
गिरिडीह : विधायक और झारखंड के मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू अब हमारे बीच नहीं रहे। रविवार को उनके अचानक निधन से पूरा राज्य सदमे में है। लोग उनके मंत्री पद और राजनीतिक कद के बारे में जानते हैं। लेकिन उनके राजनीति में आने की कहानी बहुत अलग है। उन्होंने छह महीने पहले एक साक्षात्कार में अपनी यह अनकही बात बताई थी।
सुदिव्य सोनू का परिवार एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार था। उनकी कई पीढ़ियों से लोग सिर्फ सरकारी नौकरियों में थे। परिवार का राजनीति से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था। 80 और 90 के दशक में वे उत्तर बिहार में पढ़ाई कर रहे थे। उस समय झारखंड को अलग राज्य बनाने का आंदोलन चल रहा था।
उनके साथ पढ़ने वाले छात्र उन्हें ताना मारते थे। वे कहते थे कि क्या तुम लोग अलग राज्य बना लोगे। यह तंज उनके दिल में चुभ गया। उनके मन में अपनी माटी के लिए एक टीस पैदा हो गई।
गुरुजी ने उनके कंधे पर हाथ रखा और कहा…
साल 1989 में उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट आया। उनकी मुलाकात झामुमो के संस्थापक शिबू सोरेन से हुई। शिबू सोरेन को जब पता चला कि सुदिव्य पढ़े-लिखे हैं तो उन्होंने उनके कंधे पर हाथ रखा। उन्होंने कहा कि अगर पढ़े-लिखे लोग आंदोलन में नहीं आएंगे तो लड़ाई कैसे आगे बढ़ेगी।
गुरु जी के इन शब्दों ने युवा सुदिव्य का जीवन बदल दिया। वे अपने हक और माटी की लड़ाई के लिए राजनीति में कूद पड़े।मध्यमवर्गीय परिवार होने के कारण घर में उनका भारी विरोध हुआ। उनके पिता इस फैसले से बहुत नाराज थे। उन्हें लगता था कि बेटे ने अपना करियर बर्बाद कर लिया है। घर में लगातार तनाव बना रहता था।
साल 2004 या 2005 में एक अनोखी घटना घटी। शिबू सोरेन खुद सुदिव्य के गिरिडीह वाले घर चाय पीने पहुंचे। सुदिव्य के पिता बहुत गुस्से में थे और अनमने मन से बाहर निकले।
तभी दिशोम गुरु ने आगे बढ़कर उनके पिता के पैर छू लिए। उन्होंने हाथ पकड़कर कहा कि आपका बेटा मांग कर ले जा रहे हैं और इसे कुछ बनाकर देंगे। गुरु जी के इस स्नेह ने पिता का दिल पिघला दिया। उस दिन के बाद उनके पिता ने कभी उनके राजनीति में रहने पर सवाल नहीं उठाया।

