Home » यात्रा वृतांत : दरमा घाटी की स्मरणीय यात्रा और उसकी स्मृतियां

यात्रा वृतांत : दरमा घाटी की स्मरणीय यात्रा और उसकी स्मृतियां

दैनिक समाचार पत्र द फोटोन न्यूज के साहित्य पेज के लिए लिखे गए कॉलम : घुमक्कड़ की पाती से साभार

by Sanjaya Shepherd
Pithoragarh tourism
WhatsApp Group Join Now
Instagram Follow Now

दिल्ली की भागती हुई सड़कों पर उस सुबह हल्की धुंध पसरी हुई थी। शहर अभी पूरी तरह जागा भी नहीं था, लेकिन मेरे भीतर एक अलग ही हलचल थी, जैसे कोई पुराना सपना आकार लेने जा रहा हो। यह यात्रा सिर्फ एक स्थान तक पहुंचने की नहीं थी, बल्कि अपने भीतर छिपे उस यात्री से मिलने की थी, जो हमेशा पहाड़ों की ओर खिंचता है। गंतव्य था- दारमा घाटी, हिमालय की गोद में बसी वह रहस्यमयी धरती, जहां प्रकृति अभी भी अपनी मूल लय में सांस लेती है।

Read Also- यात्रा वृतांत :  कुंभलगढ़ : देखने की नहीं, ठहरने वाली जगह

दिल्ली से चलकर सबसे पहले सड़क मुझे हलद्वानी और फिर पिथौरागढ़ की ओर ले गई। जैसे-जैसे मैदानी इलाक़े पीछे छूटते गए, वैसे-वैसे हवा में ठंडक और पहाड़ों की खुशबू घुलती गई। सड़कें अब घुमावदार हो गई थीं, और हर मोड़ पर एक नया दृश्य सामने आ जाता था, कहीं चीड़ के लंबे पेड़, कहीं दूर-दूर तक फैली हुई घाटियां और कहीं बादलों के टुकड़े, जो पहाड़ों से लिपटकर धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे।

पिथौरागढ़ पहुंचते-पहुंचते शाम ढलने लगी थी। छोटे-से शहर की रोशनियां पहाड़ों के अंधेरे में ऐसे चमक रही थीं, जैसे किसी ने सितारों को धरती पर उतार दिया हो। मुझे यह नगर बेहद पसंद है, इस जगह पर मैं कई बार आया हूं, रात को वहीं ठहराव हुआ। अगले दिन की यात्रा और भी रोमांचक होने वाली थी, क्योंकि अब रास्ता मुझे दारमा घाटी की ओर ले जाने वाला था, एक ऐसी जगह, जहां हर कदम पर प्रकृति का एक नया अध्याय खुलता है। इसे देखने और जानने की जिज्ञासा मेरे भीतर वर्षों से रही है।

Read Also- यात्रा वृतांत :  अरावली की छांव में बसा अलवर

अगली सुबह सूरज की पहली किरण के साथ मैं धारचूला की ओर निकल पड़ा। काली नदी के किनारे-किनारे चलती सड़क ने यात्रा को एक अलग ही आयाम दे दिया। नदी का तेज़ बहाव और उसके साथ चलती हुई सड़क, दोनों जैसे एक-दूसरे से होड़ लगा रहे थे। धारचूला पहुंचकर ऐसा लगा, जैसे भारत और नेपाल की सीमाएँ सिर्फ नक्शे पर ही अलग हैं, क्योंकि यहां लोगों की बोली, पहनावा और मुस्कान सब एक जैसे थे। मुझे यह समानता अच्छी लगी और अपने पड़ोसी मुल्क नेपाल के बारे में थोड़ी और गहराई से जान पाया।

धारचूला से दारमा घाटी की ओर जाने वाला रास्ता थोड़ा कठिन था, लेकिन उसी कठिनाई में यात्रा का असली सौंदर्य छिपा हुआ था। सड़क अब संकरी और ऊबड़-खाबड़ हो गई थी। कहीं-कहीं पर पहाड़ों से गिरते हुए छोटे-छोटे झरने रास्ते को भिगो देते थे, और वाहन को धीरे-धीरे आगे बढ़ना पड़ता था।

दारमा घाटी में प्रवेश करते ही सबसे पहले जो चीज़ मन को छू गई, वह थी- यहां की शांति। शहरों की भागदौड़ और शोर से दूर, यहां सिर्फ हवा की सरसराहट और नदी की कलकल सुनाई देती थी। सामने पंचाचूली पर्वत की हिमाच्छादित चोटियां सूरज की रोशनी में चमक रही थीं। उन चोटियों को देखते हुए ऐसा लगा, जैसे वे सदियों से इस घाटी की रक्षा कर रही हों।

Read also- यात्रा वृतांत : रणकपुर जैन मंदिर : अनुभव करने की जगह

पहले दिन का पड़ाव दांतू गांव में था। यह छोटा-सा गांव पत्थरों और लकड़ी से बने पारंपरिक घरों से सजा हुआ था। गांव के लोग सरल और आत्मीय थे। एक बुजुर्ग महिला ने मुस्कुराते हुए कहा- यहां आने वाले लोग जल्दी वापस नहीं जाना चाहते। उनकी बात सुनकर मैं भी मुस्कुरा दिया, क्योंकि सच में इस जगह में कुछ ऐसा था, जो मन को बांध लेता था।

