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यात्रा वृतांत : समुद्र, पहाड़ और आदिवासी जीवन

दैनिक समाचार पत्र द फोटोन न्यूज के साहित्य पेज के लिए लिखे गए कॉलम : घुमक्कड़ की पाती से साभार

by Sanjaya Shepherd
Araku Valley Travel
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दिल्ली की गर्मियां हमेशा एक बेचैनी लेकर आती हैं। धूल से भरी सड़कें, मेट्रो स्टेशनों की भीड़, लगातार बजते मोबाइल और समय के पीछे भागती ज़िंदगी के बीच मन बार-बार किसी ऐसी जगह की तलाश करने लगता है, जहां शोर कम हो और प्रकृति की आवाज़ साफ सुनाई दे। कई दिनों से मेरे भीतर भी यही इच्छा आकार ले रही थी। मैं ऐसी जगह जाना चाहता था, जहां पहाड़ हो, हरियाली हो, लेकिन भीड़ कम हो। तभी अचानक मन में आराकू घाटी का नाम उभरा- आंध्र प्रदेश के पूर्वी घाट में बसी वह शांत घाटी, जिसके बारे में अक्सर सुनता आया था कि वहां प्रकृति अब भी अपने मूल रूप में सांस लेती है।

दिल्ली से मेरी यात्रा शुरू हुई। रात की उड़ान से मैं विशाखापट्टनम पहुंचा। सुबह जब विमान समुद्र के ऊपर से नीचे उतर रहा था, तब खिड़की से दिखाई देता बंगाल की खाड़ी का विशाल विस्तार किसी नीली चादर जैसा लग रहा था। दिल्ली की तपती हवा से बिल्कुल अलग यहां नम समुद्री हवा थी। विशाखापट्टनम शहर समुद्र और पहाड़ों के बीच बसा हुआ है और शायद यही कारण है कि इसमें एक साथ ऊर्जा और शांति दोनों महसूस होती हैं।

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लेकिन मेरी मंज़िल अभी आगे थी। अगले दिन सुबह-सुबह मैं विशाखापट्टनम रेलवे स्टेशन पहुंचा। आराकू जाने वाली ट्रेन प्लेटफॉर्म पर तैयार खड़ी थी। इस रेलमार्ग के बारे में पहले ही सुन चुका था कि यह भारत के सबसे खूबसूरत ट्रेन रूट्स में से एक है। ट्रेन धीरे-धीरे शहर से बाहर निकली और कुछ ही देर में समुद्र पीछे छूट गया। मैदानों की जगह पहाड़ों ने ले ली और खिड़की के बाहर घने जंगल दिखाई देने लगे।

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यह सफर वास्तव में किसी चलचित्र जैसा था। रास्ते में दर्जनों सुरंगें आतीं। हर बार ट्रेन सुरंग में प्रवेश करती तो पूरा डिब्बा कुछ क्षणों के लिए अंधेरे में डूब जाता और बाहर निकलते ही सामने खुली घाटियां, झरने और बादलों से ढकी पहाड़ियां दिखाई देने लगतीं। यात्रियों के चेहरे हर बार उसी उत्साह से भर उठते। कहीं पहाड़ों के बीच छोटी नदी चमकती दिखाई देती, तो कहीं दूर आदिवासी गाँव पहाड़ियों की ढलानों पर टिके हुए नजर आते।

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जैसे-जैसे ट्रेन ऊपर चढ़ रही थी, मौसम बदलने लगा। विशाखापट्टनम की उमस भरी गर्मी अब ठंडी हवा में बदल चुकी थी। रास्ते में दिखाई देने वाले छोटे-छोटे गाँवों में मिट्टी और बांस से बने घर थे। खेतों में काम करती महिलाएं रंग-बिरंगे वस्त्रों में दूर से किसी लोकचित्र का हिस्सा लग रही थीं। यहां की जिंदगी में एक सादगी थी, जो बड़े शहरों में अब दुर्लभ होती जा रही है।

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करीब चार घंटे बाद ट्रेन आराकू स्टेशन पहुंची। छोटा सा स्टेशन, आसपास फैली हरियाली और पहाड़ों से उतरती ठंडी हवा- पहली ही नजर में यह जगह मन को सुकून देने लगी। स्टेशन के बाहर सड़क किनारे छोटी दुकानों से ताज़ी कॉफी की खुशबू हवा में घुल रही थी। आराकू अपनी ऑर्गेनिक कॉफी के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है और यहां पहुंचते ही उसका एहसास होने लगता है।

मैं जिस होमस्टे में ठहरा था, वह घाटी के किनारे स्थित था। कमरे की खिड़की से दूर तक फैली पहाड़ियां दिखाई देती थीं। शाम ढल रही थी और सूरज की सुनहरी रोशनी धीरे-धीरे जंगलों के पीछे उतर रही थी। हवा में हल्की ठंडक थी और आसपास केवल पक्षियों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। दिल्ली की भागती जिंदगी से दूर यह शांति भीतर तक उतरने लगी थी।

