इस मोहल्ले से लेकर उस मोहल्ले तक भजन की पंक्तियां फिजां में गूंज रही हैं- ‘भज गोविंदम, भज गोविंदम, भज गोविंदम मूढ़मते।’ चौंकिए नहीं, भजन में मूढ़ का अर्थ कुछ अलग है। बात शुरू करने के लिए कुछ बात तो चाहिए। इसलिए इस भजन का उल्लेख किया। कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य इस भजन को भजते थे। खैर, छोड़िए। अब इस प्रसंग को सियासत और नौकरशाही के गठजोड़ की ओर ले चलते हैं। ईश्वर का नाम भजना अभीष्ट की प्राप्ति का मार्ग बताया जाता है।
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यहां तो अभीष्ट का संदर्भ सूबेदार का सानिध्य प्राप्त करने तक सीमित है। सानिध्य मिल जाए, तो वेटिंग फॉर पोस्टिंग का संक्रमण काल खत्म हो। ‘मियां की दौड़ मस्जिद तक’ चल पड़ी है। पहले भी चलती रही है। इस बार भी कुछ लोगों को अभीष्ट प्राप्त हो ही जाएगा। कुछ को प्राप्त हो ही चुका है। क्या कुछ चल रहा है और क्या होने जा रहा है, इसी उधेड़बुन में गुरु की याद सताने लगी। देर करना उचित नहीं लगा। पहुंच गया उनके पास। पूछा, और गुरु, आप तो सब जान रहे हैं, देख रहे हैं। आखिर क्या हो रहा है। कुछ बताएं।
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गुरु मंद-मंद मुस्कराए। बोले, पहले इस गाने के बोल सुनो… कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता, कभी जमीं तो कभी आसमां नहीं मिलता…। उनकी गूढ़ बातें समझने की कोशिश कर रहा था। समझ नहीं पाया। पूछा, आप क्या कहना चाह रहे हैं, रहस्य की परतें तो खोलिए। गुरु बोले, इसमें रहस्य-वहस्य जैसी कोई बात नहीं है। यहां सारा आकाश उड़ने के लिए है। ठिकाना पाने के लिए उड़ान भरी जा रही है। विशाल सागर है। तैरकर पार करने की होड़ लगी है। कुछ सफल होते हैं, कुछ नहीं। यह तो बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि भजन किस तरीके से किया। अब गुरु कुछ ज्यादा ही आध्यात्मिक हो चले थे।
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अपना धैर्य भी जवाब देने लगा था। मनोभाव को गुरु समझ गए। कहा-सुनो, एक कथा सुनाता हूं- महादेव के धाम में एक सिपहसालार रहे थे। मूल रूप से दक्कन के। अपने तौर-तरीकों को लेकर सियासी हलके में भी दूर तक चर्चा में रहे। एक सियासतदान से टकराव ने तो पूरे देश में सुर्खियां बटोरीं। तौर-तरीके किसी को असहज करने वाले थे, तो कोई खुश भी था। खुशी वाले का पलड़ा भारी था, सो पुरस्कार मिला। आंखों का तारा बनाकर बिठा लिया अपने पास। जाहिर है, कुछ संगी-साथियों ने भी सोचा कि इसी तरह जंत्री लेकर भजन किया जाए। करने भी लगे।
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एक को कुछ सफलता भी मिली। उसी महादेव की नगरी में जंत्री-माला लेकर पहुंच गए। सोचा कि उन्हीं के रास्ते खासमखास बनकर लौटेंगे। अफसोस! ऐसा हो न सका। नाम सुनकर विशालता झलकती है, लेकिन इस विशाल व्यक्तित्व की खुशी ज्यादा दिन नहीं रह सकी। शायद कहीं कोई कमी रह गई। अब इस इंतजार में हैं कि फिर कोई नया पता-ठिकाना मिल जाए तो आवास व आवासीय कार्यालय के बाहर नेमप्लेट लग जाए। कथा का संदेश यही है कि यह जरूरी नहीं कि दूसरों को देख उसके तौर-तरीके अपनाने से अभीष्ट प्राप्त हो ही जाए। अब माजरा समझ में आने लगा थ। लिहाजा नए सवालों के जवाब खोजने निकल लिया।
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