महल 1949 में रिलीज हुई और भारतीय रहस्य- रोमांच सिनेमा के इतिहास का प्रस्थान बिन्दु मानी जा सकती है क्योंकि इसे भारत की पहली साइकोलाॅजिकल, सुपर नैचुरल हाॅरर सिनेमा के रूप में जाना और याद किया जाता है । हिन्दी सिनेमा ने इससे पूर्व रहस्य और रोमांच की ऐसी गाथा परदे पर प्रस्तुत नहीं की थी । पाकीज़ा, मुगले-आज़म और रजिया सुल्तान जैसी फिल्मों के लिए जाने और याद किए जाने वाले कमाल अमरोही की इस डायरेक्टोरियल डेब्यू फिल्म ने भारतीय सिनेमा संसार को मधुबाला और लता मंगेशकर के फन से रुबरू करवाया।

फिल्म की कहानी इलाहाबाद में संगम के नजदीक बने एक महल से शुरू होती है । हरि शंकर (अशोक कुमार) कानपुर के एक बड़े और रईस परिवार से ताल्लुक रखता है और उसने हाल ही में सरकारी नीलामी में संगम किनारे बना एक बंगला खरीदा है । इस बंगले के पुराने मालिक का नाम किसी को नहीं पता है क्योंकि सरकारी अभिलेखों में बंगला लावारिस दर्ज है। बंगले में काम करने वाला माली (एस. नाजिर) यूं तो वहाँ चालीस बरसों से है पर उसे भी उसके असली मालिक का नाम नहीं पता।

माली को पता है एक कहानी कि कैसे लगभग तीस बरस पहले बंगले के मालिक की राह देखती मालकिन के सामने ही नाव डूबने से मौत हो जाती और कुछ दिनों में मालकिन भी मर जाती है। रह जाता है तो मालिक का एक वादा कि ‘मैं तुमसे मिलने जरूर आऊँगा’। बंगले का पुराना मालिक जिसका नाम हमें फिल्म में पता नहीं चलता उसकी शक्लोसूरत हरि शंकर (अशोक कुमार) से मिलती है। अशोक कुमार के महल में दाखिल होने के बाद वहाँ महल की पुरानी मालकिन कामिनी (मधुबाला) की रूह दिखाई और सुनाई देना शुरू हो जाती है।

