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Jamshedpur NIT News: ओलचिकी को डिजिटल पहचान देगा ‘तोरजोमा’, अब हिंदी-अंग्रेजी समेत जनजातीय भाषाओं में आसान अनुवाद

ओल चिकि लिपि के जनक पंडित रघुनाथ मुर्मू हैं, जिन्होंने वर्ष 1925 में इस लिपि का आविष्कार किया था। 30 अक्षरों वाली यह वर्णमाला बाएं से दाएं लिखी जाती है और संथाल समुदाय की सांस्कृतिक पहचान का मजबूत प्रतीक मानी जाती है।

by Mujtaba Haider Rizvi
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Jamshedpur : झारखंड की संताली भाषा और उसकी पारंपरिक लिपि ‘ओलचिकी’ अब डिजिटल प्लेटफॉर्म पर नई उड़ान भरने जा रही है। हिंदी, अंग्रेजी समेत कई भारतीय जनजातीय भाषाओं में अनुवाद करने वाला ‘तोरजोमा’ सॉफ्टवेयर तैयार किया जा रहा है, जो संताली भाषा को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी पहचान दिलाने में मदद करेगा। संताली में ‘तोरजोमा’ का अर्थ ही अनुवाद होता है।

ओलचिकी लिपि के जनक पंडित रघुनाथ मुर्मू हैं, जिन्होंने वर्ष 1925 में इस लिपि का आविष्कार किया था। 30 अक्षरों वाली यह वर्णमाला बाएं से दाएं लिखी जाती है और संथाल समुदाय की सांस्कृतिक पहचान का मजबूत प्रतीक मानी जाती है। इसे ओल चेमेट, ओल सिकी या संताली वर्णमाला के नाम से भी जाना जाता है।

अब तक डिजिटल माध्यमों पर इस लिपि का प्रभावी अनुवाद संभव नहीं हो पाने से संताली भाषा और उसकी समृद्ध परंपरा सीमित दायरे में ही सिमटी रही। लेकिन ‘तोरजोमा’ सॉफ्टवेयर के विकास से यह बाधा दूर होगी और लोग आसानी से संताली भाषा को पढ़-समझ सकेंगे।

इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एनआईटी), जमशेदपुर की टीम काम कर रही है। परियोजना का नेतृत्व कंप्यूटर साइंस एंड टेक्नोलॉजी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. कौशलेंद्र कुमार सिंह कर रहे हैं। उनके साथ पीएचडी स्कॉलर आनंद कुमार ओम, प्रोजेक्ट एसोसिएट दुर्गा सोरेन तथा इंटर्न हिमांशु कुमार पाठक और उन्नति चौरसिया जुड़े हैं।

डॉ. सिंह के अनुसार, फिलहाल सॉफ्टवेयर के जरिए ओलचिकी से अंग्रेजी में अनुवाद सफलतापूर्वक किया जा रहा है, जबकि हिंदी और अन्य जनजातीय भाषाओं के लिए काम तेजी से आगे बढ़ रहा है। उम्मीद है कि 2026 के अंत तक यह प्रोजेक्ट पूरी तरह तैयार हो जाएगा। इस परियोजना को झारखंड सरकार के विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार परिषद का सहयोग मिल रहा है।

इसके लिए ‘एसएएन-टीएमवीआई’ नाम से विशेष डेटाबेस भी विकसित किया गया है। चूंकि संताली और अन्य जनजातीय भाषाएं ‘लो-रिसोर्स लैंग्वेज’ की श्रेणी में आती हैं, इसलिए डिजिटल सामग्री सीमित है। प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद यह डेटाबेस सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाएगा, जिससे शोध, अध्ययन और भाषा संरक्षण को नई दिशा मिलेगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि ‘तोरजोमा’ सॉफ्टवेयर जनजातीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और प्रचार-प्रसार की दिशा में ऐतिहासिक पहल साबित होगा और झारखंड की भाषाई विरासत को तकनीक से जोड़कर भविष्य के लिए सुरक्षित करेगा।

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