
रांची : झारखंड के ग्रामीण इलाकों में सड़कों के निर्माण का तरीका बदलने की तैयारी है। अब गांवों की सड़कें बनाने में केवल गिट्टी, बालू और पारंपरिक निर्माण सामग्री पर निर्भरता नहीं रहेगी, बल्कि प्लास्टिक कचरे, बिजलीघरों से निकलने वाली राख और इस्पात कारखानों के अपशिष्ट का भी इस्तेमाल किया जाएगा।
झारखंड स्टेट रूरल रोड्स डेवलपमेंट अथॉरिटी
(जेएसआरआरडीए) ग्रामीण सड़क निर्माण में पर्यावरण अनुकूल तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपनाने की दिशा में काम कर रही है। इस पहल का उद्देश्य ग्रामीण सड़कों को मजबूत बनाना, औद्योगिक कचरे का उपयोग बढ़ाना और प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ने वाले दबाव को कम करना है।
नई व्यवस्था के तहत ग्रामीण सड़कों के निर्माण की अलग-अलग परतों में पुनर्चक्रित और पर्यावरण हितैषी सामग्रियों के इस्तेमाल पर जोर दिया जाएगा। सड़क की जमीन तैयार करने से लेकर उसकी ऊपरी सतह बनाने तक, मिट्टी की गुणवत्ता, यातायात के दबाव और स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर तकनीक का चयन किया जाएगा। इससे सड़क निर्माण को अधिक वैज्ञानिक बनाने और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करने में मदद मिल सकती है।
प्लास्टिक कचरे, फ्लाई ऐश और स्टील स्लैग से होगा सड़क निर्माण
झारखंड में ग्रामीण सड़कों के निर्माण के दौरान कई प्रकार की वैकल्पिक सामग्रियों का उपयोग प्रस्तावित है। इनमें प्लास्टिक अपशिष्ट, ताप विद्युत संयंत्रों से निकलने वाली राख यानी फ्लाई ऐश और इस्पात कारखानों से प्राप्त स्लैग प्रमुख हैं। इन सामग्रियों का उपयोग सड़क की उपयुक्त परतों में तकनीकी मानकों के अनुसार किया जा सकेगा।
प्लास्टिक कचरे को तारकोल के साथ मिलाकर सड़क निर्माण में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा कम तापमान पर सड़क तैयार करने वाली शीत मिश्रण तकनीक भी अपनाई जाएगी। इस तकनीक से निर्माण के दौरान ईंधन की खपत और वायु प्रदूषण कम करने में मदद मिल सकती है। सड़क निर्माण में प्लास्टिक अपशिष्ट के उपयोग से कचरे के पुनर्चक्रण को बढ़ावा देने का अवसर भी मिलेगा।
वहीं, ताप विद्युत संयंत्रों से निकलने वाली राख और इस्पात उद्योग के स्लैग का उपयोग सड़क की आधार परत को मजबूत बनाने के लिए किया जा सकता है। हालांकि, इन सामग्रियों का इस्तेमाल उनकी गुणवत्ता, उपयुक्तता और निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप ही किया जाएगा।
मिट्टी की मजबूती बढ़ाने के लिए अपनाई जाएगी वैज्ञानिक तकनीक
ग्रामीण सड़कों की मजबूती काफी हद तक उस जमीन पर निर्भर करती है, जिस पर उनका निर्माण किया जाता है। इसी को ध्यान में रखते हुए मिट्टी को मजबूत बनाने के लिए स्थानीय मिट्टी, सीमेंट और चूने के वैज्ञानिक मिश्रण का इस्तेमाल किया जाएगा। इससे जमीन की भार सहने की क्षमता बढ़ाने में मदद मिलेगी और सड़क की आधार संरचना को अधिक टिकाऊ बनाया जा सकेगा।
प्रस्तावित तकनीक के तहत सड़क की विभिन्न परतों में उपयुक्त सामग्री का चयन किया जाएगा। इसमें सबग्रेड यानी सड़क की तैयार की गई जमीन, सब-बेस और बेस कोर्स जैसी आधार परतों के साथ सीमेंट कंक्रीट तथा तारकोल की सतह भी शामिल हैं। किस सड़क पर कौन-सी सामग्री इस्तेमाल होगी, यह स्थानीय मिट्टी की स्थिति और यातायात के दबाव को ध्यान में रखकर तय किया जाएगा।
