दिल्ली की सर्दियों में एक अजीब सी बेचैनी होती है। धुंध से ढंकी सुबहें, मेट्रो की भीड़, ट्रैफिक का शोर और समय से आगे निकल जाने की होड़ के बीच मन बार-बार किसी ऐसी जगह की तलाश करता है, जहां प्रकृति अब भी अपनी धीमी लय में सांस ले रही हो। शायद इसी तलाश ने मुझे सिक्किम की युमथांग वैली की ओर खींच लिया। वर्षों से सुनता आया था कि पूर्वी हिमालय की यह घाटी हर मौसम में अपना रंग बदलती है- कभी फूलों से भरी, कभी बादलों में खोई और कभी बर्फ की सफेद चादर में ढंकी हुई।

दिल्ली से मेरी यात्रा शुरू हुई। सुबह की उड़ान से मैं बागडोगरा पहुंचा। विमान से उतरते ही हवा बदल चुकी थी। यहां ठंड में नमी थी और हवा में पहाड़ों की हल्की खुशबू घुली हुई थी। एयरपोर्ट के बाहर टैक्सियों की कतार लगी थी और हर गाड़ी की विंडशील्ड पर रंगीन प्रेयर फ्लैग्स हवा में लहरा रहे थे। मुझे गंगटोक पहुंचना था। जैसे-जैसे सड़क मैदानों से पहाड़ों की ओर बढ़ने लगी, वैसे-वैसे दृश्य बदलते गए। कुछ ही देर में तीस्ता नदी हमारे साथ बहने लगी। पहाड़ों के बीच हरे रंग की यह नदी पूरे रास्ते सफर की साथी बनी रही। कहीं उसका बहाव शांत दिखाई देता, तो कहीं वह चट्टानों से टकराकर तेज़ आवाज़ के साथ आगे बढ़ती। रास्ते में छोटे ढाबे, बादलों में खोते गांव और पहाड़ी मोड़ों पर बने बौद्ध स्तूप सफर को किसी चलचित्र जैसा बना रहे थे।
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गंगटोक पहुंचते-पहुंचते शाम हो चुकी थी। पहाड़ों पर बसी रोशनियां दूर से किसी तारों भरे आकाश जैसी दिखाई दे रही थीं। हवा में ठंडक थी, लेकिन शहर की रफ्तार दिल्ली की तुलना में कहीं धीमी और सुकून भरी लगी। होटल की बालकनी से दूर पहाड़ों पर तैरते बादलों को देखते हुए महसूस हुआ कि हिमालय केवल एक जगह नहीं, बल्कि एक अनुभव है।
अगली सुबह मेरी यात्रा युमथांग वैली की ओर शुरू हुई। गंगटोक से लाचुंग तक का रास्ता लंबा जरूर है, लेकिन हर मोड़ पर हिमालय अपना नया रूप दिखाता है। सड़कें कभी गहरी घाटियों के किनारे से गुजरतीं, तो कभी घने जंगलों के भीतर खो जातीं। रास्ते में कई झरने दिखाई देते रहे। कहीं पानी चट्टानों से सीधा सड़क के पास गिर रहा था, तो कहीं धुंध के बीच सफेद रेखा की तरह दूर चमक रहा था। ऊंचाई बढ़ने के साथ मौसम भी बदलने लगा। हवा और ठंडी हो गई थी। रास्ते में छोटे-छोटे गांव दिखाई देते, जहां लकड़ी के घरों की छतों पर रंगीन प्रेयर फ्लैग्स लहरा रहे थे। पहाड़ों में जीवन कठिन जरूर है, लेकिन वहां के लोगों के चेहरों पर एक सहज शांति दिखाई देती है।
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शाम तक मैं लाचुंग पहुंचा। लगभग नौ हजार फीट की ऊंचाई पर बसा यह छोटा सा गांव किसी चित्र जैसा सुंदर लगता है। चारों ओर बर्फ से ढंकी चोटियां, बीच से बहती नदी और लकड़ी के पारंपरिक घर- सब कुछ इतना शांत था कि समय मानो धीमा पड़ गया हो। रात के समय जब आसमान साफ हुआ, तब अनगिनत तारे दिखाई देने लगे। शहरों में शायद हम यह भूल चुके हैं कि रात का आसमान वास्तव में कितना विशाल होता है।
