Home » Old Hindi Film Stories :  ये दुनिया वाले पूछेंगे

Old Hindi Film Stories :  ये दुनिया वाले पूछेंगे

दैनिक समाचार पत्र द फोटोन न्यूज के साहित्य पेज के लिए लिखे काॅलम : 'गुमनाम है कोई' से साभार

by Vaibhav Mani Tripathi
Old Hindi Film Stories
WhatsApp Group Join Now
Instagram Follow Now

Old Hindi Film Stories :  निर्देशक शंकर मुखर्जी ने 1962 में देवानंद और वहीदा रहमान के साथ, रहस्य रोमांच श्रेणी की फिल्म ‘बात एक रात की’ बनाई थी जिसका अनुभव कुछ खास नहीं था, शायद यही कारण था कि बीच में ‘प्यार मोहब्बत’ जैसी रोमांटिक ड्रामा फिल्म बनाने के बाद उन्होंने फिर से एक बार देवानंद के साथ रहस्य-रोमांच वाली श्रेणी में 1970 में ‘महल’ के नाम से फिल्म बनाई ।


राजेश (देव आनंद) अपनी माँ (प्रतिमा देवी) और बहन चन्दा (आज़रा) के साथ कलकत्ते में रहता है और जीवन यापन के लिए श्याम (अभि भट्टाचार्य) के सहायक के रूप में कार्य करता है । सट्टे और जुए में राजेश की किस्मत ठीक चलती है, और वो अपने दोस्तों की मदद के लिए कभी कभी जुए में हाथ भी आजमा लिया करता है । राजेश के बचपन का दोस्त पुलिस ऑफिसर रमेश चंद्र त्रिपाठी उर्फ रम्मु (सुधीर) को राजेश की बहन चन्दा पसंद है और उन दोनों की शादी के खर्च के लिए रुपये जुगाड़ने को राजेश जुआ खेलने की राह चुनता है और बेईमानी के कारण हार जाता है । अब इस अवसर पर उसकी मदद को हाथ बढ़ाता है मोतीलाल (राजन हक्सर) जो इस मदद के बदले में उससे एक छोटी सी मदद चाहता है ।

राजेश को बहन की शादी के खर्च के बदले में मोतीलाल की जगह दार्जिलिंग जाना होगा और वहाँ मोतीलाल के चाचा राजा दीनानाथ से उनका अट्ठारह साल पहले घर छोड़ कर भागा हुआ भतीजा रवि (जो मोतीलाल के अनुसार उसका बचपन का नाम है) बन कर मिलना है, जिससे कि राजा साहब अपने जीवन के आखिरी दिन खुशी-खुशी बिता सकें । काम आसान है सोच कर राजेश हामी भर देता है और बहन की शादी की रात दार्जिलिंग चल जाता है ।

दार्जिलिंग पहुँच कर राजा दीनानाथ (दया किशन सप्रू) से उसकी मुलाकात होती है और उनके इम्तिहान में पास होकर वह राजा साहब का भतीजा बन कर रह रहा होता है कि तभी वहाँ उसकी मुलाकात रूपा (आशा पारेख) से होती है जिसकी शादी की बात श्याम से चल रही थी । रूपा के प्रेम ,नेकी और सच्चाई के साथ उसकी ये छद्म पहचान का द्वन्द्व चलता है जिसमें प्रेम की जीत होती है ।

Read Also- Old Hindi Film Stories : रहस्य रोमांच वाला हिंदी सिनेमा : मैं देखूं जिस ओर सखी री!