अगली सुबह मेरी यात्रा का पहला पड़ाव था— कॉफी के बागान। आराकू की पहचान केवल उसकी प्राकृतिक सुंदरता नहीं, बल्कि यहां की जैविक कॉफी भी है। पहाड़ियों के बीच फैले कॉफी प्लांटेशन किसी हरे कालीन जैसे दिखाई देते हैं। सुबह की धूप पेड़ों के बीच छनकर नीचे गिर रही थी और हवा में मिट्टी और कॉफी की मिली-जुली सुगंध तैर रही थी।

वहां काम कर रहे एक स्थानीय युवक ने बताया कि इस क्षेत्र की अधिकांश कॉफी आदिवासी समुदायों द्वारा उगाई जाती है। वर्षों पहले यहां खेती सीमित थी, लेकिन कॉफी ने लोगों की जिंदगी बदल दी। उसने मुझे ताज़ा कॉफी बीन्स हाथ में दी। उनकी खुशबू बिल्कुल अलग थी- हल्की, प्राकृतिक और मिट्टी से जुड़ी हुई।

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कॉफी बागानों से लौटते समय रास्ते में कई छोटे झरने दिखाई दिए। कहीं बच्चे पानी में खेल रहे थे, तो कहीं महिलाएं जंगल से लकड़ियां लेकर लौट रही थीं। आराकू में प्रकृति केवल देखने की चीज़ नहीं, बल्कि लोगों के जीवन का हिस्सा है। यहां जंगल, पहाड़ और इंसान अलग-अलग नहीं लगते, बल्कि एक-दूसरे में घुले हुए महसूस होते हैं।

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शाम को मैं स्थानीय आदिवासी संग्रहालय पहुंचा। बाहर से साधारण दिखने वाला यह संग्रहालय भीतर आदिवासी संस्कृति की पूरी दुनिया समेटे हुए है। दीवारों पर बने चित्र, लकड़ी की मूर्तियां, पारंपरिक वाद्ययंत्र और मिट्टी के बर्तन इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बना देते हैं। संग्रहालय में घूमते हुए एहसास हुआ कि आराकू की असली खूबसूरती केवल उसकी घाटियों में नहीं, बल्कि उन लोगों में भी है जिन्होंने सदियों से प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जिया है।

अगले दिन मैं बोर्रा गुफाओं की ओर निकल पड़ा। आराकू से कुछ दूरी पर स्थित ये गुफाएं पूर्वी घाट की सबसे प्रसिद्ध प्राकृतिक संरचनाओं में गिनी जाती हैं। रास्ता घने जंगलों और पहाड़ी मोड़ों से होकर गुजरता है। कई जगह बादल इतने नीचे उतर आए थे कि लगता था मानो गाड़ी धुंध के भीतर प्रवेश कर रही हो।

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बोर्रा गुफाओं के भीतर प्रवेश करते ही वातावरण अचानक बदल गया। ऊपर से टपकता पानी, चूना पत्थर से बनी विचित्र आकृतियां और हल्की रोशनी में बनती परछाइयां गुफाओं को रहस्यमय बना रही थीं। कहीं पत्थर शिवलिंग जैसे दिखाई देते, तो कहीं किसी मानव आकृति की तरह। स्थानीय लोग इन गुफाओं से जुड़ी कई लोककथाएँ सुनाते हैं, जिनमें आस्था और प्रकृति एक-दूसरे में घुली हुई महसूस होती हैं।

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गुफाओं से लौटते समय मैं अनंतगिरि की पहाड़ियों में कुछ देर रुका। सड़क किनारे छोटे ढाबों में बांस चिकन और स्थानीय व्यंजनों की खुशबू हवा में तैर रही थी। मैंने केले के पत्ते पर परोसा गया स्थानीय भोजन खाया। पहाड़ों में साधारण भोजन भी किसी विशेष अनुभव जैसा लगता है।

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यात्रा के दौरान मैंने महसूस किया कि आराकू की सबसे बड़ी खूबसूरती उसकी सादगी है। यहां तेज़ संगीत, भीड़ और चमक-दमक कम दिखाई देती है। लोग धीरे बोलते हैं, रास्ते शांत हैं और प्रकृति हर जगह प्रमुख भूमिका में है। शायद यही कारण है कि यहां आने के बाद मन अपने आप धीमा पड़ने लगता है।

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एक शाम मैं घाटी के एक छोटे से गांव तक पैदल चला गया। बच्चे खुले मैदानों में खेल रहे थे और महिलाएं घरों के बाहर बैठकर हस्तशिल्प का काम कर रही थीं। वहां किसी को जल्दी नहीं थी। शहरों की तरह यहां समय घड़ी से नहीं, सूरज और मौसम से चलता हुआ महसूस होता है।

जब वापसी के लिए ट्रेन फिर पहाड़ों से नीचे उतरने लगी, तब मन बार-बार पीछे मुड़कर देखना चाहता था। धीरे-धीरे घाटियां दूर होती गईं, लेकिन भीतर एक गहरी शांति रह गई थी। शायद यही आराकू का सबसे बड़ा आकर्षण है- आप यहां कुछ दिनों के लिए आते हैं, लेकिन इसकी हरियाली, इसकी खामोशी और इसकी सरलता लंबे समय तक आपके भीतर बनी रहती है।

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