इस दुनिया में होते हुए भी हम घुमक्कड़ों की एक अलग दुनिया होती है। शायद, इसीलिए हम सब अपनी दुनिया या फिर अपनी जैसी किसी और की दुनिया में खोये रहते हैं। मुझे इस दुनिया को जानना, समझना और जीना अच्छा लगता है। शायद इसीलिए इस दुनिया में होकर भी अक्सर अन्यत्र कहीं खोया रहता हूं।
मेरी आगे की इस हिमालय यात्रा में सबसे पहले आने वाली जगह त्यूनी होगी जो कि हनोल से सोलह किमी की दूरी है, फिर मोरी जो त्यूनी से तीस किमी की दूरी पर है। एक मोटा-मोटा अनुमान लगाया कि अगले पड़ाव तक पहुंचने के लिए तकरीबन 46 किमी का सफर तय करना होगा।
त्यूनी होते हुए हजारों की संख्या में पर्यटक जौनसार-बावर के प्रसिद्ध ईस्ट देवता हनोल में स्थित महादेव दर्शन को जाते हैं। इस मंदिर का जिक्र मैंने पहले भी किया है। यह एक बहुत अच्छी जगह होने के बावजूद उतनी विकसित नहीं है जितनी होनी चाहिए। सरकार कई बार आधारभूत सुविधाएं तो उपलब्ध करा देती है लेकिन रख-रखाव का कोई ख़ास इंतजाम नहीं होने से सबकुछ बर्बाद हो जाता है,बिलकुल ऐसी ही स्थिति इस जगह की भी है।

मैंने सोचा है कि मोरी में दो दिन रुकने के बाद पुरोला निकल जाऊंगा। यह दोनों ही जगहें मेरी जिम्मेदारी की अहम हिस्सा हैं। मोरी में एक दोस्त से मिलना है, पुरोला पहुंचकर बच्चों की कविताएं इकट्ठा करनी है। इसके पश्चात जहां भी मन रम जाएगा अपना डेरा वहीं पर डाल दिया जाएगा। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि उत्तरकाशी जनपद भले ही शुरू हो चुका हो परन्तु उत्तरकाशी अभी भी काफी दूर है। इस लिहाज़ से धीरे-धीरे ही सही पर रास्तों पर चलते रहना जरूरी है।
मोरी एक छोटा सा हिल स्टेशन है लेकिन अपनी खूबसूरती के लिए विश्व विख्यात है। यह स्थान भी जौनसार बावर के ही क्षेत्र में आता है। टोंस नदी यहीं से होकर बहती है। इस नदी को कुछ लोग तमस नदी के नाम से भी जानते हैं। यहीं से टोंस घाटी शुरू हो जाती है, मोरी को लोग टोंस घाटी का प्रवेश द्वार भी कहते हैं। एक किंवदंती के अनुसार टोंस नदी, हिंदू महाकाव्य महाभारत के पौराणिक चरित्र, भुब्रुवाहन के आंसुओं से बनी है।
ग्रामीणों का मानना है कि उसके आंसू अभी भी नदी में बहते हैं, इसलिए वे इस नदी का पानी कभी नहीं पीते। हालांकि कुछ लोगों का यह भी मानना है कि यह नदी, महाकाव्य रामायण के एक पौराणिक पात्र शूर्पणखा के आंसुओं से बनी है। ऐसा मुझे कुछ चलते-फिरते लोगों ने बताया था।
जौनसार बावर का क्षेत्र होने के नाते इस क्षेत्र के निवासी भी कौरवों तथा पांडवों को अपना पूर्वज मानते हैं तथा हिंदू महाकाव्य के खलनायक कौरवों की पूजा करते है। यही नहीं जाखोल गांव में स्थित दुर्योधन का मंदिर यहां का सबसे प्रसिद्ध पुण्य स्थल है। यह मंदिर, कौरवों में ज्येष्ठ, दुर्योधन को समर्पित है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण सौर गांव के निवासियों ने करवाया था।

