उत्तर प्रदेश सरकार और वक्फ बोर्ड के बीच संपत्तियों को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। सरकार ने लखनऊ के ऐतिहासिक छोटे और बड़े इमामबाड़े को वक्फ बोर्ड की बजाय सरकारी संपत्ति बताया है।
सरकार ने प्रदेशभर में वक्फ संपत्तियों की जांच के लिए सर्वे कराया, जिसमें दावा किया गया कि वक्फ बोर्ड द्वारा बताई गई 14,000 हेक्टेयर जमीन में से 11,700 हेक्टेयर जमीन सरकारी है।
इस दावे के बाद विवाद और बढ़ गया है। राज्य के मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने बयान दिया है कि जिन संपत्तियों का कोई ठोस सबूत नहीं होगा, वे सरकार की संपत्ति मानी जाएंगी। उन्होंने छोटा और बड़ा इमामबाड़ा भी इसी श्रेणी में आने का दावा किया।
सरकार के इस दावे को वक्फ बोर्ड और मुस्लिम संगठनों ने खारिज कर दिया है। दारुल उलूम के प्रवक्ता मौलाना सुफियान निजामी ने सरकार के दावे को आधारहीन बताया और कहा कि किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले निष्पक्ष चर्चा होनी चाहिए। वहीं, शिया वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष अली जैदी ने कहा कि बैठक में इस तरह की कोई चर्चा नहीं हुई है।
मौलाना साहब अब्बास ने सरकार पर वक्फ संपत्तियों को हड़पने का आरोप लगाया। उन्होंने 1857 के इतिहास का जिक्र करते हुए कहा कि जो लोग उस समय भारत के स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा थे, उनकी संपत्तियों को जबरन कब्जे में लिया गया। अब वक्फ संपत्तियों के साथ भी वही हो रहा है।
इस विवाद पर विपक्ष ने भी सरकार को घेरा है। समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता आजम खान ने इसे मुसलमानों को डराने की साजिश करार दिया। उन्होंने कहा कि इस तरह के बयान अल्पसंख्यकों की संपत्तियों पर कब्जा करने का प्रयास हैं।
यह मामला वक्फ संशोधन अधिनियम 2024 के परिप्रेक्ष्य में और अधिक गंभीर हो गया है। सभी पक्षों की नज़र अब इस बिल पर है, जिसके पास होने के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि संपत्तियों का मालिकाना हक किसके पास रहेगा।