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अगली सुबह युमथांग वैली की ओर निकलते समय पूरा रास्ता बादलों और बर्फ के बीच से गुजर रहा था। सूरज की पहली किरणें पहाड़ों पर पड़ रही थीं और दूर चोटियां सुनहरी दिखाई देने लगी थीं। रास्ते में याक चरते दिखाई दिए और कई जगह पहाड़ों पर जमी बर्फ अब भी चमक रही थी। फिर अचानक एक मोड़ के बाद युमथांग वैली सामने थी।
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पहली नजर में ऐसा लगा मानो किसी चित्रकार ने पूरी घाटी को रंगों से भर दिया हो। चारों ओर फैले घास के मैदान, पीछे बर्फ से ढंकी चोटियां और बीच से बहती नदी- यह दृश्य शब्दों से कहीं अधिक सुंदर था। वसंत के मौसम में यहां हजारों रंग-बिरंगे रोडोडेंड्रोन फूल खिलते हैं, जबकि सर्दियों में पूरी घाटी सफेद बर्फ की चादर में बदल जाती है। शायद यही कारण है कि इसे ‘वैली ऑफ फ्लावर्स’ कहा जाता है। मैं काफी देर तक घाटी में बिना कुछ बोले चलता रहा। हवा में ऐसी ठंडक थी, जो चेहरे को छूते ही भीतर तक उतर जाती थी। लेकिन उस ठंड के बीच भी एक गहरी शांति थी। यहां आकर महसूस होता है कि प्रकृति इंसान को विनम्र बना देती है। हमारी रोजमर्रा की चिंताएं इन विशाल पहाड़ों के सामने कितनी छोटी लगने लगती हैं।
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युमथांग की सबसे खास बात उसकी नीरवता है। यहां शांति केवल सुनाई नहीं देती, बल्कि महसूस होती है। हवा, नदी और पहाड़ जैसे किसी अदृश्य संगीत का हिस्सा लगते हैं। घाटी में आगे बढ़ने पर प्राकृतिक गर्म पानी के झरने भी दिखाई देते हैं। ठंडी हवा और आसपास जमी बर्फ के बीच गर्म पानी से उठती भाप एक अद्भुत दृश्य बनाती है। युमथांग से आगे जीरो प्वाइंट की ओर जाने वाला रास्ता और भी रोमांचक है। सड़क धीरे-धीरे ऊंचाई की ओर बढ़ती है और कुछ दूरी के बाद केवल बर्फ, चट्टानें और बादल दिखाई देते हैं। रास्ते में सेना के वाहन लगातार दिखाई देते हैं, क्योंकि यह इलाका चीन सीमा के करीब है।
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जीरो प्वाइंट पहुंचते ही चारों ओर केवल सफेद बर्फ फैली दिखाई दी। तेज़ हवा चेहरे को चीरती हुई गुजर रही थी, लेकिन उस ठंड के बीच भी लोग उत्साह से भरे हुए थे। कुछ बच्चे बर्फ से खेल रहे थे, तो कुछ पर्यटक खामोश खड़े पहाड़ों को निहार रहे थे। वहां खड़े होकर एहसास हुआ कि हिमालय की असली शक्ति उसकी ऊंचाई में नहीं, बल्कि उसकी शांति में छिपी है। वापसी के दौरान एक छोटे ढाबे पर रुककर मैंने गरम थुकपा और मोमो खाए। बाहर बर्फीली हवा चल रही थी और भीतर लकड़ी के चूल्हे की गर्माहट थी। पहाड़ों में साधारण भोजन भी किसी विशेष अनुभव जैसा लगता है।
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जब मैं वापस गंगटोक लौट रहा था, तब रास्ते भर मन बार-बार पीछे मुड़कर देखना चाहता था। पहाड़ धीरे-धीरे दूर होते जा रहे थे, लेकिन भीतर युमथांग की शांति अब भी बाकी थी। शायद यही इस घाटी का सबसे बड़ा आकर्षण है- आप यहां कुछ दिनों के लिए आते हैं, लेकिन इसकी नीरवता लंबे समय तक आपके भीतर ठहर जाती है।