राजेश उर्फ रवि जब राजा दीनानाथ के पास यह बताने जाता है कि वो उनका असली भतीजा नहीं तो वहाँ उसे राजा साहब की लाश मिलती है और उसे यह पता चलता है कि वो किसी गहरी साजिश का शिकार है क्योंकि एक तो यह राजा साहब वो नहीं होते जिनसे वो बीते दिनों मिलता रहा है और दूसरे मौके पर पुलिस भी पहुँच जाती है । धर्म संकट यह कि उसके बचपन का दोस्त और रिश्तेदार रमेश ही उसे पकड़ने के लिए पुलिस दल के साथ खड़ा है । खुद को बचाने के लिए राजेश वहाँ से भागता है, अपनों का विश्वास खो कर भी, शुभचिंतकों की मदद से आखिरकार एक लंबी जद्दोजहद के बाद राजेश खुद को बेगुनाह साबित करता है और रूपा के संग अपना नया जीवन शुरू करता है ।

Read Also- Srijan Samvad : सृजन संवाद में पहली बार हुई लिथुआनियाई कहानियों पर चर्चा


फिल्म का निर्माण रूप कला पिक्चर्स के बैनर तले हुआ । निर्माता महिपतराय शाह की इस फिल्म का निर्देशन शंकर मुखर्जी का था । कथा और पटकथा के ए नारायण और संवाद व्रजेंद्र गौड़ ने लिखे थे । आनंद बक्शी के लिखे गीतों को कल्याण जी आनंद जी ने संगीत से सजाया और आशा भोंसले, लता मंगेशकर, किशोर कुमार और मोहम्मद रफी ने इन गीतों को अपनी आवाज दी । फिल्म के एक खास गीत ‘आइए आपका था हमें इंतजार’ में देव आनंद साहब ने भी अपनी आवाज दी । फिल्म को 1969 में प्रदर्शित किया जाना था परंतु कुछ कारणों से यह अगस्त 1970 में रिलीज हुई और साल की सफल फिल्मों में गिनी गई ।

साल 1970 यूं तो राजेश खन्ना के लिए याद किया जाने वाला साल है जिस साल ‘सच्चा झूठा’, ‘आन मिलो सजना’, ‘सफर’ जैसी फिल्में आईं और राजेश खन्ना की सुपर स्टार की कुर्सी को मजबूती दी, पर देव आनंद ने अपनी दो फिल्मों ‘जॉनी मेरा नाम’ और ‘महल’ के साथ अपनी मौजूदगी का एहसास बहुत मजबूती से करवाया । ‘जॉनी मेरा नाम’ उस साल की सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्म भी थी ।

Read Also- Gorakhpur : भोजपुरी के सशक्त और सिद्ध कवि थे डॉ. रामानंद राय ‘गँवार’


महल की बात करें तो ईस्टमैन कलर में शूट हुई इस फिल्म में दार्जिलिंग की खूबसूरती है, मधुर कर्णप्रिय गीत हैं, सधे हुए संवाद हैं और कसा हुआ कथानक है । अदाकारों ने सहज अभिनय किया है, मुख्य कलाकारों देव आनंद और आशा पारेख के अलावा रूपा के पिता के रूप में डेविड, मोतीलाल के रूप में राजन हक्सर, चन्दा के रूप में अजरा और नर्स के रूप में फरीदा जलाल का अभिनय न सिर्फ प्रभावी है बल्कि दर्शकों को लंबे समय तक याद रहता है ।

Read Also- यात्रा वृतांत :  52 देवरी जैन मंदिर : पत्थरों में ठहरा हुआ मौन


यूं तो फरीदा जलाल की यह तीसरी फिल्म थी,1969 में आराधना फिल्म में अपने अभिनय के लिए फिल्म फेयर पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ सहायक भूमिका के लिए नामित भी हो चुकी थीं पर अपने चरित्र के हिसाब से महल में उनकी अदायगी बेहतरीन थी । नायक से ट्रेन में मिली एक फैशनेबल लड़की से लेकर बीमार राजा दीनानाथ की सेवा करती नर्स तक के किरदार में फरीदा जलाल दर्शकों को कुछ अवांछित घटित होने का इशारा दिया करती हैं ।

Read Also- Vivah Geet : यायावरी वाया भोजपुरी लेकर आ रहा विवाह गीतों की श्रृंखला, हरीश गड़ाई के मौके पर गाया जाने वाला गीत “कहवां बाड़े भाई” रिलीज


