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Jamshedpur News : भारतीय जन महासभा ने याद किया साधु-संतों का बलिदान

Jamshedpur News : जन महासभा के कार्यक्रम में साधु-संतों के योगदान और बलिदान को किया गया नमन, समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका पर हुई चर्चा।

by Birendra Ojha
**Image Alt Text (in English):** Saints and social workers paying tribute to the sacrifice of holy saints during the Jan Mahasabha event.
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जमशेदपुर : भारतीय जन महासभा ने शुक्रवार को गोवध निषेध के लिए बलिदान हुए साधु-संतों को याद किया। राष्ट्रीय अध्यक्ष धर्म चंद्र पोद्दार ने कहा कि 7 नवंबर 1966 को गोरक्षा आंदोलन में संसद भवन के पास हजारों साधु-संतों को गोली मार दी गई थी। कई की मौत पुलिस की लाठियों से हो गई थी।

प्रत्यक्षदर्शी पत्रकार मनमोहन शर्मा ने 2017 में नई दिल्ली के एक राष्ट्रीय चैनल पर दिए इंटरव्यू में बताया था कि इस आंदोलन में साधु संतों के साथ-साथ आरएसएस, जनसंघ एवं अन्य हिंदू संगठनों की भी सहभागिता रही थी। नरसंहार जैसी संपूर्ण घटना रायसीना हिल्स के चार स्थानों पर घटी थी। इसके पूर्व साधुओं का एक प्रतिनिधिमंडल तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिला था। आश्वासन दिया गया था कि गौ रक्षा के लिए आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। लेकिन मामले को लटका कर रखने के कारण गोरक्षा अभियान समिति बनी। जगह-जगह सत्याग्रह किए गए। एकजुट होकर संसद भवन के पास प्रदर्शन किया गया। शूट एट साइट ऑर्डर दिया गया था। इसे छिपाकर भी रखा गया।

घटनास्थल पर पत्रकार की भेंट तत्कालीन गृह मंत्री गुलजारी लाल नंदा से संसद भवन के पास हुई थी। नंदा जी ने कहा था कि गोली किसके आदेश के अनुसार चलवाई जा रही है, यह मुझे नहीं मालूम। इंदिरा सरकार का कोई कैबिनेट मंत्री किसी बात को छिपा जाए, तो इसका क्या अर्थ हो सकता है यह आप सभी समझ सकते हैं।

इंदिरा जी को दिल्ली पुलिस पर भी भरोसा नहीं था। इसीलिए उनके द्वारा आंदोलन की भयावहता के बहाने जम्मू एंड कश्मीर पुलिस को बुलाया गया था।
आंदोलन को कुचलने के लिए बड़े कदम उठाए गए थे। आंदोलनकारियों को बदनाम करने के लिए गुंडे भी बुलाये गए थे। अशांति फैलाना व दंगे करना यह सब उन गुंडों का कार्य था। हरियाणा के माफिया किंग को भी बुलाया गया था। बर्बरता पूर्ण कार्रवाई हुई। हजारों साधु संत मारे गए। ऐसा लगता था कि अंग्रेज पुलिस के द्वारा हिंदुस्तानियों का नरसंहार किया जा रहा है।

पार्लियामेंट के दरवाजे से लेकर पटेल चौक तक खून ही खून फैला हुआ था। पुलिस के द्वारा पत्रकारों को घटनास्थल पर जाने से रोक दिया गया था।
चूंकि, इन पत्रकार महोदय की पुलिस के बड़े पदाधिकारियों एवं सीआईडी के लोगों के साथ अच्छी पहचान थी, इसी से इनको जाने दिया गया। पत्रकार महोदय के जूते ऊपर तक खून से लथपथ हो गए थे। बाद में क्षेत्र को सेना के हवाले किया गया था। सेना ने जब इनको जाने से रोका तो पुलिस के बड़े पदाधिकारी ने झूठ कह दिया कि यह हमारे बड़े अफसर हैं। स्पेशल ब्रांच के हैं। तब इनको जाने दिया गया।

संसद भवन के गेट के पास, बिलिंगटन हॉस्पिटल व गोल पोस्ट ऑफिस के पास कुल चार स्थानों पर लाशें ही लाशें थी। विलिंगटन हॉस्पिटल में 372 से ऊपर डेड बॉडी थी। बच्चे और औरतें भी जिसमें शामिल थी। 40 डेड बॉडी तो बच्चों की थी।
लाठी चार्ज, आंसू गैस और बाद में गोलियां भी चली थी। हजारों साधु संत मारे गए थे।

बाद में गृहमंत्री गुलजारीलाल नंदा ने इस्तीफा दे दिया था। दो से ढाई हजार लोग मारे गए थे। 5 दिन तक सेना थी। फिर दिल्ली की सातों सीटें कांग्रेस हार गई। जनसंघ ने जीती। संसद में इस पर बहस तक नहीं हुई। यह भी कहा गया था कि संसद को आग लगाना चाहते थे।

सरकार द्वारा बताया गया कि 11 साधुओं के मारे जाने की खबर है। मिनिमम फोर्स का इस्तेमाल किया गया था। जबकि, सच्चाई यह है कि ढाई हजार से भी अधिक साधु संत मारे गए थे। लाशों को गायब किया गया। 5000 बसों से आंदोलनकारियों एवं लाशों को वहां से हटाकर दिल्ली से बाहर यत्र तत्र पहुंचा दिया गया। लाशों को फेंकवाया गया।

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