Home » Old Hindi Film Stories : रहस्य रोमांच वाला हिंदी सिनेमा : ना तुम हमें जानो

Old Hindi Film Stories : रहस्य रोमांच वाला हिंदी सिनेमा : ना तुम हमें जानो

दैनिक समाचार पत्र द फोटोन न्यूज के साहित्य पेज के लिए लिखे काॅलम : 'गुमनाम है कोई' से साभार

by Vaibhav Mani Tripathi
Old Hindi Film Stories
WhatsApp Group Join Now
Instagram Follow Now

Old Hindi Film Story : अपने अकेले जीवन के खालीपन को नाच-गा कर भरते वकील राजेश (देव आनंद) को एक रात एक लड़की दिखाई देती है जो पानी में कूद कर अपनी जान देने की कोशिश कर रही होती है । लड़की को डूबने से बचा कर जब राजेश बाहर ले आता है तो वहाँ पहुंचे दो पुलिस वाले उसे बताते हैं कि इस लड़की पर खून का इल्जाम है और ये पुलिस से बच कर भाग रही थी । लड़की को पुलिस के हवाले कर राजेश अगले दिन जब अपना बयान दर्ज करवाने पुलिस स्टेशन पहुंचता है तो उसे वहाँ एक बूढ़ी औरत मिलती है जो अपनी बेटी का नाम भी नहीं जानती पर उसके वहीं खून के इल्जाम में बन्द होने की जानकारी देती है ।

राजेश को पता चलता है कि जिस लड़की को उसने बचाया था ये बूढ़ी औरत उसी लड़की नीला (वहीदा रहमान) की माँ है । नीला का मामला राजेश एक वकील के तौर पर अपने हाथ में ले लेता है । कहानी आगे बढ़ने पर पता चलता है कि सड़कों पर अपनी माँ के साथ नाच-गा कर अपना जीवन बिताने वाली नीला को एक दिन बाबू बेनी प्रसाद मिलते हैं जो उसकी कला को पहचान कर उसे थिएटर की दुनिया में खींच लाते हैं जहां उसे बेहिसाब कामयाबी और खूब सारी दौलत मिलती है ।

Read Also- Hindi Poetry : हिंदी कविता : जब हम बूढ़े हो जाएँगे

थिएटर और कला की दुनिया में डूबी नीला से एक रोज उसकी माँ मिलने आती है पर मिल ना पाती है और नीला को लगता है कि उसे अपनी माँ से मिलना चाहिए और इसके लिए वो थिएटर की दुनिया छोड़ने को भी तैयार हो जाती है । इसी बीच नीला का साथी कलाकार रंजन उससे अपने प्रेम का इजहार करता है और उसे सब कुछ छोड़कर अपने साथ कहीं दूर चलने को कहता है । भोली-भाली नीला जब अपनी सारी संपत्ति रंजन के नाम करने को तैयार हो जाती है तो रंजन को अपराधबोध होने लगता है ।

रंजन उसे बताता है कि कोई दूसरा है जिसकी नजर नीला की संपत्ति पर है जिसके कहने पर उसने नीला से प्रेम का नाटक किया था, लेकिन नीला के सच्चे प्यार से उसका हृदय बदल गया है और उसे अब यह सब करते ठीक नहीं लग रहा है । नीला को यह सब सुन कर गुस्सा आ जाता है, दोनों में कुछ कहा-सुनी होती है और इस आपसी कहा-सुनी से पैदा हुए गुस्से के वशीभूत नीला से गोली चल जाती है और रंजन की मौत हो जाती है ।

Read Also: Hindi Poetry : हिंदी कविता : कविता ‘कैसे’

रंजन की मौत का खुद को जिम्मेदार मान कर नीला पुलिस के सामने अपना गुनाह स्वीकार कर चुकी है और गहरे अवसाद में है । जेल के डॉक्टर और पुलिस के अफसरों की सलाह पर नीला को राजेश अपने घर ले जाता है और उस रात की कहानी समझने का प्रयास करते हुए नीला को तमाम सारी उठापटक और जद्दोजहद के बाद निर्दोष साबित कर देता है और असली कातिल पकड़ा जाता है । कहने की जरूरत नहीं, इस बीच नीला और राजेश का आपस में प्रेम भी हो जाता है ।

Read Also yaatra vrtaant : यात्रा वृतांत : अरावली की छांव में बसा अलवर


फिल्म के क्रेडिट्स की बात करें तो निर्देशन शंकर मुखर्जी का है जिन्होंने देव आनंद के साथ महल जैसी शानदार फिल्म दर्शकों को दी । संगीत सचिन देव बर्मन का है और मजरूह सुल्तानपुरी के गीतों को मोहम्मद रफी, सुमन कल्याणपुर, लता मंगेशकर और आशा भोसले ने अपने स्वर दिये हैं । फिल्म की कहानी प्रणब रॉय की और पटकथा मधुसूदन कालेलकर की है ।


