दिल्ली से निकलने के कुछ देर के बाद पहाड़ियों के बीच जब सड़क अचानक संकरी और शांत हो जाती है, तब समझ आता है कि आप किसी साधारण स्थान की ओर नहीं बल्कि समय और शांति के एक दुर्लभ संगम की ओर बढ़ रहे हैं। मेरी यह यात्रा वैसे तो रणकपुर जैन मंदिर की थी, लेकिन वहां पहुंचने से पहले ही मेरे भीतर उतरने लगी थी। ऊबड़-खाबड़ मोड़ों, साल और धोक के पेड़ों के बीच से गुजरती सड़क जैसे मुझे धीरे-धीरे बाहरी दुनिया से अलग कर रही थी।
इस मंदिर के बारे में पहले से काफी कुछ सुन रखा था, लेकिन अपनी नजर से देखने और इसकी दीवारों को अपने हाथों से छूने का रोमांच ही कुछ अलग था।
पहला दिन केवल पहुंचने और ठहरने का नहीं था, वह एक तरह का विसर्जन था। जैसे ही मंदिर परिसर की पहली झलक मिली, मन अपने आप शांत हो गया। संगमरमर की उजली देह, अरावली की हरी गोद में ऐसे स्थित थी, मानो किसी तपस्वी ने यहीं समाधि ले ली हो। पास के छोटे से गेस्टहाउस में सामान रखते समय खिड़की से दिखती पहाड़ियां मुझे लगातार अपनी ओर खींच रही थीं। कुछ देर बाद जब शाम ढलने लगी तो पहाड़ियों पर पड़ती सुनहरी रोशनी संगमरमर के मंदिर से टकराकर एक अलौकिक चमक पैदा करने लगी। ऐसा लग रहा था कि रणकपुर देखने नहीं, बल्कि अनुभव करने के लिए आया हूँ।
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दूसरे दिन की सुबह बहुत हल्की थी। हवा में ठंडक और पक्षियों की आवाज़। मंदिर में प्रवेश करते ही जूते उतारना केवल एक नियम नहीं लगा, बल्कि जैसे अपने भीतर के शोर को भी बाहर छोड़ देने की प्रक्रिया हो। भीतर कदम रखते ही 1444 स्तंभों का संसार खुल गया। हर स्तंभ अलग, हर आकृति विशिष्ट। कोई फूल बनकर खड़ा था, कोई ज्यामितीय गणना का परिणाम लग रहा था, तो कोई ऐसा प्रतीत हुआ मानो किसी ध्यानमग्न कलाकार ने पत्थर में सांसें भर दी हों। कहा जाता है कि कोई भी दो स्तंभ एक जैसे नहीं हैं; मैंने हर दिशा से इसे परखने की कोशिश की और हर बार यह कहा सच और गहरा होता गया।
मंदिर के भीतर समय का कोई पैमाना नहीं था। रोशनी छोटे-छोटे रोशनदानों से छनकर आती थी और संगमरमर पर ऐसे गिरती थी, जैसे किसी ने जान-बूझकर प्रकाश को संयम सिखाया हो। मैंने एक कोने में बैठकर काफी देर आंखें बंद रखीं। वहां कोई मंत्रोच्चार नहीं हो रहा था, फिर भी भीतर कुछ स्थिर हो गया। यह वह शांति थी जो उपदेश नहीं देती, बस उपस्थित रहती है। मंदिर की वास्तुकला केवल सौंदर्य नहीं, अनुशासन भी है। ऐसा लग रहा था कि यह मंदिर मन को अनुशासित करने वाली कोई जीवंत रचना है।
दोपहर बाद मैं मंदिर के चारों ओर फैली अरावली घाटी में टहलने निकल पड़ा। पतली पगडंडियां, सूखी पत्तियों की सरसराहट और दूर-दूर तक फैली हरियाली। यह सब रणकपुर के अनुभव का उतना ही अहम हिस्सा है जितना कि मंदिर। रास्ते में कुछ स्थानीय लोग मिले, जिनके लिए यह मंदिर केवल पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा है। उनकी बातचीत में गर्व नहीं, सहज अपनापन था। उन्होंने बताया कि यहां मौसम, जंगल और मंदिर तीनों का संतुलन बना रहना ज़रूरी है।
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तीसरे दिन मैंने जानबूझकर कोई तय योजना नहीं बनाई। सुबह फिर मंदिर पहुंचा, इस बार जल्दी। कम लोग थे और संगमरमर पर पड़ती सुबह की रोशनी और भी कोमल लग रही थी। मैंने धीरे-धीरे हर दिशा में घूमते हुए नक्काशियों को देखा। हाथियों की कतारें, देव आकृतियां, बेल-बूटे सब कुछ जैसे गति में स्थिर हो। यह वास्तुकला नहीं, एक दर्शन था, जिसमें अहिंसा, संयम और संतुलन पत्थर में ढल गए हों।
दोपहर के समय मैं पहाड़ियों की ओर निकल गया। वहां से मंदिर दूर दिखाई देता है। एक उजला बिंदु जो हरियाली के बीच चमकता है। उस दूरी से देखने पर समझ आया कि रणकपुर का प्रभाव उसके विस्तार में नही, बल्कि उसकी स्थिति में है। यह मंदिर ऊंचाई पर नहीं, बल्कि संतुलन में खड़ा है। न बहुत ऊपर, न बहुत अलग-थलग। शायद यही कारण है कि यहां आकर मन ज़मीन से जुड़ता है।
इतना कुछ देखने के बाद जब लौटने का समय आया, तो लगा जैसे कुछ छोड़ा नहीं बल्कि कुछ पाया है। रणकपुर ने मुझे यह नहीं बताया कि कैसे जीना चाहिए, उसने बस यह दिखाया कि शांति कैसे संभव है। यहां संगमरमर बोलता नहीं, पर बहुत कुछ कह देता है। अरावली की घाटियों में स्थित यह मंदिर मेरे लिए केवल एक आर्किटेक्चर चमत्कार नहीं रहा ; यह एक ठहराव बन गया ऐसा ठहराव, जो लौट आने के बाद भी भीतर बना रहता है।
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रणकपुर से विदा लेते समय मैंने आख़िरी बार मुड़कर देखा। मंदिर अब भी वहीं था। बिलकुल स्थिर और मौन, रोशनी से भरा हुआ। कुछ स्थान सिर्फ दर्शनीय स्थल नहीं होते, यह लाखों लोगों की आस्था और श्रद्धा के केंद्र होते हैं। यह देखने में तो अच्छे लगते ही हैं, धीरे-धीरे गुजरे दिनों की एक खूबसूरत स्मृति बनकर व्यक्ति के भीतर बस जाते हैं। रणकपुर में भले ही मैंने महज़ कुछ दिन बिताया, लेकिन यह अब भी मेरी स्मृतियों में दर्ज़ है।
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