भारी बारिश और जलभराव की समस्या वाले क्षेत्रों में विशेष निर्माण तकनीकों पर जोर दिया जाएगा। ऐसे इलाकों में सेल फिल्ड कंक्रीट और पैनल आधारित सीमेंट कंक्रीट जैसी तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है। इसका उद्देश्य सड़क की संरचना को स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल बनाना और पानी के कारण होने वाली क्षति की आशंका कम करना है।
पुरानी सड़कों की सामग्री से तैयार होगा नया आधार
नई सड़कें बनाने के साथ-साथ पुरानी और क्षतिग्रस्त सड़कों की सामग्री का दोबारा इस्तेमाल करने पर भी जोर दिया जाएगा। इसके लिए सड़क निर्माण स्थल पर ही पुरानी सामग्री के पुनर्चक्रण की तकनीक अपनाई जा सकती है। इससे पहले से मौजूद निर्माण सामग्री को उपयोग में लाकर नई सड़क की आधार परत तैयार करने में मदद मिलेगी।
पारंपरिक निर्माण में नई गिट्टी, बालू और अन्य प्राकृतिक संसाधनों की जरूरत पड़ती है। पुनर्चक्रण आधारित तकनीकों से इन सामग्रियों की खपत घटाने की संभावना है। साथ ही, पुरानी सड़क की उपयोगी सामग्री को दोबारा इस्तेमाल करने से कचरे के निस्तारण की समस्या कम हो सकती है।
झारखंड जैसे राज्य में, जहां ग्रामीण संपर्क मार्ग गांवों को बाजार, स्वास्थ्य सेवाओं और अन्य जरूरी सुविधाओं से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, वहां सड़क निर्माण में संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल उपयोगी साबित हो सकता है। हालांकि, सड़क की वास्तविक मजबूती और टिकाऊपन निर्माण की गुणवत्ता, सामग्री के मानकों तथा रखरखाव पर भी निर्भर करेगा।
राष्ट्रीय मानकों और यातायात के दबाव के आधार पर चुनी जाएगी तकनीक
ग्रामीण सड़कों के निर्माण में पर्यावरण अनुकूल तकनीकों का इस्तेमाल निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुसार किया जाएगा। इसके लिए इंडियन रोड्स कांग्रेस (आईआरसी), ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (आईएस) और केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के मानकों को ध्यान में रखा जाएगा।
सड़क निर्माण के दौरान यातायात के दबाव और मिट्टी की मजबूती का आकलन महत्वपूर्ण होगा। इसके लिए टी6, टी7, टी8 और टी9 जैसी यातायात श्रेणियों तथा कैलिफोर्निया बेयरिंग रेशियो (सीबीआर) मान का उपयोग किया जाएगा। सीबीआर से मिट्टी की भार सहने की क्षमता का आकलन करने में मदद मिलती है। इसी आधार पर तय किया जा सकेगा कि किसी ग्रामीण सड़क के निर्माण में कौन-सी तकनीक और सामग्री अधिक उपयुक्त होगी।
इस व्यवस्था से सड़क निर्माण में एक जैसी तकनीक अपनाने के बजाय स्थानीय जरूरतों के अनुसार विकल्प चुनने का अवसर मिलेगा। अलग-अलग क्षेत्रों में मिट्टी, वर्षा, जलभराव और यातायात की स्थिति अलग होती है। इसलिए इन परिस्थितियों को ध्यान में रखकर निर्माण करना सड़क की उपयोगिता और टिकाऊपन के लिहाज से महत्वपूर्ण होगा।
ग्रीन टेक्नोलॉजी से घट सकता है सड़क निर्माण का खर्च और कार्बन उत्सर्जन
पर्यावरण अनुकूल सड़क निर्माण का एक प्रमुख उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों की खपत कम करना और औद्योगिक अपशिष्टों का उपयोग बढ़ाना है। प्लास्टिक कचरे, फ्लाई ऐश, स्टील स्लैग और पुरानी सड़क की सामग्री का उचित इस्तेमाल होने से नई निर्माण सामग्री की जरूरत घट सकती है। कम तापमान वाली तकनीक से ईंधन की खपत और निर्माण के दौरान होने वाले उत्सर्जन में भी कमी लाने की संभावना है।

