- आठ हजार से अधिक नियुक्ति पत्र भी किए जाएंगे वितरित
- कुड़मी समुदाय को एसटी में शामिल करने और पेपर लीक जैसे मामले का सरकार की सेहत पर नहीं पड़ा असर
- नगर निकाय चुनावों का लंबित रहना और छात्रों को स्कॉलरशिप न मिलने का मुद्दा भी रहा चर्चित
- सरकार के खिलाफ विपक्ष के उठाए गए मुद्दों को सत्ता पक्ष ने कुशलता से संभाला
- घाटशिला विधानसभा उपचुनाव में झामुमो की बड़ी जीत ने सत्ताधारी गठबंधन को किया मजबूत
Hemant Soren Government : झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार का एक साल का कार्यकाल 28 नवंबर को पूरा हो रहा है। इस अवसर पर राज्य सरकार भव्य कार्यक्रम आयोजित करने जा रही है। आठ हजार से ज्यादा नियुक्ति पत्र भी वितरित किए जाएंगे। इस एक साल में कई ऐसे मुद्दे उभरे जो लगातार चर्चा में रहे। कुड़मी समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) में शामिल करने की मांग, नगर निकाय चुनावों का लंबित रहना, छात्रों को स्कॉलरशिप न मिलना और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) की सीजीएल परीक्षा में पेपर लीक जैसी घटनाएं प्रमुख रहीं। ये मुद्दे भले ही सुर्खियां बटोरते रहे, लेकिन इनका सरकार की सेहत पर कोई खास असर नहीं पड़ा।

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विपक्ष ने इन मुद्दों को भुनाने की कोशिश की, मगर सत्ता पक्ष ने इन्हें कुशलता से संभाल लिया। इसी दौरान घाटशिला विधानसभा उपचुनाव भी संपन्न हुआ, जिसमें झारखंड मुक्ति मोर्चा ने 38 हजार से अधिक वोटों के भारी अंतर से जीत हासिल की। इस विजय ने सत्ताधारी गठबंधन की स्थिति को मजबूत किया और बताया कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनकी सरकार की लोकप्रियता में इस एक साल में कोई कमी नहीं आई है।
हाल ही में संपन्न बिहार विधानसभा चुनावों में ‘इंडिया’ गठबंधन के भीतर सीटों के बंटवारे को लेकर झामुमो ने खुली नाराजगी जताई थी। मंत्री सुदीव्य कुमार सोनू और पार्टी महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने कहा था कि झारखंड में गठबंधन की समीक्षा की जाएगी। इससे ऐसा लग रहा था कि राजद कोटे से मंत्री संजय यादव की कुर्सी खतरे में पड़ सकती है। लेकिन, बिहार चुनाव के नतीजे आए हुए अब करीब एक पखवाड़ा बीतने को है और अब समीक्षा की कोई बात नहीं हो रही। सवाल है कि क्या संजय यादव को अभयदान मिल गया है। पूछा यह भी जा रहा है कि मंत्री सोनू द्वारा कही गई ‘अपमान और धूर्तता’ की बातें क्या सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी थीं। अगर जेएमएम इतनी आसानी से इन्हें भूल जाता है, तो यह हेमंत सोरेन की हिम्मती छवि पर सवाल खड़े करेगा।
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इस बीच, कुछ अफवाहें भी जोरों पर रहीं कि हेमंत सोरेन कांग्रेस और राजद से दूरी बनाकर भाजपा से हाथ मिला सकते हैं। इससे उन्हें कानूनी मामलों में राहत मिल सकती है और केंद्र सरकार के सहयोग से झारखंड का विकास तेज हो सकता है। लेकिन, फिलहाल इन अफवाहों में कोई सच्चाई नहीं नजर आती। न तो झामुमो और न ही भाजपा की ओर से इस तरह का कोई संकेत मिला है। वास्तव में, सोरेन के लिए ऐसा करना आसान नहीं होगा, क्योंकि इससे आदिवासी और मुस्लिम समुदाय के साथ गैर भाजपा वोटर वर्ग नाराज हो सकता है, जो झामुमो की राजनीतिक जमीन का आधार हैं। ऐसी स्थिति में उनकी साख को गहरा धक्का लग सकता है।
दो वरिष्ठ अधिकारियों के कारण सुर्खियों में रहा कार्यकाल
यह कार्यकाल दो वरिष्ठ अधिकारियों के कारण भी सुर्खियों में रहा, जो कभी सरकार के करीबी थे, लेकिन अब गंभीर विवादों में फंस चुके हैं। पहला नाम है आईएएस अधिकारी विनय चौबे का, जिनके इशारे पर एक समय राज्य में बड़े फैसले होते थे। आज वे शराब और जमीन घोटाला के चार मामलों में आरोपी हैं और जेल में बंद हैं।
दूसरे हैं पूर्व डीजीपी अनुराग गुप्ता, जिन्हें केंद्र सरकार के खिलाफ जाकर डीजीपी बनाया गया था। झारखंड सरकार ने उनके लिए केंद्र से टकराव मोल लिया, लेकिन महज छह-सात महीनों के बाद ही उनसे वीआरएस का आवेदन लिखवाकर विदा कर दिया गया। अब वह संगठित अपराधियों को संरक्षण देने और अवैध वसूली के आरोपों में घिरे हैं। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने उनके क्रियाकलापों की जांच एनआईए से कराने के लिए केंद्र को लिखा है। ये घटनाएं बताती हैं कि सत्ता के करीबियों पर नजर रखने की जरूरत है, वरना सरकार की साख भी सवालों के घेरे में आ जाती है।
रोजगार सृजन और विकास योजनाओं का विस्तार
कुल मिलाकर, हेमंत सोरेन सरकार इस एक साल में कई दावे कर सकती है, जैसे रोजगार सृजन और विकास योजनाओं का विस्तार। लेकिन, जमीनी हकीकत यही है कि सरकार काफी हद तक पुराने ढर्रे पर ही चल रही है। आम आदमी के जीवन में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। बेरोजगारी की समस्या जस की तस बनी हुई है, पलायन जारी है, शिक्षा व्यवस्था लड़खड़ा रही है और स्वास्थ्य प्रणाली वेंटीलेटर पर है। सरकार ‘आपके द्वार’ जैसे लोकप्रिय कार्यक्रम चला रही है, लेकिन सवाल यह है कि जब आम आदमी सरकारी दफ्तरों में महीनों जूते घिसकर भी एक काम नहीं करा पाता, तो सरकार उसके द्वार पर पहुंचकर कैसे न्याय दिलाएगी। आने वाले समय में सरकार को इन चुनौतियों से निपटना होगा, ताकि वादों और हकीकत के बीच का फासला कम हो सके।

