Jharkhand Bureaucracy : गुरु कुछ गुनगुना रहे थे। नजदीक पहुंचा तो पता चला एआर रहमान का संगीत दोहरा रहे हैं। ‘ससुराल गेंदा फूल’…। करीबी दावा कर रहे हैं कि गुरु को दिल्ली की हवा लग गई है। जब से राजधानी से लौटे हैं, हर बात में आबोहवा का जिक्र कर रहे हैं। मूड-माहौल देखकर इतना तो आभास हो ही गया कि गुरु के पिटारे में कुछ नया है।
Read Also- Jharkhand Bureaucracy : नौकरशाही : महिमा की ‘महिमा’
बस निकालने के लिए सही समय और उचित तरीके की दरकार है। गुरु का हर्षित मिजाज देखकर पूछा- क्या गुरु? लगता है काफी दिनों बाद ‘ससुराल सुख’ की प्राप्ति हुई है। यह गाना गुनगुनाना…। सब कुछ नया-नया सा लग रहा है। गुरु पहले मंद-मंद मुस्कराए। फिर बोले, अरे नहीं! कोई ससुराल-वसुराल नहीं गया था। बस दिल्ली को ‘दिल’ दे आया। ट्रैक पर लाने के लिए सवालिया निगाहों से देखा। गुरु समझ गए। बोले- तुम खबरनवीस लोगों को कोई खोज-खबर भी है? ससुराल नहीं गया था तो क्या, मेरी नजर में ससुराल की अहमियत थोड़ी और बढ़ गई है। ससुराल के प्रताप से लोग लंबी छलांग लगा रहे हैं।
Read Also- Jharkhand Bureaucracy : ईमानदारी के मारे ‘बेचारे’ | Jharkhand Liquor Scam
सोचने लगा कि आखिर गुरु का इशारा किस ओर है? किसने लंबी छलांग लगाई? गुरु असली मुद्दे पर आ रहे थे, बोले – क्या तुम्हें नहीं पता, शिखर का रास्ता ससुराल से जाता है। खुद को दौड़ से बाहर मान चुकीं एक मोहतरमा मार्ग में मिलीं। देखते ही देखते पदार्थ से ‘तदर्थ’ हुईं और फिर माथे का चंदन बन गईं। पहले महकमे में सबसे ऊंची कुर्सी हाथ लगी, फिर अंतिम समय में अंतिम मुहर लग गई।
Read Also- Jharkhand Bureaucracy : नौकरशाही : टेम लगेगा…टेम | Waiting For Posting
वह भी तब, जब तीन-तीन बड़े खिलाड़ी दौड़ में लगे थे। माना जा रहा था कि अनुभव की कसौटी पर सबको कसा जाएगा, लेकिन… ऐन वक्त पर सब बदल गया। 90 नंबर वाले खिलाड़ी ‘पलटा’ दिए गए, 92 नंबर वाले ‘शांत’ कर दिए गए। 93 वाले दरकिनार कर दिए गए। कतार में तीन पायदान पीछे खड़ी खिलाड़ी ने मैदान मार लिया। जानने वाले बताते हैं कि खिलाड़ी की चाहत बस ‘डीजे’ सेट तक पहुंचने की थी। आगे की कुर्सी तक पहुंच बन जाए, यह तो प्रभु जगन्नाथ की साक्षात् कृपा है।
Read Also- Jharkhand Bureaucracy : नौकरशाही : प्रणाम, प्रणामी, हमनामी | Jharkhand IAS Controversy
गुरु की व्याख्या ने और उलझा दिया। सोचने लगा कि इसमें ससुराल की क्या भूमिका। गुरु समझ गए। बोले- यह जरूरी नहीं कि अपनी ही काम आए। मालिक-मुख्तार की ससुराल का लिंक मिल जाए तो भी काम बन सकता है। यकीन न हो तो खोजी खबर के लिए कलिंग की ओर निकल जाओ। पता चल जाएगा कि मेरी बात कपोल ‘कल्पना’ नहीं, हकीकत है। अब बात समझ में आ गई। पिटारा खुल चुका था।
Read Also- Jharkhand Bureaucracy : नौकरशाही : दिल ढूंढता है… | Jharkhand Bureaucratic Satirical Story
पहले मुस्कान का आदान-प्रदान हुआ। फिर अभिवादन करते हुए बाहर निकले। गुरु ने गूढ़ कथा का एक सिरा खोल दिया था। अब बात इससे आगे की थी। और इसके लिए धैर्य धारण की आवश्यकता थी। गुरु के पड़ोस में शायद कोई महाभारत सीरियल देखने जा रहा था। सीरियल का शीर्षक गीत बज रहा था, ‘यदा यदा हि… आभास कुछ और हो रहा था तदा, तदा हि…।’
Read Also- Jharkhand Bureaucracy : नौकरशाही : आईपीएल नहीं, ‘आईए बनाम आईपी’

