गुरु, घर की छोटी सी लाइब्रेरी में कुर्सी पर आसन जमाए हुए थे। हाथ में एक किताब थी। चुपचाप नजदीक पहुंचा। देखा- गुरु, गोरख पांडेय की कविता गुनगुना रहे थे- ‘समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई, समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई। हाथी से आई, घोड़ा से आई। अंगरेजी बाजा बजाई, समाजवाद बबुआ, धीरे- धीरे आई।
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नोटवा से आई, वोटवा से आई, बिड़ला के घर में समाई, समाजवाद…’। मिजाज देखकर माजरा समझ में आ गया। गुरु वैचारिक धरातल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गए थे। लिहाजा कविता की पंक्तियों से व्यवस्था पर व्यंग्य का आनंद ले रहे थे। ध्यान में व्यवधान डालने का मन नहीं था, लेकिन जरूरत जो न कराए। धीरे से पैर छूकर बोला, ‘…और गुरु कहां कविता में खोए हैं?’ स्पर्श से गुरु चैतन्य हो गए। आंखों से सामने की कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। खुद खड़े होकर पुस्तक रैक में रखी और अपनी जगह बैठ गए।
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फिर बोले- यूं ही कुछ पढ़ने का मन हुआ तो कविता की किताब खोलकर बैठ गया। तुम बताओ, क्या चल रहा नौकरशाही वाले मुहल्ले में? क्या बताएं गुरु? कुछ दिनों से तफरीह हो नहीं पा रही। लिहाजा कोई खोज-खबर नहीं है। गुरु को शायद ऐसे उत्तर की उम्मीद नहीं थी। बोले- अरे इतना बड़ा-बड़ा कांड हो गया और तुम अनजान बने घूम रहे हो।
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गुरु की धाराप्रवाह अभिव्यक्ति को रोकना अहम सूचना से महरूम होने का संकट पैदा कर सकता था। लिहाजा, सभ्य श्रोता की तरह बस एक शब्द में पूछा- क्या? गुरु फिर शुरू हो गए, बताया कि प्रदेश की नौकरशाही के सिंहासन को इन दिनों सबसे बड़ी चुनौती श्री-श्री 2018 मनीषी जी महाराज से मिल रही है। मनीषी जी की साधना इतनी उच्च कोटि की है कि देवराज इंद्र का आसन डोल रहा है। यही कारण है कि तप से अभिभूत होकर इन्हें समय से पहले ही महामनीषी की उपाधि प्रदान कर दी गई।
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इस आपाधापी में पहले से तपस्या कर रहे कई साधकों की साधना बीच में ही टूट गई। समय पूर्व मनीषी को पहाड़ नगर की बागडोर सौंप दी गई। पत्थर की शिलाओं पर मनीषी ने घनघोर तप किया। मजेदार बात यह है कि अब एक नई खबर चर्चा में है। दावा यह है कि तप से अर्जित पुण्य लाभ का एक बड़ा हिस्सा चोरी हो गया है। कलयुग में इस पुण्य की कीमत करोड़ों में आंकी जा सकती है।
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मनीषी बड़े उदार प्रवृत्ति के हैं। सो, पुण्य, धन, लाभ जैसे सांसारिक अवयव के आने-जाने से बहुत विचलित नहीं होते। इसलिए बहुत शोर-शराबा नहीं हुआ। हालांकि पड़ताल अंदरखाने जारी है। गुरु की बातों में गहरा रहस्य था। इसे समझने के लिए गहन चिंतन-मनन की आवश्यकता थी। लिहाजा हाथ जोड़कर विदा लिया। मस्तिष्क में गुरु की बात घूम रही थी, समाजवाद, नोट, पुण्य, धन, लाभ। कुछ-कुछ समझ में आने लगा था…।
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