दर्शक सुर-साम्राज्ञी लता मंगेशकर के स्वरों में हिन्दी सिनेमा का पहला डरावना गीत ‘आएगा आने वाला’ सुनते हैं। हरिशंकर का मित्र श्रीनाथ (कानु रॉय) जब उससे इस आत्मा और गाने की बात सुनता है तो वो उसे वापस कानपुर जाने की सलाह देता है और ट्रेन में बिठा कर चला आता है। पर इस ट्रेन के नैनी (इलाहाबाद का अगला स्टेशन) पहुँचने से पहले ही महल और उस महल में गाने वाली कामिनी की कशिश में बंधा हरिशंकर वापस महल में लौट आता है।
उस आत्मा से आँख मिचौली खेलते हरिशंकर को यह विश्वास हो जाता है कि वह कामिनी के पूर्व जन्म का प्रेमी है और उनका मिलन होना ही चाहिए। पर हरिशंकर के पिता (एम. कुमार) हरिशंकर को अपने साथ इलाहाबाद ले जाते हैं और वहाँ उसकी शादी रंजना (विजयलक्ष्मी) से करवा देते हैं। रंजना से शादी के दो सालों बाद भी रंजना और हरिशंकर के बीच संबंध सामान्य नहीं हो पाते और हरिशंकर हर रात कामिनी से मिलने जाता रहता है। कामिनी की आत्मा उसे कहती है कि इस जन्म में हरिशंकर से मिलने के लिए वो किसी ऐसी देह में प्रवेश कर जाएगी जो उसे पसंद हो। और वो उसे यह भी समझाती है कि वो चाहे तो माली की बेटी की शक्ल देख कर उसे पसंद कर ले और अगर माली की बेटी उसे पसंद आ जाए तो हरिशंकर उसकी हत्या कर दे जिससे कि कामिनी की आत्मा माली की बेटी के शरीर में आ जाएगी और उनका इस जीवन में मिलन संभव हो सकेगा। इस बीच अपनी पत्नी रंजना की जिस प्रकार अनदेखी हरिशंकर कर रहा होता है उसे उसके आसपास के सभी देखते हैं।
आहत रंजना यह तय करती है कि वो अब हरिशंकर के साथ नहीं रहेगी और अपना जीवन समाप्त कर लेगी। जहर खा कर अपनी जान देने से पहले रंजना पुलिस के पास चली जाती है और मरने के पहले यह बयान दे देती है कि उसके पति हरिशंकर ने ही उसे जहर दिया है। इस इक़बालिया बयान से हरिशंकर पकड़ा जाता है और उसे फांसी की सजा हो जाती है। रंजना की हत्या के जुर्म में फांसी की सजा पाने से पहले उसे यह पता चलता है कि कामिनी ही माली की बेटी है और वो अपने दोस्त श्रीनाथ से कामिनी की शादी करवा देता है। फिल्म का अंत दुखांत है और उसे मैं यहाँ नहीं लिख कर फिल्म के अंतिम रहस्य पर पर्दा पड़े रहने दूंगा।
इस फिल्म की कहानी का आइडिया अशोक कुमार को एक सत्य घटना से आया था, 1948 में जब वो किसी हिल स्टेशन पर एक फिल्म की शूटिंग कर रहे थे तो उन्हें अपने गेस्ट हाउस से एक कार एक्सीडेंट और एक महिला की सरकती लाश दिखाई दी थी, सुबह वहाँ ऐसा कोई चिह्न नहीं था । पुलिस को सूचना देने के बाद आसपास के लोगों ने बताया कि कई साल पहले यहाँ किसी महिला ने एक हत्या कर दी थी और रात के अंधेरे में कार से भागते समय उसकी भी जान एक्सीडेंट में चली गई थी।
अशोक कुमार ने यह कहानी जब कमाल अमरोही को सुनाई तो कमाल साहब ने कहानी में कई सारे परिवर्तन करते हुए महल के नाम से कहानी लिखी। लगातार असफल फिल्में दे रहे बॉम्बे टॉकीज के लिए ऐसी फिल्म जोखिम बन सकती थी और निर्माता सावक वाचा भी महल के निर्माण को तैयार नहीं हो रहे थे, ऐसे में कमाल अमरोही पर भरोसा दिखाते अशोक कुमार निर्माता के तौर पर इस फिल्म से जुड़े और फिल्म ने सफलता का नया इतिहास लिखा।
कमाल अमरोही की इस फिल्म में, संगीत खेमचंद प्रकाश का, गीत नख्शब जारचावी के थे। इन गीतों को लता मंगेशकर, ज़ोहरा बाई अंबालेवाली और राजकुमारी दुबे ने सुरों से सजाया। नृत्य निर्देशन पंडित लच्छू महाराज का था। इस फिल्म की कथा, पटकथा, निर्देशन और संवाद सभी कमाल अमरोही द्वारा किए गए। इस फिल्म का सबल पक्ष फिल्म का सम्पादन भी था, जिसे विमल रॉय ने एम शंकर और आर. एम. टिपणीस के साथ मिल कर किया था ।
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फिल्म की कहानी के कारण कामिनी के रोल को उस समय की कई अदाकाराओं के द्वारा अस्वीकार किया गया था या भारी-भरकम फीस की मांग की गई जो वाचा और अशोक कुमार के लिए संभव नहीं था। अशोक कुमार के साथ काम करने के लिए सुरैया ने थोड़ी बहुत रुचि दिखाई परंतु उनकी नानी को फिल्म की कहानी कुछ खास जँची नहीं और फिल्म मिली उस दौर की स्ट्रगलिंग कलाकार मधुबाला को। बॉम्बे टॉकीज के पहले स्क्रीन टेस्ट में जब मधुबाला कोई खास असर नहीं छोड़ पाईं तो उनके टैलेंट पर भरोसा दिखाते हुए कमाल अमरोही ने अपनी उपस्थिति में उनका दूसरा टेस्ट लिया और उन्हें चुन लिया ।
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फिल्म के सबसे मशहूर गाने ‘आएगा आने वाला’ के लिए भी लता मंगेशकर से पहले उमा देवी (टुनटुन) से सम्पर्क किया गया परंतु करदार प्रोडक्शंस के साथ अपने कान्ट्रैक्ट के कारण उन्होंने गाना गाने से मना कर दिया जिसके बाद लता मंगेशकर से यह गीत गवाया गया ।
अपने प्रदर्शन के तीसरे हफ्ते के आते आते फिल्म को सफल फिल्म का खिताब मिल चुका था और नौ लाख के बजट में बनने वाली इस फिल्म ने लगभग डेढ़ करोड़ रुपयों का कारोबार किया ।
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फिल्म को दर्शकों ने भरपूर प्यार दिया पर आलोचकों की प्रतिक्रियाएं मिली जुली रहीं हैं। एक फिल्म आलोचक ने लिखा कि, “महल का विषय पूरी तरह से काल्पनिक बकवास है—शुद्ध और बिना मिलावट का। जब कोई मुस्लिम लेखक हिंदू आध्यात्मिक और दार्शनिक विषयों, जैसे पुनर्जन्म और आत्मा के स्थानांतरण, से खिलवाड़ करने लगता है, तो वह पूरे मामले को बेहद अपवित्र गड़बड़ बना देता है और अंततः इन विषयों पर अपनी गहरी अज्ञानता को उजागर कर बैठता है” पर फिल्म की इन कुछ एक आलोचनाओ को छोड़ दिया जाए तो महल का प्रभाव लगभग हर भारतीय हॉरर फिल्म पर दिखाई देता है। कैमरा के प्रयोग की तकनीक, प्रकाश और ध्वनि के इस्तेमाल में प्रयोग से भय का सृजन जैसे कारणों से ब्रिटिश फिल्म इंस्टिट्यूट ने इसे ‘दस महान रोमांटिक हॉरर फिल्मों’ की सूची में जगह दी।
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फिल्म को यूट्यूब पर देखा जा सकता है और फिल्म देखते समय इस बात का ध्यान अवश्य रखें कि अपने सीमित बजट में, सीमित संसाधनों के साथ फिल्म बनाई गई थी और आज हम इसे क्लासिक कहें, कल्ट कहें या तमाशा पर उस दौर में इसे बनाने का मुख्य उद्देश्य मनोरंजन था और उस मामले में दर्शकों का कितना प्यार इसे मिल यह इसी बात से समझा जा सकता है कि यह फिल्म अपनी लागत का पंद्रह गुणा मुनाफा कमाने वाली फिल्म थी ।

