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Jharkhand Bureaucracy : नौकरशाही : ‘ससुराल गेंदा फूल’…

Jharkhand Bureaucracy : नौकरशाही के मुहल्ले में खिलाड़ियों के बीच एक 'बड़ी कुर्सी' की रेस लगी थी। अचानक खेल में एक ऐसी खिलाड़ी ने मैदान मार लिया, जिसे अब तक प्रतियोगिता से बाहर माना जा रहा था। अब जीत-हार को लेकर अलग-अलग लोगों के अलग-अलग दावे हैं। हकीकत चाहे जो हो, लेकिन बताने वाले इसके पीछे रोचक कथा बता रहे हैं। आखिर क्या चल रहा है अंदरखाने, जानें द फोटोन न्यूज के एक्जीक्यूटिव एडिटर की कलम से।

by Dr. Brajesh Mishra
Jharkhand Bureaucracy
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Jharkhand Bureaucracy : गुरु कुछ गुनगुना रहे थे। नजदीक पहुंचा तो पता चला एआर रहमान का संगीत दोहरा रहे हैं। ‘ससुराल गेंदा फूल’…। करीबी दावा कर रहे हैं कि गुरु को दिल्ली की हवा लग गई है। जब से राजधानी से लौटे हैं, हर बात में आबोहवा का जिक्र कर रहे हैं। मूड-माहौल देखकर इतना तो आभास हो ही गया कि गुरु के पिटारे में कुछ नया है।

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बस निकालने के लिए सही समय और उचित तरीके की दरकार है। गुरु का हर्षित मिजाज देखकर पूछा- क्या गुरु? लगता है काफी दिनों बाद ‘ससुराल सुख’ की प्राप्ति हुई है। यह गाना गुनगुनाना…। सब कुछ नया-नया सा लग रहा है। गुरु पहले मंद-मंद मुस्कराए। फिर बोले, अरे नहीं! कोई ससुराल-वसुराल नहीं गया था। बस दिल्ली को ‘दिल’ दे आया। ट्रैक पर लाने के लिए सवालिया निगाहों से देखा। गुरु समझ गए। बोले- तुम खबरनवीस लोगों को कोई खोज-खबर भी है? ससुराल नहीं गया था तो क्या, मेरी नजर में ससुराल की अहमियत थोड़ी और बढ़ गई है। ससुराल के प्रताप से लोग लंबी छलांग लगा रहे हैं।

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सोचने लगा कि आखिर गुरु का इशारा किस ओर है? किसने लंबी छलांग लगाई? गुरु असली मुद्दे पर आ रहे थे, बोले – क्या तुम्हें नहीं पता, शिखर का रास्ता ससुराल से जाता है। खुद को दौड़ से बाहर मान चुकीं एक मोहतरमा मार्ग में मिलीं। देखते ही देखते पदार्थ से ‘तदर्थ’ हुईं और फिर माथे का चंदन बन गईं। पहले महकमे में सबसे ऊंची कुर्सी हाथ लगी, फिर अंतिम समय में अंतिम मुहर लग गई।

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वह भी तब, जब तीन-तीन बड़े खिलाड़ी दौड़ में लगे थे। माना जा रहा था कि अनुभव की कसौटी पर सबको कसा जाएगा, लेकिन… ऐन वक्त पर सब बदल गया। 90 नंबर वाले खिलाड़ी ‘पलटा’ दिए गए, 92 नंबर वाले ‘शांत’ कर दिए गए। 93 वाले दरकिनार कर दिए गए। कतार में तीन पायदान पीछे खड़ी खिलाड़ी ने मैदान मार लिया। जानने वाले बताते हैं कि खिलाड़ी की चाहत बस ‘डीजे’ सेट तक पहुंचने की थी। आगे की कुर्सी तक पहुंच बन जाए, यह तो प्रभु जगन्नाथ की साक्षात् कृपा है।

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गुरु की व्याख्या ने और उलझा दिया। सोचने लगा कि इसमें ससुराल की क्या भूमिका। गुरु समझ गए। बोले- यह जरूरी नहीं कि अपनी ही काम आए। मालिक-मुख्तार की ससुराल का लिंक मिल जाए तो भी काम बन सकता है। यकीन न हो तो खोजी खबर के लिए कलिंग की ओर निकल जाओ। पता चल जाएगा कि मेरी बात कपोल ‘कल्पना’ नहीं, हकीकत है। अब बात समझ में आ गई। पिटारा खुल चुका था।

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पहले मुस्कान का आदान-प्रदान हुआ। फिर अभिवादन करते हुए बाहर निकले। गुरु ने गूढ़ कथा का एक सिरा खोल दिया था। अब बात इससे आगे की थी। और इसके लिए धैर्य धारण की आवश्यकता थी। गुरु के पड़ोस में शायद कोई महाभारत सीरियल देखने जा रहा था। सीरियल का शीर्षक गीत बज रहा था, ‘यदा यदा हि… आभास कुछ और हो रहा था तदा, तदा हि…।’

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