फिल्म के चाहने वाले कहते हैं कि फिल्म साल के अंत में दिसंबर में रिलीज हुई जब भारत-चीन युद्ध से देश उबरने की कोशिश कर रहा था, इसलिए फिल्म का प्रदर्शन बहुत औसत रहा था पर अगर सच कहा जाए तो फिल्म की कथा कहन में इतनी कमियाँ हैं कि लगता है जैसे फिल्म ने जो कमाई की वो सिर्फ इसलिए की क्योंकि लोग सिनेमा हाल में देव आनंद और वहीदा रहमान को देखने चले गए ।

Read Also- यात्रा वृतांत :  52 देवरी जैन मंदिर : पत्थरों में ठहरा हुआ मौन

बिखरे हुए कथानक वाली इस कमजोर फिल्म की एडिटिंग देख कर विश्वास नहीं होता कि इस फिल्म का सम्पादन करने वाले वही डी एन पई हैं जिन्होंने गुमनाम जैसी फिल्म की एडिटिंग की है । फिल्म के कई दृश्य इस प्रकार अचानक अवतरित हो जाते हैं कि दर्शक को अपने मन से कहानी के बीच के हिस्से भर लेने होते हैं ।

Read Also- Gorakhpur : भोजपुरी के सशक्त और सिद्ध कवि थे डॉ. रामानंद राय ‘गँवार’

फिल्म के दृश्यों की चर्चा की जाए तो इस बात को कुछ एक उदाहरण बेहतर ढंग से प्रस्तुत कर सकते हैं, जैसे फिल्म के पहले दृश्य में तूफ़ानी रात, गोली चलने की आवाज और ओवरकोट और फेल्ट हैट में लड़खड़ाता आदमी बता देता है कि वही कातिल है । पूरी फिल्म का अंत पहले दृश्य में दर्शक को स्पष्ट हो जाता है, अगले दृश्य में जब नायिका, नायक को दिखती है तो ये सूचना भी दर्शकों को मिलती है कि वो जेल से भागी थी – कैसे भागी और अगर भाग कर आत्म हत्या ही करनी थी तो भागी क्यों ? जैसे सवाल दर्शक के धैर्य की परीक्षा लेना शुरू कर देते हैं ।

रंजन की मृत्यु कैसे हुई जब यह बात नायक को पता चलती है तो उस दृश्य में पुलिस रिपोर्ट इतनी सतही है कि किसी वकील के लिए उस रिपोर्ट से अपने मुवक्किल का भला करना लगभग असंभव है । फिल्म में एक बड़ा हिस्सा कोर्ट रूम ड्रामा है । यहाँ भी पूछे जाने वाले सवाल,घटना क्रम काफी हद तक बचकाने हैं ।

मौका-ए-वारदात से पुलिस ने ना तो सबूत इकट्ठे किए हैं ना ही इकट्ठा किए सबूतों की सही तरह से जांच हुई दिखती है । एक वकील अपने साथी वकील पर चारित्रिक पतन के आरोप लगा रहा है और फिर मुकदमे की पैरवी करने वाला वकील गायब हो जा रहा है कानून का तंत्र न्याय को इतना व्याकुल है कि बिना बचाव पक्ष के वकील के उपस्थित हुए भी आरोपी को पहले मौत की सजा भी सुना दे रहा है और नए सबूतों की रोशनी में नए आरोपी को बिना मुकदमा चलाए सीधे मौत की सजा भी दे दे रहा है । और इस सब के बीच बहुत धैर्य के साथ वो वकील उसी कोर्ट में नकली दाढ़ी और बालों के साथ बैठा हुआ कोर्ट की कारवाई देख रहा है ।


फिल्म में एक शानदार कव्वाली ‘किसने चिलमन से मारा’ और दो-एक मधुर गीत ‘अकेला हूँ मैं’ और ‘ना तुम हमें जानो’ तथा वहीदा रहमान के भाव-प्रणव अभिनय के अतिरिक्त सिर्फ दो उल्लेखनीय चीजें हैं, पहला है क्लाइमैक्स में अंधे भिखारी की गवाही वाला ऐंगल और दूसरी असित सेन की भोजपुरी । गोरखपुर में जन्में और पले बढ़े असित सेन ने इस फिल्म में जिस तरह बंगाली लहजे के प्रभाव वाली भोजपुरी भाषा बोली है वो बहुत स्वाभाविक लगती है और उस समय की बंबई और आज की मुंबई में भोजपुरिया क्षेत्र के पलायन को रेखांकित करती है । फिल्म यूट्यूब सहित कई स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है, पर इसे सिर्फ कर्णप्रिय गानों और वहीदा रहमान के अभिनय के लिए ही देखा जा सकता है, रहस्य रोमांच वाली फिल्मों के शौकीन इस फिल्म से मेरी तरह ही निराश होंगे ।

Read Also- Old Hindi Film Stories : रहस्य रोमांच वाला हिंदी सिनेमा : मैं देखूं जिस ओर सखी री!

Related Articles

Leave a Comment