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The Photon News Exclusive : Tusu पर थिरक रहा झारखंड, एक CLICK में जानें क्या होता है चौड़ल और टुसू प्रतिमा : Jharkhand Tusu Festival

Jharkhand Hindi News: टुसू झारखंड का बड़ा त्योहार है। इसमें मेले के दौरान चौड़ल और टुसू प्रतिमा लाने की परंपरा है। आज हम इस स्टोरी में चौड़ल और टुसू प्रतिमा के बारे में जानेंगे।

by Mujtaba Haider Rizvi
Jharkhand Tusu Festival
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The Photon News Exclusive : Jamshedpur : टुसू पर्व झारखंड का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। इस पर्व पर लोग सारे काम-धाम छोड़ कर घरों में अपनों के बीच होते हैं और पर्व का जमकर आनंद उठाते हैं। यह पर्व धान की फसल कटने के बाद मनाया जाता है और पकवान के रूप में गुड़-पीठा इसकी खास पहचान होती है, जिसे रिश्तेदारों तक भी पहुंचाया जाता है। इसे कुटुमारी कहा जाता है। इसी दिन अखाईन जतरा भी मनाया जाता है जिसका मतलब खेती की शुरुआत से होता है।

Jharkhand Tusu Festival: हारघुरा रस्म से खेती की होती है शुरुआत

जहां धान की फसल कटने के बाद खेती का काम बंद कर दिया जाता है तो टुसू के दिन से ही इसकी शुरुआत भी कर दी जाती है। घर का एक सदस्य सुबह ही नहा-धोकर नए कपड़े पहन कर सुबह सवेरे हारघुरा करता है। हरघुरा का मतलब है खेत जोतने की बोहनी यानी शुरुआत। नए कपड़े पहन कर किसान खेत में तीन, पांच सा सात बार हल के साथ बैलों को घुमा कर घर लाता है। इसके बाद घर में बैलों के पैर धोए जाते हैं और उनमें तेल लगाया जाता है। किसान गोबर डिंग में गोबर काट कर खेती के काम की शुरुआत करता है। इसके बाद किसान का पैर धोया जाता है। यह काम घर की बड़ी महिला करती है।

एक महीने तक लगता है मेला

यूं तो टुसू का मुख्य पर्व सामान्य रूप से 14 जनवरी को मनाया जाता है। मगर इसके बाद भी टुसू के मेले महीने भर तक लगते रहते हैं। डहरे टुसू भी निकाला जाता है यानि गलियों में टुसू का पर्व। इस दौरान टुसू मनाने वाले लोग एक जुलूस निकालते हैं। इधर बीच दो-तीन साल से जब भी टुसू पर्व आता है तो चौड़ल और टुसू प्रतिमा की चर्चा होती है। डहरे टुसू निकालने वाले झारखंड संस्कृति कला मंच का कहना है कि आदिवासी प्रकृति प्रेमी होता है। इसलिए, टुसू में प्रतिमा नहीं चौड़ल ही होना चाहिए। हम अपने इस न्यूज स्टोरी में जानेंगे कि आखिर क्या है चौड़ल और टुसू प्रतिमा। दोनों में क्या अंतर है? दोनों का टुसू से क्या संबंध है ?

Jharkhand Tusu Festival: ऐसे बनाया जाता है चौड़ल

टुसू पर्व का सबसे प्रमुख प्रतीक चौड़ल होता है। यह एक ऊंचा ढांचा होता है जिसे सजा-संवारकर उत्सव स्थल तक लाया जाता है। चौड़ल पूरी तरह से प्रकृति से जुड़ा है। जमशेदपुर के समाजसेवी आस्तिक महतो बताते हैं कि चौड़ल की अलग कहानी है। टुसू से पहले किसान खेत से धान का एक पौधा रात के अंधेरे में घर लाकर एक कमरे में रख देता है। इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि ऐसा करते हुए उसे कोई देख नहीं पाए। इसके बाद 23 दिन तक कमरे में इसकी पूजा की जाती है। यही गाछ (धान की फसल का पौधा) टुसू मनी है। इसी को सजाकर चौड़ल में रखा जाता है। चौड़ल को बांस और रंगीन कागज से सजा कर खूबसूरत बनाया जाता है। टुसू मेले में यही चौड़ल ले जाया जाता है। चौड़ल में धान की गाछ को रखा जाता है। इसमें आठ किस्म की दाल भी डाली जाती है।

धनबाद के दीपक पुनरिया बताते हैं कि धान की खेती से जुड़े कई पर्व हैं। जिउतिया से लेकर सोहराय सारे पर्व का संबंध धान की खेती से है। सोहराय इसीलिए मनाया जाता है कि जिन मवेशी ने धान की खेती में मदद की है उनकी पूजा की जाए। मकर संक्रांति के दिन टुसू मनाया जाता है। टुसू मनी को चौड़ल में रख कर गाजे बाजे के साथ पूरे गांव में घुमाया जाता है।

पर्व में टुसू प्रतिमा का महत्व

हम पहले बात करेंगे टुसू प्रतिमा की। टुसू प्रतिमा को लेकर दो कहानियां कही जाती हैं। बहुत पहले की बात है- झारखंड में एक किसान की रूपवती कन्या का नाम टुसू था। वहां का अत्याचारी राजा टुसू को प्राप्त करना चाहता है। यह संदेश राजा ने किसान तक पहुंचाया। इससे किसान विचलित हो गया। टुसू भी संघर्षशील कन्या थी। गांव के लोग भी किसान के साथ हो गए। उस साल राज में अकाल पड़ गया। खेती नहीं हुई। अनाज उत्पादन घट गया। राजा ने लोगों पर कर दोगुना कर दिया। इसके बाद भी जब लोग नहीं झुके तो राजा ने जबरन टुसू को प्राप्त करने का प्रयत्न किया। तब टुसू ने हिम्मत नहीं हारी और मकर संक्रांति के दिन ही स्वर्णरेखा में जल समाधि ले ली। तभी से टुसू पर्व में टुसू प्रतिमा लगाने का चलन हो गया है।

यह लोककथा भी है प्रचलित

कहा जाता है कि झारखंड में तब मुगल काल था। एक जमींदार इलाके की टुसू मनी नामक कन्या पर मोहित हो गया था। वह जमींदार टुसू मनी को जबरन अपने कब्जे में लेना चाहता था। इसके चलते टुसू मनी ने अपने सम्मान को बचाने के लिए मकर संक्रांति के दिन स्वर्णरेखा नदी में जल समाधि ले ली थी। तभी से टुसू पर्व में टुसू प्रतिमा का चलन शुरू हुआ है।

रांची से भी जुड़ी है एक कथा

एक अन्य लोककथा के अनुसार कहा जाता है कि रांची की टुसू मनी ओडिशा के मयूरभंज की रहने वाली एक रूपवती कन्या थी। सैनिकों ने टुसू मनी का अपहरण कर लिया था। जैसे ही तत्कालीन राजा सिराजुद्दौला को इसकी जानकारी मिली उसने सैनिकों को सजा दी और टुसू मनी को उनके परिवार को वापस कर दिया। मगर, टुसू मनी के परिवार वालों ने उसे स्वीकार करने से मना कर दिया। इस पर टुसू मनी ने दामोदर नदी में कूद कर जल समाधि ले ली।

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