Makar Sankranti 2026 : फीचर डेस्क : हर साल जनवरी की ठिठुरती ठंड के बीच जब घर-घर दही-चूड़ा परोसा जाता है, तिलकुट की खुशबू हवा में घुल जाती है और “तिल-गुड़ खाओ, मीठा बोलो” की आवाजें सुनाई देती हैं, तब सवाल उठता है कि आखिर मकर संक्रांति पर यही परंपराएं क्यों निभाई जाती हैं? क्या यह सिर्फ खान-पान का उत्सव है या इसके पीछे कोई गहरा धार्मिक और वैज्ञानिक अर्थ छिपा है? दरअसल, मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सूर्य के उत्तरायण होने का संकेत है, जब सूर्य देव (ग्रह) दक्षिण से उत्तर की ओर अपनी यात्रा शुरू करते हैं।

इसी खगोलीय परिवर्तन के साथ प्रकृति, शरीर और समाज तीनों में नया संतुलन बनता है। सर्द मौसम में तिल शरीर को गर्मी देता है, दही-चूड़ा ऊर्जा और पाचन को मजबूत करता है, जबकि दान और स्नान जैसी परंपराएं आत्मिक शुद्धि का संदेश देती हैं। उत्तरायण को देवताओं का दिन माना गया है और इसे अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रतीक समझा जाता है।
Read Also- Jharkhand Bureaucracy : नौकरशाही : ‘वो पीपल वाला पत्ता’…
यही वजह है कि इस दिन का भोजन, परंपरा और आस्था तीनों खास हो जाते हैं। यह पर्व हर वर्ष 14 या 15 जनवरी को सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के साथ मनाया जाता है। यही कारण है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में यह त्योहार भिन्न-भिन्न नामों और रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है, लेकिन इसका मूल भाव सूर्य उपासना और फसल उत्सव ही रहता है।

भारत के उत्तर भारत में जहां इसे खिचड़ी पर्व कहा जाता है, वहीं गुजरात-राजस्थान में यह उत्तरायण, तमिलनाडु में पोंगल, महाराष्ट्र-तेलंगाना में मकर संक्रांति, असम में भोगाली बिहू और पंजाब में लोहड़ी के नाम से प्रसिद्ध है।
मकर संक्रांति क्यों मनाई जाती है?
मकर संक्रांति का धार्मिक और खगोलीय महत्व सूर्य के मकर राशि में प्रवेश से जुड़ा हुआ है। हिंदू पंचांग के अनुसार, यह पर्व चंद्र कैलेंडर पर नहीं बल्कि सौर कैलेंडर पर आधारित है, इसलिए इसकी तिथि लगभग हर वर्ष समान रहती है। इस दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, जिसे ऋतु परिवर्तन का संकेत माना जाता है। इसके साथ ही शीत ऋतु का प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगता है और कृषि कार्यों में तेजी आती है। यही वजह है कि मकर संक्रांति को किसानों का पर्व भी कहा जाता है और इसे नई फसल के स्वागत के रूप में मनाया जाता है।

उत्तरायण का खगोलीय और धार्मिक अर्थ
मकर संक्रांति को उत्तरायण पर्व इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस दिन से सूर्य अपनी उत्तर दिशा की यात्रा प्रारंभ करते हैं। खगोलीय रूप से सूर्य दक्षिणायन से निकलकर उत्तरायण में प्रवेश करता है। इस परिवर्तन के साथ दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं। भारतीय दर्शन में दिन को प्रकाश, ज्ञान और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना गया है, जबकि रात को अज्ञान और नकारात्मकता से जोड़ा जाता है। इसी कारण उत्तरायण काल को शुभ, पुण्यकारी और आध्यात्मिक दृष्टि से श्रेष्ठ माना गया है।
मकर संक्रांति पर दही-चूड़ा खाने का विशेष महत्व

बिहार और उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति पर दही-चूड़ा (दही और पोहा) खाने की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है। मान्यता है कि दही-चूड़ा सूर्य देव को प्रिय है और इसे भोग के रूप में अर्पित करने से सूर्य की कृपा प्राप्त होती है। धार्मिक विश्वास के अनुसार मकर संक्रांति के दिन दही-चूड़ा का सेवन करने से सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। यह व्यंजन सरल होने के साथ-साथ पोषण से भरपूर भी होता है।
तिल का महत्व: आयुर्वेद और धर्म दोनों में विशेष
मकर संक्रांति पर तिल से बने लड्डू, मिठाइयां और व्यंजन बनाना लगभग पूरे देश में प्रचलित है। आयुर्वेद के अनुसार, तिल शरीर को गर्मी प्रदान करता है, जिससे ठंड के मौसम में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। धार्मिक मान्यताओं में तिल को दान और पुण्य से जोड़ा गया है। कहा जाता है कि मकर संक्रांति पर तिल का दान करने से ग्रह दोष, विशेषकर शनि दोष, कम होता है और शुभ फल की प्राप्ति होती है।
फसल, सूर्य और आस्था का संगम

मकर संक्रांति पूरे भारत में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और नई शुरुआत का प्रतीक है। यह पर्व सूर्य उपासना, कृषि उत्सव और सामाजिक समरसता का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। नाम और परंपराएं भले अलग-अलग हों लेकिन मकर संक्रांति का संदेश एक ही है प्रकाश, सकारात्मकता और समृद्धि की ओर अग्रसर होना।
Read Also- Palamu Arrest News : झारखंड के पलामू में अपने गांव में छिपा था हार्डकोर नक्सली, पुलिस के हत्थे चढ़ा

