
रांची: झारखंड में शिक्षक बनने का सपना देखने वाले और न्याय के लिए संघर्ष कर रहे अभ्यर्थियों के लिए एक बड़ी खबर सामने आ रही है। साल 2016 की बहुचर्चित हाईस्कूल शिक्षक नियुक्ति प्रक्रिया में हुई कथित गड़बड़ियों की आंच अब और तेज हो गई है। झारखंड हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति गौतम कुमार चौधरी की अगुवाई वाली एक सदस्यीय फैक्ट फाइंडिंग कमीशन ने इस मामले में शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। आयोग ने झारखंड कर्मचारी चयन आयोग और स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग को नोटिस जारी कर एक सप्ताह के भीतर तमाम दस्तावेज और बिंदुवार जवाब तलब किए हैं। इस मामले की अगली और बेहद अहम सुनवाई आगामी 14 अक्टूबर को पुराने हाईकोर्ट परिसर में होगी।
कम अंक पाने वालों को नौकरी मिलने का गंभीर आरोप
इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब 600 से अधिक अभ्यर्थियों ने नियुक्ति प्रक्रिया में धांधली का दावा करते हुए मोर्चा खोला। छह अक्टूबर को हुई पिछली सुनवाई में याचिकाकर्ताओं के वकील ने आयोग के सामने दस्तावेज रखते हुए आरोप लगाया कि पूरी बहाली प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी की गई। उनका कहना था कि बिना किसी निर्धारित राज्यस्तरीय मेधा सूची के ही नियुक्तियां बांट दी गईं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कई विषयों और श्रेणियों में उन उम्मीदवारों को नौकरी दे दी गई, जिनके अंक कट-ऑफ या अन्य योग्य अभ्यर्थियों से काफी कम थे।
अब आयोग ने इन तमाम दावों की सत्यता जांचने के लिए याचिकाकर्ताओं के वकीलों से हर एक पीड़ित और चयनित अभ्यर्थी का पूरा ब्योरा – नाम, रोल नंबर, प्राप्तांक और जिला मांग लिया है।
जेएसएससी और शिक्षा विभाग से कड़े सवाल
फैक्ट फाइंडिंग कमीशन ने सिर्फ अभ्यर्थियों का पक्ष ही नहीं, बल्कि चयन आयोग और शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े किए हैं। आयोग ने जेएसएससी से पूछा है कि दो अगस्त 2022 को सुप्रीम कोर्ट के आदेश और स्थानीय आरक्षण नीति रद्द होने के बाद कोई संशोधित राज्यस्तरीय मेरिट लिस्ट तैयार की गई थी या नहीं?
इसके अलावा, परीक्षा में शामिल कुल छात्रों के आंकड़े, परिणाम प्रकाशन का तरीका और उस वक्त के जिम्मेदार अधिकारियों का पूरा रिकॉर्ड मांगा गया है। वहीं, शिक्षा विभाग को भी निर्देश दिया गया है कि वे अगस्त 2022 के बाद हुई नियुक्तियों, खाली पदों और वेटिंग लिस्ट से जुड़े सभी दस्तावेजों को तुरंत पेश करें।
आयोग ने सख्त लहजे में चेतावनी दी है कि यदि किसी भी स्तर पर टालमटोल या अधूरा जवाब दिया गया, तो इसे जानबूझकर की गई अवहेलना माना जाएगा और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। 14 अक्टूबर को होने वाली अगली सुनवाई इस मामले का रुख तय करने में बेहद अहम साबित होगी।
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