Ranchi : झारखंड में आगामी राज्यसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। राज्य की दो सीटें खाली होने जा रही हैं, जिन पर सत्तारूढ़ गठबंधन और विपक्ष दोनों की नजरें टिकी हुई हैं। चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, सत्ता पक्ष के भीतर भी हल्की खींचतान के संकेत मिल रहे हैं, वहीं भाजपा सीमित संख्या के बावजूद मुकाबले को दिलचस्प बनाने की रणनीति पर काम कर रही है।
सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) दोनों सीटों पर अपनी मजबूत दावेदारी मान रहा है। पार्टी का तर्क है कि राज्य की राजनीति में उसकी प्रमुख भूमिका के कारण उसे ज्यादा प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। हालांकि, यह रास्ता पूरी तरह आसान नहीं दिख रहा।
झामुमो को दोनों सीटों पर जीत सुनिश्चित करने के लिए कांग्रेस का सहयोग जरूरी होगा। ऐसे में गठबंधन के भीतर तालमेल, आपसी विश्वास और सीटों के बंटवारे पर सहमति इस चुनाव का सबसे अहम पहलू बन गया है। हाल ही में जिस तरह से दोनों दलों के बीच खटास आई है उसे देखते हुए राज्यसभा चुनाव में यह भड़ास निकल सकती है।
दूसरी ओर, कांग्रेस के लिए भी यह चुनाव बेहद महत्वपूर्ण है। हाल के कुछ राज्यों में कमजोर तालमेल के कारण पार्टी पहले ही दबाव में है। ऐसे में झारखंड में अपनी दावेदारी छोड़ना उसके लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदेह हो सकता है। पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि वह गठबंधन में बराबरी की भागीदार है और अपने हितों से समझौता नहीं करेगी।
उधर, विपक्षी भारतीय जनता पार्टी भी इस चुनाव को हल्के में नहीं ले रही। भले ही उसके पास अपने दम पर जीत का आंकड़ा नहीं है, लेकिन सहयोगी दलों- आजसू, जदयू और लोजपा के साथ मिलकर उसके पास करीब 24 वोट हैं। ऐसे में अगर भाजपा चार अतिरिक्त वोट जुटा लेती है, तो मुकाबला पलट सकता है।
इसी रणनीति के तहत भाजपा संभावित क्रॉस वोटिंग और अंदरूनी असंतोष पर नजर बनाए हुए है। पार्टी के संभावित उम्मीदवारों में सीता सोरेन का नाम चर्चा में है। यदि उन्हें मैदान में उतारा जाता है, तो चुनाव और भी रोचक हो सकता है।
संख्या बल की बात करें तो राज्यसभा चुनाव में एक उम्मीदवार को जीत के लिए 28 वोटों की जरूरत होती है। सत्तारूढ़ गठबंधन झामुमो, कांग्रेस, राजद और भाकपा माले के पास कुल 56 विधायक हैं, जो दोनों सीटें जीतने के लिए पर्याप्त हैं। लेकिन इसके लिए गठबंधन में एकजुटता और समन्वय बनाए रखना बेहद जरूरी होगा।
कुल मिलाकर, झारखंड का यह राज्यसभा चुनाव केवल संख्या का खेल नहीं, बल्कि रणनीति, तालमेल और राजनीतिक संतुलन की भी बड़ी परीक्षा साबित होने जा रहा है।