Read Also- यात्रा वृतांत :  52 देवरी जैन मंदिर : पत्थरों में ठहरा हुआ मौन

शाम को गांव के पास बहती दारमा नदी के किनारे बैठकर मैंने सूर्यास्त का दृश्य देखा। पहाड़ों के पीछे डूबता हुआ सूरज आकाश को लाल और सुनहरे रंगों से भर रहा था। उस क्षण मुझे लगा, जैसे समय ठहर गया हो। शहरों में हम अक्सर समय के पीछे भागते हैं, लेकिन यहाँ समय हमारे साथ चलने लगता है।

दूसरे दिन की सुबह ठंडी और ताज़गी से भरी हुई थी। हल्की धूप और पहाड़ों की ठंडी हवा ने शरीर और मन दोनों को ऊर्जा से भर दिया। उस दिन मैंने दारमा घाटी के आसपास के क्षेत्रों में पैदल भ्रमण करने का निर्णय लिया। रास्ते में छोटे-छोटे खेत दिखाई दिए, जहां स्थानीय लोग आलू, जौ और राजमा की खेती करते हैं।

चलते-चलते मैं एक छोटे-से मंदिर तक पहुंचा, जो पहाड़ की ढलान पर स्थित था। मंदिर के आसपास घंटियों की मधुर ध्वनि गूंज रही थी। वहाँ बैठे एक साधु से बातचीत हुई। उन्होंने कहा- पहाड़ हमें धैर्य और संतुलन सिखाते हैं। यहां हर चीज़ धीरे-धीरे होती है, लेकिन स्थायी होती है। उनकी बात सुनकर मुझे लगा, जैसे यह यात्रा सिर्फ बाहरी दुनिया देखने की नहीं बल्कि अपने भीतर झांकने की भी है।

Read Also- Hindi Poetry : हिंदी कविता : जब हम बूढ़े हो जाएँगे

दोपहर के समय मैं पंचाचूली बेस कैंप की दिशा में थोड़ी दूर तक गया। रास्ता कठिन था, लेकिन हर कदम पर प्रकृति का सौंदर्य थकान को कम कर देता था। दूर-दूर तक फैले हुए हरे मैदान और उनके पीछे खड़ी बर्फ से ढकी चोटियाँ एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत कर रही थीं। वहां खड़े होकर मैंने गहरी सांस ली और महसूस किया कि पहाड़ों की हवा में एक अलग ही जीवन शक्ति होती है।

शाम को गांव लौटते समय आसमान में बादल घिरने लगे थे। हल्की बारिश शुरू हो गई। बारिश की बूंदें जब पहाड़ों और पेड़ों पर गिरती थीं, तो एक मधुर संगीत-सा सुनाई देता था। उस रात मैंने अपने कमरे की खिड़की से बाहर देखते हुए सोचा कि प्रकृति के बीच बिताए गए ये छोटे-छोटे पल ही जीवन की असली पूंजी हैं।

तीसरे दिन सुबह जब मैं वापस लौटने की तैयारी कर रहा था, तो मन में एक अजीब-सी उदासी थी। दारमा घाटी की शांत वादियाँ और यहां के लोगों की सादगी मेरे दिल में बस चुकी थी। वापसी का रास्ता वही था, लेकिन मन की स्थिति बदल चुकी थी।

Read Also- यात्रा वृतांत : हरसिल : यहां भगवान हो गए थे शिला

इस घाटी के गांवो और स्थानीय संस्कृति की मौलिकता ने मेरे मन को पूरी तरह से बांध दिया था। इन गांवो तक अभी भी विकास की आंधी नहीं पहुंची है, लेकिन हर गांव में बाहर से आए लोगों के ठहरने के लिए इंतजाम है, जहां आप बहुत ही आसानी से ठहर और यहां के स्थानीय भोजन का स्वाद ले सकते हैं। मैं भी गांव के ही एक होमस्टे में रुका हुआ था, जो बेजद ही खूबसूरत था। लेकिन, अब उसे अलविदा कहने का समय आ गया था।

धारचूला से पिथौरागढ़ और फिर दिल्ली की ओर लौटते हुए मैंने महसूस किया कि यह यात्रा सिर्फ तीन दिनों की नहीं थी, बल्कि एक अनुभव थी, जिसने मुझे जीवन को नए दृष्टिकोण से देखने की प्रेरणा दी। दारमा घाटी ने मुझे सिखाया कि सच्ची खुशी भौतिक चीज़ों में नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ बिताए गए उन सरल और शांत क्षणों में छिपी होती है।

दिल्ली की भीड़भाड़ में लौटकर भी मेरे भीतर दारमा घाटी की शांति गूंजती रही। पहाड़ों की वह ठंडी हवा, नदी की कलकल और लोगों की सादगी, सब कुछ मेरे मन में एक स्थायी स्मृति बन गया। दारमा घाटी की यह तीन दिन की यात्रा मेरे लिए सिर्फ एक यात्रा नहीं थी बल्कि एक आत्मिक अनुभव थी, एक ऐसा अनुभव, जो हर बार याद करने पर मन को फिर से पहाड़ों की ओर खींच लेता है।

Read Also- यात्रा वृतांत : देवप्रयाग : जहां सक्रिय हो जाती चेतना

Related Articles

Leave a Comment