यह क्षेत्र हरे भरे देवदार के पेड़ों से घिरा हुआ है और शिविर के लिए एक आदर्श स्थान है। देश भर से लोग आकर इस जगह पर समय बिताना और कैम्पिंग करना पसंद करते हैं। एशिया के बेहतरीन पर्यटन स्थलों में शामिल इस जगह पर बड़ी संख्या में निजी रिसॉर्ट्स हैं जो आने वाले सैलानियों के लिए कैंपिंग, ट्रैकिंग, बॉनफायर और बारबेक्यू की सुविधा उपलब्ध कराते हैं।
यह हिल स्टेशन टोंस नदी में एंगलिंग, राफ्टिंग एवं कयाकिंग जैसे साहसिक पर्यटन के लिए जाना जाता है। इस जगह पर आकर ट्रेकिंग, नेचर वॉक, माउंट क्लाइम्बिंग और रेप्लिंग का आनंद भी उठाया जा सकता है। यह पर्यटन स्थल जीवन में उन्माद भर देता है और पर्यटकों को खुलकर जीने का एक बेहतरीन मौका देता है जिसकी वजह से लोग यहां खींचे चले आते हैं। यही कारण रहा कि मैं भी चला आया। हालांकि मेरा खिंचाव इन विविधतापूर्ण गतिविधियों से कम यहां रह रहे मेरे कुछ दोस्तों की वजह से ज्यादा था।
सोचा कि रास्ते पर ही हूं तो क्यों ना इस जगह की खूबसूरती को एक बार फिर से अपने दोस्तों के साथ जी लिया जाए। पूर्व की उन स्मृतियों को दोहरा लिया जाए जो कि वक़्त के साथ पुरानी पड़ती जा रही हैं। हनोल से त्यूनी पहुंचने में मुझे चार घंटे लग गए। त्यूनी से मोरी निकल तो गया था लेकिन यह सफर आसान नहीं था। जगह-जगह थकने, रुकने और सुस्ताने के क्रम में शाम ढल गई थी। अन्य जगहों की अपेक्षा यहां ठंड भी थोड़ी ज्यादा थी।
सोचा पहुंच ही गया हूं तो क्यों ना दोस्तों को भी इन्फॉर्म कर दूं लेकिन फोन का नेटवर्क कमजोर होने की वजह से बात नहीं हो पाई और जब पहुंचने के बाद फोन किया तो किसी का फोन नहीं उठा। अब करता भी तो क्या करता? स्थिति का पूरा-पूरा अंदाजा हो चूका था। एक बार फिर से ठहरने और खाने की वही जद्दोजहद जो कि पिछले बारह चौदह दिनों से चली आ रही है।
एक चाय की दुकान पर बैठ गया। दिमाग में आया कि क्यों ना सोशल मीडिया का सहारा लिया जाए। इतनी खूबसूरत जगह है कोई ना कोई ट्रेवलर तो यहां होगा ही होगा और एक ट्रैवल ग्रुप पर अपनी डिटेल्स डाल दिया। सचमुच, घूमने वाले बहुत से लोग इस जगह पर पहले से मौजूद थे लेकिन सभी का यही कहना था कि सुबह मिलते हैं। मेरे मन ने कहा कि सुबह तो मैं खुद अपना इंतजाम कर लूंगा अभी तो रात हो रही है।
मन में उधेड़बुन चल ही रही थी कि सामने एक ट्रैवलर दिखाई दिया। मन में ख्याल आया कि चलो मैं ही यहां अकेला नहीं हूं जिसे ठहरने के लिए किसी ठिकाने की तलाश हो। मैंने जल्दी-जल्दी अपनी चाय खत्म किया और उससे बात की तो पता चला की वह यूरोप से है। फिर क्या था हमने रात टोंस नदी के किनारे एक कैंप में बितायी और सुबह होते ही टोंस नदी और घाटी को एक्सप्लोर करने के लिए निकल गए। इस जगह पर हम लोग तीन दिन तक घूमें और कई जगहों को जानने समझने के बाद आगे उत्तरकाशी की तरफ बढ़ गए जोकि हमारी यात्रा का अगला पड़ाव था।
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