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Moila Top : दूर पहाड़ पर परियों का एक मंदिर

by Rakesh Pandey
Moila Top
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– संजय शेफर्ड

मुझे नहीं पता था कि दूर पहाड़ों में कहीं परियों का भी कोई मंदिर होगा। एक दिन ऐसे ही जब जौनसार बावर के दूरदराज क्षेत्रों में अकेले भटक रहा था। किसी ने कहा कि चकराता आ गए हो तो लोखंडी गांव और बुधेर मोईला टॉप भी जाओ। मैंने पूछा क्या है वहां? कुछ नहीं बस आप जाओ तो, यह बताने वाले ने कहा था। आगे चलकर पता किया तो वह जगह चकराता से तक़रीबन 25 किमी दूर थी। जिसमें ढाई तीन किमी की खड़ी चढ़ाई भी शामिल थी। यानि कि इस दूरदराज रास्ते को पैदल ट्रेक करके जाना था।

मुझे रास्ता तो कठिन जान पड़ा पर लोखंडी से थोड़ा आगे बढ़ा तो उसमें एक अलग ही तरह का सम्मोहन था। मैं जंगल, पहाड़ और प्रकृति के साथ बंधता चला गया और वह रास्ता धीरे धीरे मेरे पैरों में सिमटने लगा। लगभग तीन किमी चलने के बाद फॉरेस्ट डिपार्टमेंट का एक गेस्ट हाउस दिखा जो तक़रीबन डेढ़ दो सौ साल पुराना था और इसी में छुपा था इस जगह, यानि कि मोयला टॉप का संपूर्ण इतिहास।

इस जगह के बारे में कहा जाता है कि एक बोथर नामक ब्रिटिश ,जो वाइल्ड लाइफ प्रेमी था ,ने अपनी महिला मित्र मिओला के साथ मिलकर इसे वन्य जीव जंतु के चारागाह के रूप में ढूंढा था। जिसके टॉप तक बेहद खूबसूरत बुग्याल व चारापत्ती के वृक्ष थे। उन्हीं के नाम पर इस जगह का नाम बुधेर मोयला टॉप पड़ा है।

मोइला टॉप के खूबसूरत बुग्याल के बीचोबीच बना एक मंदिरनुमा घर है। यह घर उन्हीं का बताया जाता है जबकि इसे लोग मोइला यानि महासू से भी जोड़ते हैं। लोग इसे शिव मंदिर भी कहते हैं जो कि शिलगुर शिव मंदिर के ही रूपक हो सकते हैं। इस मंदिरनुमा घर को शिलगुर, आंछरी मंदिर जरुर कहा जा सकता है क्योंकि इस जगह पर आज भी पुराने मृद भांड मिलते हैं व जंगली जीवों के आखेट के बाद उनकी सिंघे दरवाजे की लकड़ियों पर टंगे हुए हैं।

बहरहाल, मोइला टॉप के इस मंदिरनुमा घर के भीतर कोई देवमूर्ति नहीं है। बाहर पहरेदार के रूप में एक लकड़ी की मूर्ति दिखाई देती है। जिसे लोग इस मंदिर का द्वारपाल मानते हैं।
खैर, थोड़ा सा थकते-थकाते ऊपर पहुंचा तो मेरी आंखें खुली की खुली रह गईं। सामने जो नज़ारा था वह सारी थकान, सारी दुर्गमता और सारी मुश्किलों को छूमंतर कर दिया। मन खुशी से भर उठा। यह जगह मुझे बहुत ही अच्छी लगी। एक पल के लिए मैंने आंखें बंद की और यहां के देवता कानासर महादेव को याद किया।

यह जगह एशिया के सबसे घने देवदार के ऊंचे ऊंचे पेड़ों से घिरी हुई है और बीच में एक बहुत ही खूबसूरत घास का मैदान है। जहां से आप हिमालय की तमाम ऊंची ऊंची चोटियों को देख सकते हैं। मोयला के पास बुधेर गुफा, एक प्राचीन मंदिर और दो सुन्दर झीलें भी स्थित हैं जहां पर कैंपिंग भी किया जा सकता है। इस जगह पर पहुंचने के लिए तक़रीबन डेढ़ से दो घंटे की पैदल यात्रा करनी होती है। पूरा रास्ता हरे भरे पेड़ों से होकर गुजरता है। जब यह रास्ता खत्म हुआ तो सामने घास का एक बहुत बड़ा मैदान था और सामने था ‘ परियों का मन्दिर’,मैं खुशी और उन्माद दोनों से भर गया।

