Jharkhand Bureaucracy : घर के अहाते में पूरी महफिल जमी थी। गुरु कहानी सुना रहे थे। कथा का शीर्षक था- ‘ईमानदार अधिकारी’। कहानी की शुरुआत कुछ यूं हुई- कुछ समय पहले की बात है। लौहनगरी नामक नगर में सबसे बड़ी कुर्सी पर एक बड़े हाकिम विराजमान थे। हाकिम का बस एक ही फितूर था। जन-गण का हर मन उन्हें कट्टर ईमानदार समझे। लिहाजा चौबीस घंटे माहौल बनाने में लगे रहते।
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कुछ वक्त गुजरने के बाद हाकिम का यह आत्मविश्वास और अटल हो गया। सिपहसालारों ने बताया कि अपनी ईमानदारी के कारण वह जन-जन में लोकप्रिय हो गए हैं। अचानक एक दिन समय ने करवट बदली। एक बड़े ‘खेल’ में शामिल होने के संदेह में हाकिम तलब कर लिए गए। इस घटना का हाकिम को गहरा आघात लगा। सदमे में आ गए। पेशी से वापस लौटने के बाद कई दिनों तक कोप भवन में पड़े रहे। नजदीकी लोगों से हाकिम का यह दुख देखा नहीं गया। अपनी-अपनी सहानुभूति लेकर मिलने पहुंचे। इस दौरान मन हल्का करने के लिए हाकिम ने अपनी आत्मकथा बताई।
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सुनाया, ‘बीते दिनों की बात है। एक दिन घर पहुंचा तो घर के लॉन में एक लंबी गाड़ी खड़ी दिखी। पिताजी से पूछने पर पता चला कि ससुर जी सौगात दे गए हैं। थोड़ी और खोजबीन पर मामला साफ हो गया। ससुर जी के जरिए किसी और ने यह उपहार भिजवाया है’। हाकिम की मानें तो उन्होंने पिताजी से साफ कह दिया कि वह इस वाहन में सफर नहीं करेंगे। उन्हें पसंद नहीं कि उपहार की कीमत कोई और बताने आ जाए। बदले में इतने दिनों की बनी बनाई ईमानदारी दांव पर लग जाए।
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हाकिम का दावा था कि कुछ दिनों तक उनका यही रुख कायम रहा। पिताजी ने ससुर जी को सूचित किया। निवेदन किया कि वह अपना उपहार ले जाएं। उनके दामाद जी इसे स्वीकार नहीं कर रहे। थक-हारकर महंगी गाड़ी कुछ समय बाद अपने किसी और गंतव्य तक पहुंच गई। कहने का मतलब साफ था। तमाम झंझावात के बीच हाकिम ने अपनी ईमानदारी से कभी कोई समझौता नहीं किया। यही वजह रही कि अपने अब तक के कार्यकाल में वह मेलजोल बढ़ाने से बचते रहे। जन से सीधे संवाद की जगह तंत्र से ताल्लुक रखते थे।
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हाकिम का दृढ़ विश्वास था कि जनहित के लिए बस मन होना जरूरी है। लोकहित की कल्पना मात्र से कल्याण की अभिलाषा पूर्ण हो सकती है। कुछ इसी भाव से उन्होंने जनसेवा का लंबा समय गुजारा। कभी सोचा नहीं था कि इतनी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा का ऐसा प्रतिफल मिलेगा। इसके साथ ही गुरु ने कथा समाप्ति की घोषणा की। श्रोताओं के मन में पात्र की तस्वीर साफ नहीं हो सकी। एक जिज्ञासु श्रोता ने सवाल पूछा। गुरु इस कहानी का नायक कौन है? गुरु ने कहा, जीवन और कहानी में बड़ा फर्क है।
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जीवन में नायक बदलते रहते हैं। कहानी में नायक तय होता है। उदाहरण के लिए महाभारत को ले लो। इसमें जीवन चक्र जैसे-जैसे बढ़ता है, वैसे-वैसे नायक बदलते हैं। कभी दुर्योधन के साथ रहने के कारण कर्ण अधर्मी लगता है। कभी सच्ची दोस्ती और दानी होने के कारण धर्मपरायण। गुरु अपनी बात कह कर घर में प्रवेश कर गए। सभा साधु-साधु का उद्घोष करते हुए विसर्जित हो गई।
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