
फीचर डेस्क : नवरात्रि का पहला दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की आराधना को समर्पित होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां शैलपुत्री को पर्वतराज हिमालय की पुत्री माना जाता है। उनके नाम के पीछे माता सती के पूर्वजन्म और भगवान शिव से जुड़ी एक पौराणिक कथा प्रचलित है। मान्यता है कि माता ने पहले राजा दक्ष के घर सती के रूप में जन्म लिया था। भगवान शिव के अपमान से दुखी होकर उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। इसके बाद उन्होंने पर्वतराज हिमालय और माता मैना के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया। पर्वतराज की पुत्री होने के कारण उनका नाम शैलपुत्री पड़ा। नवरात्रि के पहले दिन भक्त सुख-शांति, साहस और जीवन में स्थिरता की कामना के साथ माता की पूजा करते हैं।
मां शैलपुत्री का नाम कैसे पड़ा? जानिए इसका अर्थ
मां शैलपुत्री के नाम का संबंध उनके जन्म और पारिवारिक पहचान से जुड़ा है। संस्कृत के दो शब्दों ‘शैल’ और ‘पुत्री’ से मिलकर शैलपुत्री शब्द बना है। शैल का अर्थ पर्वत और पुत्री का अर्थ बेटी होता है। इस प्रकार शैलपुत्री का शाब्दिक अर्थ पर्वत की पुत्री है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता ने अपने पूर्वजन्म में प्रजापति दक्ष की पुत्री सती के रूप में जन्म लिया था। भगवान शिव से विवाह के बाद एक प्रसंग में उन्होंने अपने शरीर का त्याग कर दिया। इसके बाद उन्होंने पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लिया। इस जन्म में उन्हें पार्वती के नाम से भी जाना गया। हिमालय की पुत्री होने के कारण उनका एक प्रमुख नाम शैलपुत्री पड़ा।
माता सती और भगवान शिव से जुड़ी पौराणिक कथा
धार्मिक कथाओं के अनुसार, प्रजापति दक्ष भगवान शिव को पसंद नहीं करते थे। एक बार उन्होंने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। इस आयोजन में अनेक देवी-देवताओं और गणमान्य लोगों को आमंत्रित किया गया, लेकिन भगवान शिव को निमंत्रण नहीं दिया गया। जब माता सती को अपने पिता के यहां आयोजित यज्ञ की जानकारी मिली, तो उन्होंने वहां जाने का निर्णय लिया। भगवान शिव ने उन्हें बिना निमंत्रण जाने को लेकर समझाया, लेकिन माता सती अपने पिता के घर पहुंच गईं। वहां प्रजापति दक्ष ने भगवान शिव के प्रति अपमानजनक व्यवहार किया। अपने पति का अपमान देखकर माता सती अत्यंत दुखी हुईं।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, इस अपमान से आहत होकर माता सती ने यज्ञ की अग्नि में अपने प्राण त्याग दिए। इस घटना से भगवान शिव अत्यंत दुखी और क्रोधित हुए। माता सती के देह त्याग के बाद धार्मिक कथाओं में उनके पुनर्जन्म का उल्लेख मिलता है।
पर्वतराज हिमालय के घर पार्वती के रूप में हुआ जन्म
माता सती ने अगले जन्म में पर्वतराज हिमालय और माता मैना के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस जन्म में उनका नाम पार्वती पड़ा। पर्वतराज की पुत्री होने के कारण उन्हें शैलपुत्री भी कहा गया। धार्मिक मान्यताओं में माता सती और माता पार्वती को देवी के अलग-अलग जन्मों के रूप में देखा जाता है।
कथाओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें स्वीकार किया और दोनों का पुनः विवाह हुआ। इस प्रकार मां शैलपुत्री की कथा का संबंध माता सती के पूर्वजन्म, भगवान शिव के प्रति उनकी निष्ठा और पार्वती के रूप में उनके पुनर्जन्म से जुड़ा है।
मां शैलपुत्री के स्वरूप का क्या है धार्मिक महत्व?
मां शैलपुत्री के स्वरूप में उन्हें बैल पर सवार दिखाया जाता है। उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल रहता है। उनके मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित होता है। धार्मिक परंपराओं में माता के प्रत्येक प्रतीक का विशेष महत्व माना गया है। बैल को धैर्य, स्थिरता और दृढ़ता का प्रतीक माना जाता है। त्रिशूल शक्ति और सामर्थ्य का संकेत देता है, जबकि कमल का फूल पवित्रता और आध्यात्मिक चेतना से जुड़ा है। माता के इस स्वरूप की पूजा करके भक्त साहस, धैर्य और कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति की कामना करते हैं।
मां शैलपुत्री को मां दुर्गा के नौ स्वरूपों में पहला स्थान प्राप्त है। इसलिए नवरात्रि की शुरुआत उनकी पूजा से होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उनकी आराधना भक्तों को जीवन में सकारात्मकता, मानसिक शांति और दृढ़ संकल्प बनाए रखने की प्रेरणा देती है।