इस जगह पर पहुँचकर मैं बहुत ज्यादा खुश था। यहाँ पर पता नहीं ऐसा क्या था जिसकी वज़ह से सबकुछ अच्छा अच्छा लग रहा था। मैं देर तक उन्हीं घास के मैदानों में घूमता रहा और तरह तरह के जानवरों को घास चरते हुए देखता रहा। सचमुच, यह जगह किसी परीलोक के जैसा ही था। बाद में मैं उस मंदिर भी गया जिसे आछरी या परियों का मंदिर कहा जाता है। यह मंदिर छोटा मगर बहुत ही ख़ूबसूरत था। आसपास के ख़ूबसूरत और मनभावन नज़ारों को देखकर ऐसा लगा कि देवलोक में आ गये हैं।

इस जगह पर पहुंचकर यदि हम रास्तों का गणित लगाएं तो मोयला टॉप चकराता से पच्चीस, विकासनगर से पच्चासी, देहरादून से एक सौ पच्चीस और दिल्ली से तीन सौ पच्चीस किमी की दूरी पर स्थित है। जिसे सामान्यतौर पर बुग्याल या फिर घास के एक बड़े मैदान के तौर पर समझा जा सकता है।

आप सोच रहे होंगे कि बुग्याल क्या होते हैं। दरअसल, पहाड़ों में घास के मैदानों को बुग्याल कहा जाता है। यह पहाड़ की एक निश्चित ऊंचाई पर होते हैं जिसकी वजह से यहां पहुंचना दुरूह और मुश्किल होता है। ज्यादातर बुग्यालों पर ट्रेक करके पहुंचा जाता है। पर यह इतने खूबसूरत होते हैं कि एक बार पहुंच जाओ तो वापस लौटने का जी नहीं करता है।

मोयला टॉप की बात करें तो यह 2700 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है जबकि पश्चिमी हिमालय में ट्री-लाइन 3200 मीटर पर समाप्त होती है। सामान्यतौर पर अच्छे बुग्याल ट्री लाइन से ऊंचाई पर ही पाए जाते हैं लेकिन कई जगहों पर इससे कम ऊंचाई पर भी यह मिल जाते हैं। मोयला टॉप एक ऐसा ही बुग्याल है जो कि 3000 मीटर से भी कम ऊंचाई पर स्थित है।

मुझे बुग्याल बहुत पसंद हैं। मैं ऐसी जगहों पर घंटो बीता देता हूं। खाने पीने का कोई अच्छा इंतजाम बन पाया तो कई कई दिन रह जाता हूं। इस बार भी यही हुआ। ढाई किमी के ट्रेक को जैसे तैसे पूरा किया और मोइला टॉप पहुंच गया। यह ट्रेक आसान था बावजूद इसके कि जगह जगह पत्थर उखड़े हुए थे जिसके लिए सावधानी की बहुत ज्यादा जरूरत थी।

रास्ता खूबसूरत है, देवदार, कैल, सुरई के ऊंचे पेड़ मन को मोहते हुए जान पड़ते हैं। सामान्यतौर पर ट्रेक करते हुए सांस फूलती है। पर इस ट्रेक पर बिल्कुल भी ऐसा नहीं था। यह बहुत जल्दी पूरा हो गया। जब खत्म हुआ तो सामने घास का एक बहुत बड़ा मैदान था। इस जगह पर रहने का कोई इंतज़ाम नहीं है जिसकी वजह से ज़्यादातर लोग जिस दिन जाते हैं उसी दिन वापस भी आ जाते हैं लेकिन जो ट्रेकिंग करते हैं वह कई कई दिनों तक रुकते हैं।

मुझे यह जगह बहुत ही अच्छी लगी और घंटों तक इसके सम्मोहन से बाहर नहीं निकल पाया। शाम हुई तो अपना टेन्ट लगाया और आग जलाने के इंतजाम में लग गया। अच्छी बात यह कि यहां सूखी हुई लकड़ियां खूब थी पर उनमें आग लगाने की चुनौती कम नहीं थी। मैंने आग जलाई और इस जगह पर तीन दिन रहा और यहाँ से निकलने के बाद कुछ दिन चकराता की जादुई दुनिया में खो गया।

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