना देती है। और यही कुंभलगढ़ की सबसे बड़ी सीख है कि इंसान, चाहे कितनी ऊंची दीवारें क्यों न बना ले, अंततः वह जंगल का ही एक यात्री है।
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