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International Womens Day Special : बाहरी स्वतंत्रता नहीं, आत्मतेज है नारी सशक्तीकरण की असली ताकत

by Birendra Ojha
International womens day special
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फीचर डेस्क : अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर महिला सशक्तीकरण को लेकर समाज में विभिन्न दृष्टिकोणों पर चर्चा होती है। वर्तमान समय में महिला सशक्तीकरण का विषय अक्सर आधुनिकता और पाश्चात्य विचारधाराओं के संदर्भ में प्रस्तुत किया जाता है। हालांकि भारतीय सांस्कृतिक दृष्टिकोण के अनुसार, महिलाओं की वास्तविक उन्नति केवल सामाजिक या बाहरी स्वतंत्रता से नहीं, बल्कि आंतरिक शक्ति, आत्मबल और आध्यात्मिक विकास से जुड़ी मानी जाती है। इस संदर्भ में यह विचार प्रमुखता से सामने रखा गया है कि साधना के माध्यम से आत्मतेज का जागरण ही वास्तविक सशक्तीकरण का आधार है।

भारतीय संस्कृति में महिलाओं के सम्मान और स्थान की परंपरा

सनातन संस्था की सदस्य प्राची जुवेकर ने बताया कि भारतीय परंपरा में महिलाओं के स्थान को लेकर कई प्रकार की चर्चाएं होती रही हैं। अक्सर यह धारणा प्रस्तुत की जाती है कि प्राचीन भारतीय समाज में महिलाओं को सीमित अधिकार प्राप्त थे, जबकि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अध्ययन इस दृष्टिकोण को पूरी तरह सही नहीं ठहराते। सनातन परंपरा में महिलाओं के सम्मान को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।

धार्मिक ग्रंथों में भी इस विचार को प्रमुखता दी गई है कि जहां महिलाओं का सम्मान होता है, वहां समृद्धि और सकारात्मकता का वास होता है। भारतीय समाज में स्त्री को शक्ति स्वरूप माना गया है और परिवार तथा सामाजिक संरचना में उसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। विवाह के बाद अधिकांश धार्मिक अनुष्ठानों में पत्नी की सहभागिता को आवश्यक माना जाता है। यही कारण है कि भारतीय परंपरा में देवी और देवता के नाम साथ-साथ लिए जाते हैं, जैसे लक्ष्मी-नारायण, सीता-राम, राधे-श्याम और गौरी-शंकर।

इतिहास और परंपरा में विदुषी तथा वीरांगना की भूमिका

भारतीय इतिहास और साहित्य में अनेक ऐसी महिलाओं का उल्लेख मिलता है जिन्होंने ज्ञान, नेतृत्व और पराक्रम के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वैदिक काल में गार्गी, मैत्रेयी और लोपामुद्रा जैसी विदुषियों ने वेद और शास्त्रों के अध्ययन में उल्लेखनीय स्थान प्राप्त किया। पौराणिक कथाओं और ऐतिहासिक प्रसंगों में भी महिलाओं की सक्रिय भूमिका का वर्णन मिलता है।

इतिहास में आगे चलकर भी अनेक महिलाओं ने समाज और राष्ट्र के लिए प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किए। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने स्वतंत्रता संग्राम में अद्वितीय साहस का परिचय दिया। राजमाता जिजाऊ ने प्रशासनिक दूरदर्शिता और नेतृत्व से समाज को दिशा दी। इसी प्रकार रानी ताराबाई और अहिल्याबाई होलकर जैसी शासक महिलाओं ने शासन, समाजसेवा और लोककल्याण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि भारतीय परंपरा में महिलाओं को कर्तृत्व और नेतृत्व के अवसर प्राप्त रहे हैं।

सामाजिक मूल्यों और परिवार व्यवस्था में महिलाओं की भूमिका

भारतीय समाज की पारिवारिक संरचना को लंबे समय से उसकी शक्ति के रूप में देखा जाता रहा है। इस व्यवस्था में महिलाओं की भूमिका केंद्रीय मानी जाती है। परिवार, संस्कार और सामाजिक मूल्यों के संरक्षण में महिलाओं का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। सामाजिक दृष्टि से यह भी माना जाता है कि परिवार व्यवस्था जितनी मजबूत होगी, समाज की संरचना उतनी ही स्थिर और संतुलित रहेगी।

सांस्कृतिक मूल्यों और सामाजिक मर्यादाओं के संरक्षण में महिलाओं की भूमिका ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रही है। वर्तमान समय में भी कई समाजशास्त्रीय अध्ययनों में परिवार आधारित सामाजिक संरचना को स्थिर समाज के लिए आवश्यक माना गया है।

महिलाओं की सुरक्षा और वर्तमान चुनौतियां

समकालीन समाज में महिलाओं की सुरक्षा एक गंभीर विषय बना हुआ है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, भारत में महिलाओं के विरुद्ध अपराध के मामलों में उल्लेखनीय संख्या दर्ज होती रही है। इनमें घरेलू हिंसा, उत्पीड़न और यौन अपराध जैसे मामले शामिल हैं। विभिन्न सामाजिक अध्ययनों में भी महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त की जाती रही है।

ऐतिहासिक संदर्भों में आदर्श शासन व्यवस्था में महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई थी। वर्तमान समय में भी महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कानूनी व्यवस्था, सामाजिक जागरूकता और नैतिक शिक्षा जैसे कई स्तरों पर प्रयासों की आवश्यकता बताई जाती है।

महिलाओं के समग्र सशक्तीकरण के लिए बहुस्तरीय दृष्टिकोण

महिलाओं के सशक्तीकरण को केवल सामाजिक या आर्थिक अधिकारों तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसके लिए शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक- तीनों स्तरों पर सुदृढ़ता आवश्यक है। शिक्षा, आत्मरक्षा प्रशिक्षण और आत्मविश्वास महिलाओं को शारीरिक तथा मानसिक रूप से मजबूत बनाते हैं, जबकि आध्यात्मिक साधना और नैतिक मूल्यों का पालन आत्मबल को विकसित करने में सहायक माना जाता है।

भारतीय संत परंपरा में भी भक्ति और साधना को आंतरिक शक्ति का स्रोत बताया गया है। इसी संदर्भ में यह विचार सामने आता है कि साधना के माध्यम से आत्मतेज का जागरण व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में भी स्थिर और मजबूत बनाए रखता है। भारतीय इतिहास और परंपरा की अनेक महान महिलाओं ने साहस, कर्तव्यनिष्ठा और आध्यात्मिक शक्ति के माध्यम से समाज के लिए प्रेरणादायक आदर्श स्थापित किए हैं।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर महिलाओं के सशक्तीकरण के इस व्यापक दृष्टिकोण पर विचार करते हुए यह रेखांकित किया जाता है कि आंतरिक शक्ति, नैतिक मूल्यों और आत्मबल के विकास के साथ ही महिलाओं की समग्र प्रगति संभव है।

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