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Jharkhand Bureaucracy : नौकरशाही : ‘वो पीपल वाला पत्ता’…

Jharkhand Bureaucracy : नववर्ष शुरू होने के बाद अब तक शुभकामनाओं के आदान-प्रदान का दौर चल रहा है। मिलना-मिलाना जारी है। नौकरशाही वाले मुहल्ले के सुल्तानों को भी नए साल से नई उम्मीदें हैं। लिहाजा ‘ऊपरवाले’ को खुश रखने के सभी जोर-जतन किए जा रहे हैं। हालिया प्रकरण भी कुछ ऐसा ही है। आखिर क्या चल रहा है अंदरखाने, जानें द फोटोन न्यूज के एक्जीक्यूटिव एडिटर की कलम से।

by Dr. Brajesh Mishra
Jharkhand Bureaucracy
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Jharkhand Bureaucracy : कई दिन हो गए थे। सो, गुरुघर की राह पकड़ी। नीचे पहुंचने पर पता चला कि गुरु छत पर गुनगुनी धूप का आनंद उठा रहे हैं। सेवादार ने ऊपर का रास्ता दिखा दिया। सीढ़ियों से पहुंचा तो गुरु अपनी पारंपरिक वेशभूषा में कुर्सी लगाकर बैठे दिखे। मानो, इंतजार ही कर रहे थे। एक हाथ में चाय तो दूसरे में अखबार। कुछ दरबारी टाइप लोग उनके इर्द-गिर्द पहले से डेरा जमाए थे।

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नजर पड़ते ही गुरु ने दिल खोलकर स्वागत किया। कहा- आओ-आओ, बस तुम्हारी ही कमी थी। इस संबोधन का वास्तविक अभिप्राय नहीं समझ सका। उनकी अधिकांश बातें अभिधा, लक्षणा और व्यंजना में होती हैं। मुख से निकले शब्दों को समझने के लिए मस्तिष्क के तंतुओं को खोलकर रखना पड़ता है। अभिवादन कर सामने बैठा तो गुरु ने पहला सवाल पूछा- खाली हाथ चले आए? रास्ते में कोई पत्ता नहीं मिला?

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सकुचाते हुए पूछा- समझा नहीं गुरु। कुछ लाना था क्या? गुरु बोले- अरे भाई, कुछ तो सीखो नौकरशाही वाले सूरमाओं से। गुरु की गोल-गोल बातें अब भी पल्ले नहीं पड़ रही थीं। सो, फिर पूछा- कुछ नया घटित हो गया है क्या? गुरु बोले- अरे नहीं भाई। अखबार में काम करते हो। कुछ अगल-बगल की खोज-खबर रखा करो। कुछ देखा करो। देखकर सीखा करो। गुरु सारांश से विस्तार की ओर बढ़ चले थे।

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सप्रसंग व्याख्या शुरू की- सुनो! नए साल पर नौकरशाही की पूरी पलटन ‘साहेब’ के दरबार में सजदा करने पहुंची। सबके हाथ में कुछ न कुछ खास था। कोई पेंटिंग लेकर पहुंचा, कोई कार्ड्स। इनमें कुछ तो इतने व्यग्र दिखे कि पुरानी परंपरा भूल गए। सवालभरी निगाहें डालीं, पुरानी परंपरा? गुरु बोले-अरे हां भाई। ‘साहेब’ ने पिछले बरस फरमान सुनाया था। मिलने वाले बुके की जगह बुक लेकर आएं।

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नौकरशाह बेचारे, कहां याद रखने वाले? ‘साहेब’ तक पहुंचने की जल्दी में जहां, जो मिला, उसे लेकर चल दिए। सबसे दिलचस्प कारनामा तो ‘चूड़ियों वाले चतुर’ ने किया। खुद को दूसरों से दो कदम आगे रखने के लिए पीपल के पत्ते पर चित्रकारी पेश कर दी। पूछा- इसमें कुछ आपत्तिजनक तो नहीं लग रहा।

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गुरु के चेहरे पर हल्की मुस्कान तैर गई। बोले- बात आपत्ति या आपत्तिजनक होने की नहीं है। बात चपलताभरी चतुराई, मौकापरस्ती की है। दरअसल, बात यह है कि 12 नंबर गेट से मैदान में पहुंचे अधिकतर प्लेयर अलग-अलग वजहों से बाहर हैं। लिहाजा इस चतुरसुजान को ‘साहेब’ के सन्निकट पहुंच कर प्रेम रस ‘घोलने’ का अकेले मौका दिख गया। सो, इस खिलाड़ी ने बिना मौका गंवाए चौका लगा दिया। यूं तो ‘साहेब’ से मिलने वालों की लंबी कतार रही, लेकिन चतुर की बराबरी कोई नहीं कर सका।

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बताने वाले तो यहां तक बताते हैं कि चतुर अपने चाहने वालों को इस प्रकरण का किस्सा सुना रहे हैं। ‘साहेब ने जितनी मेरी पीठ थपथपाई, वैसी शाबाशी किसी और ने नहीं जुटाई’। अगर यह सच है तो सब पत्ते की कलाकारी है। धूप की गर्मी मंद पड़ रही थी। गुरु ने बात पूरी कर मौन साध लिया। लिहाजा विदाई वाली सलामी दी और अपने रास्ते निकल लिए। मन में बस एक ही सवाल था- आखिर चूड़ियों वाली कहानी अब कहां सुनाई देगी?

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