पलामू। झारखंड के पलामू, गढ़वा और लातेहार जिलों में एक बार फिर भाषा को लेकर विवाद गहरा गया है। झारखंड पात्रता परीक्षा (JETET) के लिए राज्य सरकार ने इन जिलों में स्थानीय भाषा के रूप में नागपुरी और कुडुख (उरांव) को शामिल किया है। इससे पहले वर्ष 2025 में भी यही भाषाएं चुनी गई थीं, जिसके बाद व्यापक स्तर पर विरोध प्रदर्शन हुआ था। उस समय स्थानीय लोगों ने भोजपुरी,मगही और हिंदी को शामिल करने की मांग उठाई थी।
भोजपुरी-मगही की अनदेखी का आरोप
नए नोटिफिकेशन के बाद एक बार फिर लोगों में नाराजगी देखी जा रही है। पलामू क्षेत्र में भोजपुरी और मगही सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाएं मानी जाती हैं। बावजूद इसके इन्हें सूची से बाहर रखा गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकार क्षेत्रीय वास्तविकता को नजरअंदाज कर रही है और इससे युवाओं के अवसर प्रभावित होंगे।
2011 की जनगणना के अनुसार पलामू जिले की आबादी करीब 19.36 लाख है, जिसमें केवल 9.34 प्रतिशत आदिवासी हैं। वहीं गढ़वा में आदिवासी आबादी लगभग 7 प्रतिशत है, जबकि लातेहार में यह करीब 45 प्रतिशत है। ऐसे में लोगों का तर्क है कि केवल आदिवासी भाषाओं को प्राथमिकता देना संतुलित निर्णय नहीं है। पलामू प्रमंडल की भौगोलिक स्थिति बिहार और उत्तर प्रदेश से सटी होने के कारण यहां भोजपुरी और मगही का प्रभाव अधिक है।
विधायक ने दी आंदोलन तेज करने की चेतावनी
डालटनगंज के विधायक आलोक चौरसिया ने राज्य सरकार पर पलामू क्षेत्र के साथ भेदभाव करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि सरकार को स्थानीय भाषाओं में भोजपुरी, मगही और अन्य प्रचलित भाषाओं को शामिल करना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने निर्णय में बदलाव नहीं किया तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा और यह सड़क से लेकर सदन तक पहुंचेगा।
छात्र संगठनों और भाजपा का प्रदर्शन
इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक दलों और छात्र संगठनों ने भी मोर्चा खोल दिया है। भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने पलामू समाहरणालय गेट पर अधिसूचना की प्रति जलाकर विरोध जताया। भाजपा जिला अध्यक्ष अमित तिवारी ने कहा कि यह केवल प्रतीकात्मक विरोध है और आगे बड़े स्तर पर आंदोलन किया जाएगा।
युवाओं और संगठनों की बढ़ती नाराजगी
छात्र संगठनों और युवाओं के बीच भी इस फैसले को लेकर असंतोष बढ़ता जा रहा है। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे राहुल दुबे ने कहा कि यह केवल भाषाओं का मुद्दा नहीं, बल्कि पलामू के लोगों के अधिकारों का सवाल है। उन्होंने बताया कि पिछली परीक्षा में भोजपुरी को शामिल किया गया था, लेकिन इस बार इसे बाहर कर दिया गया, जो समझ से परे है।
क्षेत्र में लगातार बैठकों और विरोध प्रदर्शनों का दौर जारी है। स्थानीय संगठनों ने संकेत दिए हैं कि यदि सरकार ने जल्द ही इस फैसले पर पुनर्विचार नहीं किया, तो आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है।
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