रहस्य रोमांच श्रेणी की अपनी पिछली फिल्म ‘बात एक रात की’ के औसत प्रदर्शन को देख कर शंकर मुखर्जी ने इस बार कम रिस्क लिए थे, फिल्म भले रहस्य रोमांच वाली थी पर फिल्म की ट्रीटमेंट एक रोमांटिक फिल्म की तरह की थी । तीन चौथाई फिल्म आशा पारेख और देव आनंद की रोमांटिक फिल्म सी चलती है और नायिका रूपा के माता पिता के बीच के संवादों को छोड़ दें तो मनोरंजक बनी रहती है ।

Read Also yaatra vrtaant : यात्रा वृतांत : अरावली की छांव में बसा अलवर


फिल्म में कुछ एक कमियाँ हैं जो दर्शकों का ध्यान बरबस अपनी ओर खींचती हैं, शुरुआत पहले सीन से करें तो, एक महल की धुंधली सी तस्वीर और कुछ हाथ दिखाए जाते हैं पर ये हाथ इस दृश्य को इतने औसत तरीके से फिल्माया गया है कि परदे पर देव आनंद के आने के बाद महल और उन हाथों का ध्यान ही दर्शकों के ध्यान से उतर जाता है और लगता है फिल्म के नाम महल को सार्थक सिद्ध करने के उद्देश्य से फिल्म में इस दृश्य को रखा गया है (ऐसी शंका इसलिए स्वाभाविक लग सकती है क्योंकि 1949 में बनी कमाल अमरोही की फिल्म महल भी एक रहस्य रोमांच श्रेणी की बेहद सफल फिल्म थी और इसे भारत की पहली मनोवैज्ञानिक-हॉरर फिल्म माना जाता है) ।

कहानी आगे बढ़ने के साथ यह लॉजिक समझ नहीं आता कि राजेश का मालिक श्याम जब राजेश को घुड़दौड़ आदि जीतने पर रुपये ईनाम में देना चाहता है तो राजेश लेने से मना कर देता है पर एक अनजान आदमी से रुपये लेकर उसके लिए एक बीमार बूढ़े आदमी को धोखा देने को तैयार हो जाता है । कहानी में रहस्य का प्रवेश बहुत मंथर गति से होता है और फिर अचानक लगता है कि फिल्म तो तेरह-चौदह रील की हो चुकी है, इसलिए अब जल्द समेटनी होगी क्योंकि सत्रह रील मे फिल्म खत्म करनी है, इसके लिए निर्देशन और सम्पादन को समान रूप से ज़िम्मेदार माना जा सकता है ।

Read Also yaatra vrtaant : यात्रा वृतांत : अरावली की छांव में बसा अलवर

कहानी में कातिल की पहचान को छिपा कर रखने के लिए, जब कातिल अपना हुलिया बदलता है तो उसकी आवाज भी बदल दी जाती है पर आवाज का यह बदलाव इस मामले में ठीक नहीं कि जिस आवाज का प्रयोग हुआ है वह पूरी तरह भावशून्य और प्रभावहीन है । देव आनंद के बहन के पति के रूप में रमेश (सुधीर) की उपस्थिति बेहद सौम्य है पर उनकी अदाकारी पर शायद निर्देशक को बहुत भरोसा नहीं था क्योंकि उनके हिस्से में रस्मी दृश्यों के अलावा करने को कुछ खास नहीं दिया गया ।

Read Also: Hindi Poetry : हिंदी कविता : कविता ‘कैसे’


फिल्म प्राइम वीडियो और यूट्यूब पर उपलब्ध है और सुंदर दृश्यों, मधुर संगीत के लिए देखी जा सकती है । इसे एक बेहतरीन रहस्य रोमांच फिल्म तो नहीं कह सकते लेकिन अपनी श्रेणी की कई फिल्मों से यह एक बेहतर फिल्म मानी जा सकती है और मनोरंजक है । शंकर मुखर्जी के करियर की सर्वश्रेष्ठ फिल्म तो निःसंदेह ‘झुमरू’ ही मानी जाएगी पर ‘झुमरू’ के बाद अगर कोई फिल्म आती है तो वो निर्विवाद रूप से महल ही होगी ।

Read Also- Old Hindi Film Stories : रहस्य रोमांच वाला हिंदी सिनेमा : ना तुम हमें जानो

Related Articles

Leave a Comment