Home » तेरे टूटने से मैं बिखरने लगती हूं

तेरे टूटने से मैं बिखरने लगती हूं

by The Photon News Desk
sahitya
WhatsApp Group Join Now
Instagram Follow Now

तेरे टूटने से मैं बिखरने लगती हूं
जैसे तेरे खुश होने से मैं संवरने लगती हूं

तेरे दूर होने से मैं मरुस्थल-ए-रेत होने लगती हूं
जैसे तेरे पास आने से मैं दरिया की आब होने लगती हूं

तेरे जाने से मैं कांच के सपनों सी बिखरने लगती हूं
जैसे तेरे आने से मैं ख्वाब से हकीकत होने लगती हूं

मैं टूट कर संगम की रेत सी बिखरी रहती हूं
जब तुम समेटते हो तो मैं इलाहाबाद सी होने लगती हूं

मैं सरयू की दरिया सी बहती रहती हूं
जब तुम देखते हो तो मैं कल कल नदियां सी खिलती रहती हूं

मैं संगम की धारा में बैठी रहती हूं
जब तुम आते हो संगम के हंसी तट पे तो मैं लहर बनके तेरे अधरों को छूती रहती हूं

मुझे छूते ही तुम सुबह -ऐ-बनारस होने लगते हो और मैं अवध-ऐ-शाम सी ढलने लगती हूं

मुझे पाकर तुम प्रयागराज होने लगते हो और मैं इलाहाबाद सी तुममें समाने लगती हूं

Shweta Singh Vishen

श्वेता सिंह विशेन,
देवरिया, उत्तर प्रदेश

READ ALSO :“जूता संहिता”(व्यंग्य)

Related Articles