कान्स फिल्म फेस्टिवल — एक नाम जो कभी केवल सिनेमा की कलात्मकता, ग्लोबल कहानियों और सिनेमाई नवाचारों के लिए जाना जाता था। लेकिन अब एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है: क्या कान्स अब सिर्फ फिल्मों का नहीं, बल्कि फैशन और सोशल मीडिया शो बनकर रह गया है?
रेड कारपेट पर पोज़ करते इन्फ्लुएंसर्स, डिज़ाइनर गाउन में वीडियो शूट, और इंस्टाग्राम स्टोरीज़ में Cannes के नाम का धड़ल्ले से इस्तेमाल — क्या अब सिनेमा पीछे छूटता जा रहा है?
रेड कारपेट पर अब सिनेमा नहीं, स्टाइल चर्चा में है

हर साल कान्स में दुनियाभर की बेहतरीन फिल्में प्रीमियर होती हैं, लेकिन इस साल सुर्खियों में छाए रहे Nancy Tyagi के आउटफिट, कुशा कपिला की प्रतिक्रिया, और Parul Gulati के हेयर ब्रांड प्रमोशन।
जहाँ एक ओर पायल कपाड़िया जैसी फिल्म निर्माता मुख्य जूरी में शामिल होकर भारत का गौरव बढ़ा रही हैं, वहीं सोशल मीडिया पर चर्चा हो रही है — “नैंसी का गाउन असली था या कस्टम?”
क्या इस बदलाव से फेस्टिवल की आत्मा पर असर पड़ा है?
Cannes का Evolution
| साल | मुख्य आकर्षण |
|---|---|
| 1946 | पहला Cannes फिल्म फेस्टिवल: केवल सिनेमा और संस्कृति पर फोकस |
| 2010 | रेड कारपेट पर इंटरनेशनल ब्रांड्स की एंट्री बढ़ी |
| 2018 | Indian celebs जैसे दीपिका, ऐश्वर्या की ग्लैमरस एंट्री चर्चा में |
| 2022 | Influencers की धीरे-धीरे एंट्री, पहले छोटे प्रमोशन |
| 2024 | Nancy Tyagi, Raj Shamani, Kusha Kapila जैसे कंटेंट क्रिएटर्स वायरल |
| 2025 | चर्चा फिल्मों से ज़्यादा आउटफिट्स और ब्रांड्स पर |
Influencers Vs Filmmakers
| Influencers | Filmmakers | |
|---|---|---|
| मुख्य उद्देश्य | ब्रांड प्रमोशन, कंटेंट क्रिएशन | सिनेमा का प्रतिनिधित्व |
| लागत | ₹20–30 लाख (sponsored/invite-based) | न्यूनतम बजट / ऑफिशियल इनवाइट |
| पब्लिक ध्यान | हाई सोशल मीडिया एंगेजमेंट | सीमित लेकिन गहन सिनेमाई चर्चा |
| कवरेज | फैशन पोर्टल्स, इंस्टाग्राम रील्स | फिल्म रिव्यू, फिल्म वेबसाइट्स |
Cannes 2025 में भारत की भागीदारी
| Filmmakers (फिल्म निर्माता) | Influencers (इन्फ्लुएंसर्स) |
|---|---|
| पायल कपाड़िया: मुख्य जूरी सदस्य | Nancy Tyagi: DIY या ब्रांडेड गाउन पर बहस |
| नीरज घेवन की Homebound का प्रीमियर | Raj Shamani: ₹22 लाख खर्च की रिपोर्ट |
| भारतीय इंडी सिनेमा की मज़बूत उपस्थिति | Kusha Kapila: ब्रांड के लिए रेड कारपेट वॉक |
“Cannes आज क्या बन चुका है?”
| विकल्प | प्रतिशत (%) |
|---|---|
| सिर्फ सिनेमा का मंच | 15% |
| फैशन और ग्लैमर शो | 35% |
| दोनों का सांस्कृतिक संगम | 50% |
ब्रांड्स का खेल: फैशन के पीछे छुपी मार्केटिंग स्ट्रैटेजी
कान्स में रेड कारपेट पर चलना अब केवल कला का उत्सव नहीं रहा, ये PR और ब्रांड डील्स का भी हिस्सा बन चुका है।
- एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, एक रेड कारपेट वॉक का खर्च 20–30 लाख रुपये तक पहुंच सकता है।
- Brut जैसे मीडिया पार्टनर एजेंसियों को टिकट मुहैया कराते हैं, जो फिर अपने इन्फ्लुएंसर्स को भेजते हैं।
- ये इन्फ्लुएंसर्स ब्रांड के लिए फोटोज़, वीडियो, इंटरव्यू और प्रमोशन का कंटेंट तैयार करते हैं।
यानी फैशन अब कंटेंट है, और कंटेंट अब कमर्शियल है।
क्या सिनेमा हाशिए पर जा रहा है?
आज के दर्शकों को पूछिए, “Cannes में कौन सी फिल्म ने सबसे बड़ा अवॉर्ड जीता?” बहुतों को पता नहीं होगा। लेकिन “Nancy का आउटफिट किसने डिजाइन किया?” — यह सभी बता सकते हैं। जब ग्लैमर हेडलाइन बन जाए और फिल्में फुटनोट, तो सवाल उठना लाज़मी है:’क्या कान्स अब उस उद्देश्य से भटक गया है जिसके लिए उसकी शुरुआत हुई थी?’
दोनों की जगह है, लेकिन संतुलन ज़रूरी
इन्फ्लुएंसर्स का वहां होना पूरी तरह गलत नहीं है। वे डिजिटल मीडिया के ज़रिए नई ऑडियंस को जोड़ते हैं, खासकर युवा वर्ग को। लेकिन ज़रूरी है कि वे सिर्फ ‘लुक्स’ का हिस्सा न बनें, बल्कि फिल्म कल्चर को भी प्रमोट करें।
वहीं फेस्टिवल आयोजकों को चाहिए कि फिल्ममेकर्स, तकनीशियनों, लेखकों और इंडी क्रिएटर्स को भी वह मंच मिले जो ग्लैमर को मिल रहा है।
कान्स आज एक सांस्कृतिक संगम बन गया है — सिनेमा, फैशन, ब्रांड और डिजिटल दुनिया का।
यह सवाल नहीं है कि इन्फ्लुएंसर्स को जगह क्यों मिल रही है, सवाल यह है कि *क्या सिनेमा को वह ‘सेंटर स्टेज’ मिल रहा है, जिसके लिए यह फेस्टिवल कभी शुरू किया गया था?
Cannes का सच यही है — यह अब केवल एक Film Festival नहीं, बल्कि एक Fashion Fair भी है। फर्क बस इतना है कि किसे आप कितना महत्व देते हैं।

